भारत ने आधुनिक युद्ध चुनौतियों को देखते हुए 50 हजार जवानों की नई ड्रोन फोर्स बनाने का फैसला किया है। यह फोर्स किसी भी सैन्य हमले में पहली जवाबी कार्रवाई करेगी और भविष्य में BSF व ITBP जैसे सुरक्षा बल भी इससे जुड़ेंगे।
नई दिल्ली: भारत ने भविष्य के युद्धों की चुनौतियों को देखते हुए एक विशाल और अत्याधुनिक “ड्रोन फोर्स” तैयार करने का फैसला किया है। यह फोर्स किसी भी सैन्य हमले या सीमा संघर्ष की स्थिति में सबसे पहले जवाबी कार्रवाई करेगी। रक्षा सूत्रों के अनुसार करीब 50 हजार सैन्यकर्मियों को विशेष ड्रोन ऑपरेशन, निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकों की ट्रेनिंग दी जा रही है।
यह फैसला रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संघर्ष और हालिया सीमा सुरक्षा चुनौतियों से मिले अनुभवों के बाद लिया गया है। आधुनिक युद्धों में ड्रोन अब सिर्फ निगरानी का साधन नहीं रहे, बल्कि सटीक हमला, इलेक्ट्रॉनिक जामिंग और रियल टाइम इंटेलिजेंस का सबसे प्रभावी हथियार बन चुके हैं।
‘फर्स्ट रेस्पोंडर’ की भूमिका निभाएगी ड्रोन फोर्स
इंटीग्रेटेड रक्षा मुख्यालय की योजना के अनुसार यह नई फोर्स युद्ध के दौरान “फर्स्ट रेस्पोंडर” यानी सबसे पहले प्रतिक्रिया देने वाली यूनिट होगी। इसका मुख्य काम दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखना, सीमाओं की निगरानी करना और जरूरत पड़ने पर सटीक हमला करना होगा।
इस फोर्स को डेटा और कॉग्निटिव वारफेयर सिस्टम का तकनीकी समर्थन मिलेगा। साथ ही इसे भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड नेटवर्क और सेना के “आकाशतीर” एयर डिफेंस सिस्टम से जोड़ा जाएगा, ताकि ड्रोन ऑपरेशन पूरी तरह सुरक्षित और समन्वित रह सकें।
अगले तीन साल में बनेंगे 15 नए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस
भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान अगले तीन वर्षों में 15 नए “सेंटर ऑफ एक्सीलेंस” स्थापित करेगा। इन केंद्रों में सैनिकों को अत्याधुनिक सिम्युलेटर, वर्चुअल रियलिटी और रियल टाइम बैटल एनवायरमेंट के जरिए ट्रेनिंग दी जाएगी।
इन ट्रेनिंग सेंटरों का उद्देश्य सैनिकों को केवल ड्रोन उड़ाना सिखाना नहीं, बल्कि मल्टी-डोमेन वारफेयर यानी अंतरिक्ष, साइबर, समुद्र और जमीन पर एक साथ चलने वाले युद्ध के लिए तैयार करना है।
BSF और ITBP भी जुड़ेंगे नेटवर्क से
भविष्य में Border Security Force और Indo-Tibetan Border Police जैसी सुरक्षा एजेंसियों को भी इस ड्रोन नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। इससे सीमा सुरक्षा और आतंकी गतिविधियों पर निगरानी और मजबूत होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रोन आधारित निगरानी से दुर्गम इलाकों में जवानों की तैनाती का जोखिम कम होगा और सीमाई प्रतिक्रिया समय काफी तेज हो जाएगा।
हर सैनिक के पास होगा अपना ड्रोन
भारतीय सेना की सबसे महत्वाकांक्षी योजना “वन सोल्जर, वन ड्रोन” मॉडल है। इसके तहत हर सैनिक को बेसिक ड्रोन ऑपरेशन की ट्रेनिंग दी जाएगी। लक्ष्य यह है कि भविष्य के युद्धक्षेत्र में हर जवान के पास अपना माइक्रो ड्रोन हो, जिससे वह दुश्मन की गतिविधियों को तुरंत देख सके और रियल टाइम सूचना साझा कर सके।

सेना की योजना प्रत्येक कोर में करीब 8 हजार ड्रोन शामिल करने की है। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में भारतीय सेना के पास कुल एक लाख से अधिक ड्रोन की क्षमता विकसित हो सकती है।
पाकिस्तान के ड्रोन हमलों से मिला सबक
