भरतपुर के बयाना में सूखे कुएं से करीब ₹5 करोड़ मूल्य की 274 कार्टन दवाइयां बरामद हुईं। जांच का कनेक्शन आगरा तक पहुंचा है। हिमांशु अग्रवाल समेत पांच लोग गिरफ्तार बताए गए हैं। दवाओं की गुणवत्ता और सप्लाई चेन की जांच जारी है।
भरतपुर: राजस्थान के भरतपुर जिले में दवाइयों के कथित अवैध भंडारण से जुड़े मामले ने अब उत्तर प्रदेश तक अपना कनेक्शन दिखाया है। बयाना तहसील के खटनावाली गांव में एक सूखे कुएं से करीब ₹5 करोड़ मूल्य की 274 कार्टन दवाइयां बरामद होने के बाद औषधि नियंत्रण विभाग ने इनके स्रोत और सप्लाई चेन की जांच शुरू कर दी है। जांच के दौरान आगरा के मलपुरा क्षेत्र में भी संबंधित दवाओं का स्टॉक मिलने की बात सामने आई है।
मामले में होलसेल कारोबारी हिमांशु अग्रवाल समेत पांच लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है। हिमांशु अग्रवाल का नाम इससे पहले 2025 में आगरा में सामने आए कथित नकली दवा कारोबार के मामले में भी आया था। उस मामले में उस पर जांच से बचने के लिए ₹1 करोड़ की रिश्वत देने की कोशिश करने का आरोप लगा था।
हालांकि, भरतपुर से बरामद पूरे स्टॉक को अभी अंतिम रूप से नकली या मिलावटी घोषित नहीं किया गया है। राजस्थान औषधि नियंत्रण विभाग ने नमूने जांच के लिए भेजे हैं और दवाओं की वास्तविकता, गुणवत्ता, बैच नंबर, निर्माण तथा समाप्ति तिथि की जांच की जा रही है।
सूखे कुएं से मिले 274 कार्टन
मामले की शुरुआत भरतपुर के बयाना क्षेत्र के खटनावाली गांव से हुई। सूचना मिलने के बाद सहायक औषधि नियंत्रक, भरतपुर के नेतृत्व में औषधि नियंत्रण अधिकारियों की टीम ने स्थानीय पुलिस और ग्रामीणों की मदद से एक सूखे कुएं की तलाशी ली।
तलाशी के दौरान कुएं में बड़ी मात्रा में दवाइयों के कार्टन छिपे मिले। अधिकारियों ने करीब 274 कार्टन जब्त किए, जिनका अनुमानित बाजार मूल्य लगभग ₹5 करोड़ बताया गया है। विभाग ने बरामद स्टॉक को नियमानुसार कब्जे में लेकर आगे की जांच शुरू की।
औषधि नियंत्रण विभाग के अधिकारियों ने इतनी बड़ी मात्रा में दवाओं को सूखे कुएं में छिपाकर रखने को संदिग्ध माना है। जांच का एक प्रमुख उद्देश्य यह पता लगाना है कि दवाएं वहां किसने पहुंचाईं और उनका वास्तविक इस्तेमाल या संभावित वितरण किस उद्देश्य से किया जाना था।
हार्ट, डायबिटीज और एलर्जी की दवाएं शामिल
बरामद स्टॉक में अलग-अलग बीमारियों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल हैं। इनमें हृदय रोग, डायबिटीज और एलर्जी से संबंधित दवाएं भी बताई गई हैं।
रिपोर्टों में लोसार-50, जानुमेट, केटोरोल-एम, एलेग्रा-एम और जालरा जैसी दवाओं का उल्लेख किया गया है। विभाग ने बरामद दवाओं के नमूने लेकर प्रयोगशाला जांच के लिए भेजे हैं।
जांच में दवाओं के बैच नंबर, निर्माण कंपनी, निर्माण तिथि, एक्सपायरी डेट और वितरण से जुड़े रिकॉर्ड का मिलान किया जा रहा है। अधिकारियों का उद्देश्य यह पता लगाना है कि बरामद स्टॉक अधिकृत सप्लाई चेन का हिस्सा था या इसे किसी अनधिकृत तरीके से यहां रखा गया था।
आगरा तक पहुंची जांच की कड़ी
भरतपुर में दवाएं मिलने के बाद राजस्थान के औषधि नियंत्रण विभाग ने मामले की जानकारी उत्तर प्रदेश के औषधि नियंत्रक, आगरा के औषधि निरीक्षक और संबंधित दवा निर्माता कंपनियों के साथ साझा की।
इसके बाद आगरा के मलपुरा क्षेत्र में भी एक स्थान से बड़ी मात्रा में दवाइयों का स्टॉक बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई। संबंधित दवाओं के भंडारण और खरीद-बिक्री के लिए जरूरी लाइसेंस या रिकॉर्ड की भी जांच की गई। मलपुरा थाने में संबंधित आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज होने की बात रिपोर्टों में कही गई है।
इस घटनाक्रम से जांच अब राजस्थान के भरतपुर से आगे बढ़कर उत्तर प्रदेश के आगरा तक पहुंच गई है। दोनों राज्यों के अधिकारी दवाओं के बैच, स्रोत और वितरण नेटवर्क का मिलान कर रहे हैं।
क्या एक्सपायरी डेट बदलकर बिक्री की तैयारी थी?
जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कहीं बरामद दवाओं को उनकी समाप्ति तिथि बदलकर दोबारा बाजार में उतारने की तैयारी तो नहीं की जा रही थी।
हालांकि, इस आशंका की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। औषधि विभाग बरामद दवाओं की निर्माण और समाप्ति तिथियों तथा संबंधित कंपनियों के रिकॉर्ड की जांच कर रहा है। प्रयोगशाला रिपोर्ट और दस्तावेजी जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि दवाएं नकली, मिलावटी, अवधि-पार या किसी अन्य तरीके से अवैध रूप से रखी गई थीं।
इसलिए फिलहाल पूरे मामले को कथित अवैध भंडारण और संदिग्ध दवा सप्लाई नेटवर्क की जांच के रूप में देखना अधिक उचित है।

दवाओं को जलाने का वीडियो भी जांच के दायरे में
जांच के दौरान सलुआ उर्फ मुकीम नाम के गिरफ्तार आरोपी के मोबाइल फोन से कुछ वीडियो मिलने की बात सामने आई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 27 सितंबर की रात के एक वीडियो में दवाओं के ऊपर डीजल डालकर उन्हें जलाते हुए दृश्य दिखाई देते हैं।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि वीडियो में दिखाई गई दवाएं कौन-सी थीं, उन्हें क्यों नष्ट किया जा रहा था और इसका भरतपुर तथा आगरा में बरामद स्टॉक से कोई संबंध है या नहीं।
यदि वीडियो और जब्त स्टॉक के बीच कोई सीधा संबंध स्थापित होता है, तो यह मामले की सप्लाई चेन और दवाओं के निपटान से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों के जवाब दे सकता है।
हिमांशु अग्रवाल पर पहले भी दर्ज हो चुका है मामला
इस मामले में गिरफ्तार बताए गए हिमांशु अग्रवाल का नाम 2025 में आगरा में सामने आए कथित नकली दवा नेटवर्क से जुड़े मामले में भी आया था।
2025 की रिपोर्टों के अनुसार, आगरा में औषधि विभाग और पुलिस की कार्रवाई के दौरान हिमांशु अग्रवाल की फर्म से बड़ी मात्रा में संदिग्ध दवाएं बरामद की गई थीं। इंडियन एक्सप्रेस ने पुलिस के हवाले से बताया था कि उसके प्रतिष्ठान से करीब ₹3.5 करोड़ मूल्य की दवाएं जब्त की गई थीं और बाद में उस पर एक अधिकारी को ₹1 करोड़ की कथित रिश्वत देने की कोशिश का आरोप लगा था।
जागरण की रिपोर्ट में भी 2025 की कार्रवाई के दौरान उसके कथित तौर पर ₹1 करोड़ लेकर अधिकारियों के पास पहुंचने और गिरफ्तारी का उल्लेख किया गया था।
इन पुराने आरोपों और मौजूदा भरतपुर मामले के बीच जांच एजेंसियां किसी संभावित संबंध की भी पड़ताल कर रही हैं।
पिता के नाम से मेडिकल स्टोर लाइसेंस का भी जिक्र
मामले से जुड़ी जानकारी में यह भी सामने आया है कि हिमांशु अग्रवाल के पिता के नाम से पहले मेडिकल स्टोर का लाइसेंस था। अधिकारियों और जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार, हिमांशु का नाम पहले भी दवा कारोबार से जुड़े मामलों में सामने आया था।
हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ पूर्व में दर्ज मामला या गिरफ्तारी अपने आप मौजूदा मामले में आरोप साबित नहीं करती। भरतपुर मामले में उसकी भूमिका और बरामद दवाओं से उसका संबंध जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर तय होगा।
कुएं तक दवाएं कैसे पहुंचीं?
अब जांच का सबसे बड़ा सवाल यह है कि आगरा से दवाइयां भरतपुर के खटनावाली गांव तक कैसे पहुंचीं और उन्हें सूखे कुएं में छिपाने का फैसला किसने किया।
जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि दवाओं को ले जाने वाले वाहनों का रूट क्या था, उन्हें किसने रिसीव किया और कुएं की जानकारी आरोपियों को कैसे मिली।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, जिस स्थान पर दवाएं छिपाई गईं, उसका आसपास के किसी मेडिकल स्टोर या दवा कारोबार से संभावित संबंध होने की भी जांच की जा रही है। अभी इस कनेक्शन की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
सप्लाई चेन की जांच बनी सबसे अहम कड़ी
औषधि नियंत्रण विभाग अब निर्माता कंपनियों, डिपो, स्टॉकिस्ट, वितरकों और संभावित खरीदारों से जुड़े रिकॉर्ड की जांच कर रहा है। जांच का उद्देश्य बरामद स्टॉक का पूरा स्रोत और उसकी संभावित सप्लाई चेन स्थापित करना है।
यदि जांच में दवाओं के अवैध भंडारण, नकली निर्माण, मिलावट, एक्सपायरी डेट में बदलाव या अनधिकृत बिक्री के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित लोगों के खिलाफ लागू कानूनों के तहत आगे कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल राजस्थान और उत्तर प्रदेश, दोनों राज्यों में जांच जारी है। बरामद ₹5 करोड़ के दवा स्टॉक की प्रयोगशाला रिपोर्ट, दस्तावेजों की जांच और आरोपियों से पूछताछ इस मामले की अगली दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगी।











