सोमनाथ मंदिर के ज्योतिर्लिंग पर हुए हमले के 1000 साल पूरे हो चुके हैं। गौरतलब है कि सन् 1026 में सोमनाथ मंदिर पर पहली बार हमला किया गया था। इसके बाद कई बार इस ऐतिहासिक मंदिर को लूटा गया और नष्ट करने की कोशिशें की गईं।
नई दिल्ली: सोमनाथ मंदिर पर हमले के 1000 साल पूरे होने के अवसर पर हाल ही में भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि नेहरू स्वतंत्र भारत में सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के विरोधी थे और उन्होंने इस ऐतिहासिक स्थल के पुनर्निर्माण को रोकने की कोशिश की।
सोमनाथ मंदिर पर पहली बार सन् 1026 में हमला हुआ था। इसके बाद कई बार इसे लूटा गया और नष्ट करने का प्रयास किया गया। बावजूद इसके, यह मंदिर आज भी अपने वैभव और धार्मिक महत्व के साथ अडिग खड़ा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 11 जनवरी को गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर जाएंगे और सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में शामिल होंगे।
सुधांशु त्रिवेदी के आरोप
भाजपा सांसद ने X पोस्ट पर लिखा कि:
'अतीत में सोमनाथ को मोहम्मद गजनी और खिलजी ने लूटा, लेकिन आजाद भारत में भगवान् सोमनाथ से सबसे अधिक नफरत पंडित नेहरू को थी। 21 अप्रैल 1951 को उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को पत्र लिख कर सोमनाथ मंदिर के दरवाजों की कहानी को झूठा बताया और कहा कि मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं हो रहा।'
सुधांशु ने आरोप लगाया कि नेहरू पाकिस्तान को खुश करने के लिए हिंदू ऐतिहासिक प्रतीकों का महत्व कम कर रहे थे। उन्होंने कहा कि नेहरू ने न केवल अपने मंत्रियों बल्कि राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन तक को पत्र लिख कर उद्घाटन समारोह में शामिल होने से मना किया।

पत्र और सरकारी हस्तक्षेप
सुधांशु त्रिवेदी ने बताया कि नेहरू ने:
- सभी भारतीय मुख्यमंत्रियों को दो-दो बार पत्र लिख कर सोमनाथ मंदिर के निर्माण पर आपत्ति जताई।
- सूचना और प्रसारण मंत्री आर.आर. दिवाकर को पत्र लिख कर अभिषेक समारोह की कवरेज कम करने का निर्देश दिया।
- भारतीय दूतावासों को आदेश दिया कि वे सोमनाथ ट्रस्ट की किसी भी मदद को मंजूरी न दें, जिसमें नदी का पानी मांगने का अनुरोध भी शामिल था।
- चीन में भारत के राजदूत को पत्र लिख कर कहा कि राष्ट्रपति के समारोह में भागीदारी के असर को कम किया जाए।
सुधांशु त्रिवेदी के अनुसार, यह साफ तौर पर नेहरू की मंदिर और हिंदू सांस्कृतिक प्रतीकों के प्रति बेचैनी को दर्शाता है।
कांग्रेस और सोमनाथ मंदिर का इतिहास
सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में एक सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दा रहा। नेहरू की नीतियों के आलोचक मानते हैं कि उन्होंने मंदिर के महत्व और उद्घाटन के प्रतीकात्मक महत्व को कम करके देखा और इस प्रक्रिया में धार्मिक एवं सांस्कृतिक भावनाओं का अनादर किया। भाजपा सांसद का कहना है कि नेहरू ने राजनीतिक तुष्टिकरण और पाकिस्तान के दबाव को प्राथमिकता दी, जबकि यह मंदिर भारतीय सभ्यता और हिंदू संस्कृति का प्रतीक था।
11 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में भाग लेने गुजरात पहुंचेंगे। इस अवसर पर मंदिर के इतिहास, पुनर्निर्माण और धार्मिक महत्व पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।