ड्रोन फोर्स की अवधारणा उस समय तेजी से आगे बढ़ी जब पिछले वर्ष पाकिस्तान की ओर से बड़ी संख्या में ड्रोन गतिविधियां देखी गईं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार दुश्मन का उद्देश्य भारत के एयर डिफेंस सिस्टम की कमजोरियों को समझना और कम लागत वाले ड्रोन के जरिए महंगे मिसाइल रक्षा तंत्र को आर्थिक रूप से चुनौती देना था।
इसी अनुभव के बाद भारत ने सॉफ्ट किल और हार्ड किल एंटी-ड्रोन तकनीकों पर तेजी से काम शुरू किया। सॉफ्ट किल तकनीक में ड्रोन को जैम या स्पूफ किया जाता है, जबकि हार्ड किल सिस्टम में लेजर आधारित डायरेक्टेड एनर्जी वेपन का उपयोग कर ड्रोन को हवा में ही नष्ट किया जाता है।
रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बन रहा भारत
India का रक्षा उत्पादन अब तेजी से बढ़ रहा है। देश का कुल रक्षा उत्पादन 1.54 लाख करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच चुका है। सरकार का दावा है कि रक्षा बजट का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा अब देश के भीतर ही खर्च किया जा रहा है।
ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सेक्टर में करीब 20 नई कंपनियां सक्रिय हैं। इन स्टार्टअप्स को लगभग 16 हजार एमएसएमई का समर्थन मिल रहा है।
रक्षा आयात में भी गिरावट दर्ज की गई है और भारत अब मिसाइल, सेंसर और ड्रोन टेक्नोलॉजी में तेजी से आत्मनिर्भर बन रहा है।
मिसाइलों का ‘दिल और दिमाग’ अब भारत में तैयार
भारतीय कंपनियां अब मिसाइल और ड्रोन के महत्वपूर्ण हिस्से देश में ही बना रही हैं। मिसाइल का “दिल” माने जाने वाले सीकर्स और “दिमाग” कहे जाने वाले इंजन अब भारतीय कंपनियां विकसित कर रही हैं।
पहले ये तकनीक मुख्य रूप से रूस से आती थी, लेकिन अब स्वदेशीकरण में तेजी आई है। उदाहरण के तौर पर BrahMos Missile के केवल 15 प्रतिशत पुर्जे वर्ष 2015 में भारत में बनते थे, जबकि अब यह आंकड़ा 72 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
भारत में ही होगा मिसाइलों का रखरखाव
इसी बीच यूरोपीय रक्षा कंपनी MBDA और भारतीय वायुसेना के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। इसके तहत Dassault Rafale लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल होने वाली MICA Missile का रखरखाव अब भारत में ही किया जाएगा।
इसके लिए देश में मेंटेनेंस, रिपेयर और मिड-लाइफ ओवरहॉल सुविधा विकसित की जाएगी। रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत की सैन्य आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं।
भविष्य के युद्ध होंगे ‘मल्टी-डोमेन’
रिटायर्ड एयर कमोडोर गौरव एम त्रिपाठी के अनुसार भविष्य के युद्ध केवल जमीन या हवा तक सीमित नहीं रहेंगे। आने वाले समय में युद्ध “मल्टी-डोमेन” होंगे, जहां अंतरिक्ष, साइबर, समुद्र और इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क एक साथ सक्रिय रहेंगे।
उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसे ड्रोन सामने आ सकते हैं जिन्हें जैम करना बेहद कठिन होगा। ये ड्रोन जीपीएस के बिना भी काम कर सकेंगे और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल होमिंग तकनीक के जरिए अपने लक्ष्य तक पहुंच जाएंगे।
इसके अलावा “स्वॉर्म ड्रोन अटैक” यानी झुंड में हमला करने वाले ड्रोन भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
भारत की सुरक्षा रणनीति में बड़ा बदलाव
नई ड्रोन फोर्स भारत की रक्षा नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। अब पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर क्षमता और स्वायत्त हथियार प्रणाली युद्ध का निर्णायक हिस्सा बन रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना सफल होती है, तो India दुनिया की उन चुनिंदा सैन्य शक्तियों में शामिल हो जाएगा, जिनके पास बड़े पैमाने पर समर्पित ड्रोन युद्ध क्षमता मौजूद है।









