अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) और अलीगढ़ नगर निगम के बीच हॉर्स राइडिंग क्लब की जमीन को लेकर चल रहा विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है। करीब 3.863 हेक्टेयर जमीन के मालिकाना हक को लेकर दोनों सरकारी संस्थाएं आमने-सामने हैं। जमीन की कीमत करीब 500 करोड़ रुपये बताई जा रही है। मामले की सुनवाई एसडीएम कोल की अदालत में चल रही है और अब 9 सितंबर को अगली सुनवाई होनी है। इससे पहले 31 अगस्त को हुई सुनवाई को लेकर एएमयू प्रशासन ने कहा है कि विश्वविद्यालय की ओर से पूरी कानूनी टीम अदालत में मौजूद थी और मामले से जुड़े दस्तावेज व पक्ष मजबूती से रखा गया। विवादित जमीन नगला पटवारी क्षेत्र में स्थित है और लंबे समय से एएमयू के हॉर्स राइडिंग क्लब के इस्तेमाल में रही है।
इस जमीन को लेकर विवाद उस समय ज्यादा बढ़ गया था, जब नगर निगम की टीम ने मौके पर पहुंचकर जमीन की घेराबंदी शुरू कर दी थी और वहां नगर निगम की संपत्ति से जुड़े बोर्ड लगा दिए थे। नगर निगम का दावा है कि उसके राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन सरकारी/नगर निगम की संपत्ति के रूप में दर्ज है और लंबे समय से उसका अधिकार है। दूसरी ओर एएमयू प्रशासन का कहना है कि जमीन विश्वविद्यालय के पास दशकों से है और इसके समर्थन में उसके पास पुराने सरकारी दस्तावेज, अभिलेख और कानूनी रिकॉर्ड मौजूद हैं। दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में दस्तावेज अदालत के सामने रखने की प्रक्रिया में हैं।
एएमयू के प्रॉक्टर प्रो. नवेद अली ने जमीन विवाद को लेकर विश्वविद्यालय का पक्ष लगातार सामने रखा है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले को कानूनी तरीके से लड़ रहा है और उसकी ओर से जरूरी दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए जा रहे हैं। 31 अगस्त की सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय की पूरी कानूनी टीम कोर्ट में मौजूद रही। अब मामले में अगली सुनवाई 9 सितंबर को होनी है। इस सुनवाई में दोनों पक्षों की ओर से पेश किए गए दस्तावेज और दावे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अदालत में प्रस्तुत रिकॉर्ड के आधार पर जमीन के मालिकाना हक से जुड़े तथ्यों को आगे परखा जाएगा।
विवादित जमीन को लेकर एएमयू का दावा पुराने सरकारी दस्तावेजों पर आधारित है। विश्वविद्यालय की ओर से पहले अधिकारियों के सामने 1923 के मूल भू-स्वामित्व दस्तावेज और तत्कालीन यूनाइटेड प्रोविन्स सरकार की राजपत्रित अधिसूचना का हवाला दिया गया था। एएमयू का कहना है कि 1940 में तत्कालीन सरकार की ओर से जारी दस्तावेजों में भी इस जमीन को विश्वविद्यालय से जोड़ने वाले उल्लेख मौजूद हैं। विश्वविद्यालय का दावा है कि इन दस्तावेजों से उसके अधिकार और लंबे समय से चले आ रहे कब्जे की स्थिति स्पष्ट होती है।
एएमयू के अनुसार विवादित जमीन का इस्तेमाल लंबे समय से हॉर्स राइडिंग और राइडिंग क्लब से जुड़ी गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है। विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों का कहना है कि मैदान केवल एक खाली भूखंड नहीं है, बल्कि एएमयू की खेल और संस्थागत विरासत से जुड़ा स्थान है। पुराने समय से इस क्षेत्र में राइडिंग क्लब की गतिविधियां होती रही हैं। स्थानीय लोगों और विश्वविद्यालय से जुड़े पुराने कर्मचारियों ने भी जमीन पर लंबे समय से एएमयू के इस्तेमाल का दावा किया है।
दूसरी तरफ नगर निगम का कहना है कि उसके पास उपलब्ध राजस्व रिकॉर्ड जमीन पर उसके अधिकार की पुष्टि करते हैं। निगम की ओर से पहले यह दावा किया गया था कि जमीन उसके रिकॉर्ड में दर्ज है और इसी आधार पर निगम ने मौके पर कार्रवाई की। नगर निगम का यह भी कहना है कि जमीन का रिकॉर्ड उसके पक्ष में है। हालांकि, अंतिम स्थिति अभी अदालत के निर्णय पर निर्भर करेगी, क्योंकि दोनों पक्षों के दावे और दस्तावेजों की जांच न्यायिक प्रक्रिया के तहत हो रही है।
विवाद बढ़ने के बाद अलीगढ़ के जिलाधिकारी ने मामले में यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया था। प्रशासन ने साफ किया था कि जब तक एसडीएम कोल की अदालत से कोई फैसला नहीं आता, तब तक जमीन को लेकर किसी तरह का टकराव या नई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। जिलाधिकारी ने दोनों संस्थाओं को कानून के दायरे में रहकर अपने दावे रखने की बात कही थी। चूंकि एएमयू और नगर निगम दोनों ही सरकारी संस्थाएं हैं, इसलिए प्रशासन ने विवाद को कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सुलझाने पर जोर दिया है।
