इंटरनेट के काम करने के तरीके को लेकर अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि भारत में खोली जाने वाली हर वेबसाइट या ई-मेल पहले अमेरिका के किसी रूट सर्वर पर जाती है और फिर वापस भारत आती है। हालांकि, तकनीकी रूप से यह पूरी तरह सही नहीं है।
टेक न्यूज़: भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में से एक बन चुका है। करोड़ों इंटरनेट उपयोगकर्ता, तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था और सरकारी सेवाओं के डिजिटलीकरण के बावजूद देश अभी भी इंटरनेट के एक महत्वपूर्ण तकनीकी ढांचे के लिए विदेशी नेटवर्क पर निर्भर है। यही वजह है कि भारत सरकार अब इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर को अधिक सुरक्षित, तेज और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है।
सरकार भारत में रूट सर्वर क्लस्टर स्थापित करने की संभावना पर काम कर रही है, जिससे देश की डिजिटल संप्रभुता (Digital Sovereignty) और साइबर सुरक्षा को मजबूत किया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भारत को इंटरनेट प्रबंधन के वैश्विक ढांचे में अधिक प्रभावशाली भूमिका दिला सकती है।
क्या होता है रूट सर्वर और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
इंटरनेट पर किसी भी वेबसाइट तक पहुंचने के लिए एक जटिल लेकिन व्यवस्थित प्रक्रिया काम करती है। जब कोई उपयोगकर्ता किसी वेबसाइट का नाम अपने ब्राउज़र में दर्ज करता है, तो सिस्टम को उस वेबसाइट का वास्तविक आईपी एड्रेस (IP Address) खोजने की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में रूट सर्वर अहम भूमिका निभाते हैं।
रूट सर्वर को इंटरनेट की “डायरेक्टरी” या “नेविगेशन सिस्टम” कहा जा सकता है। ये सर्वर डोमेन नेम सिस्टम (DNS) के शीर्ष स्तर पर कार्य करते हैं और इंटरनेट ट्रैफिक को सही दिशा में भेजने में मदद करते हैं। वर्तमान में दुनिया भर में 13 प्रमुख रूट सर्वर सिस्टम संचालित हैं, जिन्हें A से M तक के अक्षरों से पहचाना जाता है। इनका संचालन विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं करती हैं और इनमें से अधिकांश का मूल नियंत्रण अमेरिका से जुड़ा हुआ है।
भारत को अमेरिका पर क्यों रहना पड़ता है निर्भर?
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हालांकि इंटरनेट वैश्विक नेटवर्क है, लेकिन इसकी मूल संरचना ऐतिहासिक रूप से अमेरिका-केंद्रित रही है। अधिकांश प्रमुख रूट सर्वर ऑपरेटरों की उत्पत्ति अमेरिका में हुई और इंटरनेट के शुरुआती विकास का केंद्र भी वही रहा। भारत में किसी वेबसाइट, ई-मेल या ऑनलाइन सेवा तक पहुंचने के दौरान DNS क्वेरी अप्रत्यक्ष रूप से उन वैश्विक रूट सर्वर नेटवर्क से जुड़ती है जो मुख्य रूप से अमेरिका या अन्य विदेशी स्थानों पर स्थित हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर डेटा अमेरिका होकर गुजरता है, लेकिन इंटरनेट एड्रेसिंग सिस्टम का मूल नियंत्रण विदेशी इंफ्रास्ट्रक्चर पर आधारित है। यही कारण है कि भारत लंबे समय से अपने डिजिटल ढांचे को अधिक स्वतंत्र और सुरक्षित बनाने की आवश्यकता महसूस कर रहा है।
सरकार की नई योजना क्या है?
सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार ने वैश्विक इंटरनेट प्रशासन संस्था ICANN (Internet Corporation for Assigned Names and Numbers) के साथ रूट सर्वर क्लस्टर स्थापित करने को लेकर बातचीत शुरू की है। इस प्रस्ताव के तहत भारत में ऐसा क्लस्टर विकसित किया जा सकता है जो सभी 13 प्रमुख रूट सर्वरों का स्थानीय मिरर (Mirror) उपलब्ध कराए। इससे DNS क्वेरी के समाधान की प्रक्रिया अधिक तेज हो सकती है और इंटरनेट सेवाओं की विश्वसनीयता भी बढ़ सकती है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) का मानना है कि विशाल इंटरनेट उपयोगकर्ता आधार वाले देश के रूप में भारत को अपने डिजिटल हितों की सुरक्षा के लिए ऐसे बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है।
साइबर सुरक्षा और डिजिटल संप्रभुता को मिलेगा फायदा
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में रूट सर्वर क्लस्टर स्थापित होने से कई रणनीतिक लाभ मिल सकते हैं। सबसे पहले, इंटरनेट सेवाओं की उपलब्धता और स्थिरता मजबूत होगी। दूसरे, संभावित साइबर हमलों या नेटवर्क व्यवधानों की स्थिति में देश की प्रतिक्रिया क्षमता बेहतर हो सकती है। तीसरे, डेटा प्रबंधन और इंटरनेट गवर्नेंस के क्षेत्र में भारत की भूमिका और प्रभाव बढ़ेगा।
इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर DNS सेवाओं की उपलब्धता इंटरनेट की गति और दक्षता में भी सुधार ला सकती है, विशेषकर तब जब इंटरनेट उपयोगकर्ता संख्या लगातार बढ़ रही हो।











