भारत-EU FTA से श्रम-प्रधान उद्योग को मिलेगा बड़ा लाभ, अमेरिका ने जताई चिंता

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भारत-ईयू FTA पर यूरोप की नीतियों की आलोचना की। कहा कि व्यापार को मानवीय मुद्दों से ऊपर रखा गया और अमेरिका के हित नजरअंदाज

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भारत-ईयू FTA पर यूरोप की आलोचना की। उन्होंने कहा कि व्यापारिक लाभ को मानवीय मुद्दों पर प्राथमिकता दी गई और अमेरिका के टैरिफ हितों की अनदेखी हुई, जिससे नई बहस शुरू हो गई।

America: भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement - FTA) पर हस्ताक्षर होने के बाद अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय देशों की नीति पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। बुधवार को एक साक्षात्कार में बेसेंट ने कहा कि यूरोप ने व्यापार को मानवीय मुद्दों से ऊपर रखा है और इस समझौते के दौरान भारत से होने वाले व्यापार को लेकर अमेरिका के दृष्टिकोण का ध्यान नहीं रखा।

बेसेंट ने कहा कि वह यूरोप से निराश हैं क्योंकि भारत और यूरोपीय संघ के बीच समझौते से भारत को बड़े पैमाने पर निर्यात में लाभ मिलेगा, जबकि अमेरिकी टैरिफ के बराबर शुल्क लगाने के लिए यूरोप तैयार नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यूरोप रूस से तेल आपूर्ति से बने परिष्कृत उत्पादों को भारत से खरीद रहा है और इस वजह से अमेरिका को नुकसान हो रहा है।

भारत-ईयू FTA: 99% निर्यात पर शुल्क में कटौती

भारत और यूरोपीय संघ के बीच यह समझौता आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस समझौते के तहत, सात वर्षों में यूरोप भारत के 99 प्रतिशत निर्यात पर शुल्क समाप्त कर देगा। इसमें 33 अरब डॉलर के श्रम-प्रधान सामान शामिल हैं, जिनमें कपड़ा, चमड़ा, जूते, रत्न और आभूषण प्रमुख हैं।

भारत भी यूरोपीय संघ के 96.6 प्रतिशत निर्यात पर शुल्क में कटौती करेगा। इनमें से लगभग एक तिहाई कटौती समझौते के 2027 की शुरुआत में तुरंत लागू होगी। इस समझौते से दोनों पक्षों के व्यापारिक संबंधों को मजबूती मिलेगी और लागत में कमी आएगी, जिससे व्यापारिक प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

अमेरिकी टैरिफ और रूस के तेल पर विवाद

अमेरिका ने पिछले साल रूस से तेल की खरीद का हवाला देते हुए भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया था। अब बेसेंट ने कहा कि यूरोपीय देश इस समझौते के तहत भारत को होने वाले लाभ के बावजूद अमेरिकी टैरिफ के बराबर शुल्क लगाने को तैयार नहीं हैं।

उन्होंने कहा, "जब भी आप किसी यूरोपीय को यूक्रेनी लोगों के महत्व के बारे में बात करते हुए सुनें, तो याद रखें कि उन्होंने व्यापार को पहले रखा है।" यह बयान इस बात का संकेत देता है कि अमेरिका यूरोप के इस कदम से निराश है और इसे गंभीरता से देख रहा है।

भारत के साथ यूरोपीय नेताओं की भागीदारी

समझौते पर हस्ताक्षर होने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन की मेजबानी की। दोनों नेताओं को गणतंत्र दिवस समारोह में भी मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर कहा कि यह समझौता भारत और यूरोपीय संघ के बीच लंबे समय से चली आ रही आर्थिक साझेदारी को नई दिशा देगा। इसके माध्यम से भारतीय उत्पादों की पहुंच बड़े बाजारों तक होगी और दोनों पक्षों के निवेश और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा।

आर्थिक लाभ

विश्लेषकों के अनुसार, इस FTA से भारत के निर्यातक बड़े लाभ में रहेंगे। श्रम-प्रधान उद्योग जैसे कपड़ा, जूते और चमड़ा अब यूरोपीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी कीमत पर पहुंचेंगे। इससे भारत के उद्योगों को नई रोजगार संभावनाएं मिलेंगी और उत्पादन लागत कम होगी।

FTA के तहत कटौती की जाने वाली शुल्क से भारत के लिए यूरोपीय बाजार आसान और सुलभ होगा। साथ ही यूरोपीय कंपनियों के लिए भी भारतीय उत्पादों को खरीदना आसान हो जाएगा। दोनों देशों के बीच यह समझौता व्यापारिक रिश्तों को नए स्तर पर ले जाने में मदद करेगा।

अमेरिका की चिंता

अमेरिकी वित्त मंत्री की आलोचना का मुख्य आधार यह है कि यूरोप ने व्यापारिक लाभ को मानवीय या भू-राजनीतिक मुद्दों पर प्राथमिकता दी। बेसेंट ने कहा कि वह समझते हैं कि यूरोप अपने लिए सबसे अच्छा करना चाहता है, लेकिन इस मामले में उनका दृष्टिकोण निराशाजनक रहा।

उन्होंने कहा कि अमेरिकी टैरिफ के बराबर शुल्क लगाने के लिए यूरोप तैयार नहीं था और उन्हें यह समझने में कठिनाई हुई कि यूरोपीय देश व्यापार समझौते को क्यों पहले रखना चाहते थे। इस बयान ने अमेरिका-यूरोप-भारत के बीच व्यापारिक समीकरणों पर नई बहस शुरू कर दी है।

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