इससे पहले 27 अगस्त को मामले की सुनवाई होनी थी, लेकिन अधिवक्ताओं की हड़ताल के कारण उस दिन केस की फाइल अदालत में प्रस्तुत नहीं हो सकी थी। इसके बाद 31 अगस्त की तारीख तय की गई थी। उस समय दोनों पक्षों को अपने दावे के समर्थन में राजस्व अभिलेख और अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे। अब 31 अगस्त की कार्यवाही के बाद अगली सुनवाई 9 सितंबर को रखे जाने से इस मामले में एक बार फिर दोनों पक्षों की नजर अदालत की कार्यवाही पर है।
जमीन का क्षेत्रफल करीब 3.863 हेक्टेयर यानी लगभग 9.5 एकड़ है। इसकी अनुमानित कीमत करीब 500 करोड़ रुपये बताई गई है। यही वजह है कि यह विवाद सिर्फ विश्वविद्यालय और नगर निगम के बीच सामान्य जमीन विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर में भी इसकी चर्चा तेज हो गई है। एएमयू से जुड़े छात्र, पूर्व छात्र और विश्वविद्यालय के कर्मचारी इस जमीन को बचाने की मांग कर रहे हैं। वहीं नगर निगम अपने राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर अधिकार का दावा कर रहा है।
1 सितंबर को एएमयू में इस जमीन को लेकर विरोध मार्च भी निकाला गया। विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी कैंटीन से हॉर्स राइडिंग फील्ड तक निकाले गए मार्च में लोगों ने एएमयू और राइडिंग क्लब की जमीन सुरक्षित रखने की मांग की। प्रदर्शन में ‘सेव एएमयू’, ‘सेव राइडिंग क्लब लैंड’ और ‘हैंड्स ऑफ एएमयू’ जैसे नारे लगाए गए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि विश्वविद्यालय की जमीन उसकी ऐतिहासिक पहचान और विरासत का हिस्सा है और इसे किसी भी तरह सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
विवाद के बीच एएमयू के पूर्व छात्र भी सक्रिय हुए हैं। पूर्व छात्रसंघ उपाध्यक्ष मोहम्मद नदीम अंसारी ने प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की थी। उन्होंने कहा था कि अगर नगर निगम के पास जमीन पर अधिकार का वैध दस्तावेज है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए और यदि दावा दस्तावेज तथा कानून की कसौटी पर सही नहीं पाया जाता है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। इससे पता चलता है कि जमीन का विवाद अब विश्वविद्यालय परिसर से बाहर भी राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन चुका है।
एएमयू प्रशासन का कहना है कि विश्वविद्यालय के पास अपनी संपत्तियों से जुड़े पुराने दस्तावेज और अभिलेख मौजूद हैं। विश्वविद्यालय का दावा है कि विवादित जमीन पर उसका कब्जा पहले से रहा है और राइडिंग क्लब की गतिविधियां भी वहां होती रही हैं। दूसरी ओर नगर निगम के रिकॉर्ड को भी अदालत में देखा जाना है। ऐसे में आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा कि राजस्व रिकॉर्ड, पुराने सरकारी दस्तावेज और वास्तविक कब्जे से जुड़े साक्ष्य किस पक्ष के दावे को मजबूत करते हैं।
इस पूरे मामले में फिलहाल प्रशासन ने टकराव से बचने और यथास्थिति बनाए रखने पर जोर दिया है। यानी जब तक अदालत की ओर से कोई नया आदेश नहीं आता, जमीन को लेकर एकतरफा कार्रवाई से बचना होगा। यही वजह है कि 9 सितंबर की सुनवाई को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस तारीख पर दोनों पक्ष अपने दावों को आगे बढ़ा सकते हैं और अदालत में जमा दस्तावेजों की स्थिति पर आगे की प्रक्रिया तय हो सकती है।
एएमयू और नगर निगम दोनों के दावे सामने आने के बाद अब जमीन के मालिकाना हक का अंतिम फैसला कानूनी प्रक्रिया से ही होगा। एएमयू अपने पुराने सरकारी दस्तावेजों और लंबे समय से चले आ रहे कब्जे को आधार बना रहा है, जबकि नगर निगम राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर अपना अधिकार बता रहा है। फिलहाल अदालत में मामला विचाराधीन है, इसलिए किसी भी पक्ष को जमीन का अंतिम मालिक घोषित करना जल्दबाजी होगी।
अब 9 सितंबर की सुनवाई पर विश्वविद्यालय, नगर निगम और शहर के लोगों की नजर रहेगी। एएमयू की कानूनी टीम जमीन से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर अपना पक्ष रखेगी, जबकि नगर निगम भी अपने रिकॉर्ड और दावे के समर्थन में दस्तावेज प्रस्तुत करेगा। अदालत की कार्यवाही के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि विवादित हॉर्स राइडिंग फील्ड की जमीन के मालिकाना हक को लेकर आगे क्या दिशा तय होती है। तब तक जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने की प्रशासनिक व्यवस्था लागू है और विश्वविद्यालय परिसर में इस मुद्दे को लेकर विरोध और आवाज उठाने का सिलसिला भी जारी है।










