भारत में राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सीमित: चुनावी आंकड़ों ने खोली राजनीतिक दलों की हकीकत

भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन चुनावी आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। उम्मीदवारों की संख्या, टिकट वितरण और

संसद में सितंबर 2023 में पारित हुए Nari Shakti Vandan Adhiniyam के बाद महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद जताई गई थी। हालांकि, हालिया चुनावी आंकड़े इस उम्मीद के अनुरूप तस्वीर पेश नहीं करते हैं।

नई दिल्ली: भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने को लेकर वर्षों से चर्चा होती रही है। संसद में 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण कानून) को इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना गया था। उम्मीद की जा रही थी कि इससे राजनीति में महिलाओं की उपस्थिति और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे। हालांकि हालिया चुनावी आंकड़े बताते हैं कि जमीनी स्तर पर स्थिति अभी भी अपेक्षित बदलाव से काफी दूर है।

लोकतांत्रिक सुधारों पर काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की एक रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा चुनाव 2024 और उसके बाद विभिन्न राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में हुए विधानसभा चुनावों में कुल 39,789 उम्मीदवार मैदान में उतरे। इनमें केवल 4,073 महिलाएं थीं, जो कुल उम्मीदवारों का महज 10.2 प्रतिशत हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित बनी हुई है।

राष्ट्रीय राजनीतिक दल महिलाओं को पर्याप्त टिकट देने में पीछे

रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं को चुनावी टिकट देने के मामले में देश के प्रमुख राष्ट्रीय दल अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं। लोकसभा चुनाव 2024 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 441 उम्मीदवारों में से 70 महिलाओं को टिकट दिया, जो कुल उम्मीदवारों का लगभग 16 प्रतिशत है। वहीं कांग्रेस ने 328 उम्मीदवारों में से 41 महिलाओं को मौका दिया, जो लगभग 13 प्रतिशत है।

महिला प्रतिनिधित्व के संदर्भ में कुछ क्षेत्रीय दल अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करते दिखाई दिए। बीजू जनता दल (BJD) ने अपने 33 प्रतिशत उम्मीदवार महिलाओं को बनाया, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने 29 प्रतिशत और तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने 25 प्रतिशत महिलाओं को टिकट दिया। तमिलनाडु की नाम तमिलर काची ने सबसे अधिक 50 प्रतिशत महिला उम्मीदवार उतारकर एक अलग उदाहरण प्रस्तुत किया।

इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि राजनीतिक दल सार्वजनिक मंचों पर महिलाओं के सशक्तिकरण की बात तो करते हैं, लेकिन टिकट वितरण में महिलाओं को समान अवसर देने के मामले में अभी भी संकोच दिखाई देता है।

भारत में राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सीमित: चुनावी आंकड़ों ने खोली राजनीतिक दलों की हकीकत

लोकसभा और विधानसभा चुनावों में महिलाओं की स्थिति

लोकसभा चुनाव 2024 में कुल 8,360 उम्मीदवारों में से केवल 800 महिलाएं थीं, जो कुल उम्मीदवारों का 9.6 प्रतिशत हैं। कई राज्यों में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत से भी कम रही। ओडिशा विधानसभा चुनाव 2024 में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 13.9 प्रतिशत दर्ज की गई। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में यह आंकड़ा 13.7 प्रतिशत रहा, जबकि पुडुचेरी विधानसभा चुनाव 2026 में 13.6 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में 13.2 प्रतिशत महिला उम्मीदवार मैदान में उतरीं।

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023 में महिलाओं की हिस्सेदारी 13.1 प्रतिशत रही। वहीं तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत 11 प्रतिशत दर्ज किया गया। कुछ राज्यों में स्थिति और अधिक चिंताजनक दिखाई दी। अरुणाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव 2024 में केवल 4.9 प्रतिशत महिला उम्मीदवार थीं। जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव 2024 में भी महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 5 प्रतिशत के आसपास रही।

महिला आरक्षण कानून से क्या बदलेगी तस्वीर?

विशेषज्ञों का मानना है कि महिला आरक्षण कानून भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन केवल संवैधानिक प्रावधान पर्याप्त नहीं होंगे। राजनीतिक दलों को टिकट वितरण में महिलाओं को अधिक अवसर देने होंगे और संगठनात्मक स्तर पर भी उनकी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि दल स्वेच्छा से अधिक महिलाओं को उम्मीदवार बनाएं, तो संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व तेजी से बढ़ सकता है। इससे न केवल लोकतंत्र अधिक समावेशी बनेगा बल्कि नीति निर्माण में भी विविध दृष्टिकोण शामिल होंगे।

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