चुनाव आयोग ने SIR में इस्तेमाल सॉफ्टवेयर का नाम और वर्जन बताने से इनकार किया है। RTI जवाब में ट्रेड सीक्रेट का हवाला दिया गया। आयोग ने AI के इस्तेमाल पर स्थिति स्पष्ट नहीं की। नाम हटाने का फैसला ERO का बताया।
नई दिल्ली: मतदाता सूची में गड़बड़ियां पकड़ने के लिए चुनाव आयोग कौन सा सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करता है, यह सवाल अब सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए उठाया गया है। आयोग से सॉफ्टवेयर का नाम, वर्जन और उसकी कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी मांगी गई थी, लेकिन उसने कई सवालों का सीधा जवाब नहीं दिया। आयोग ने नाम और वर्जन की जानकारी रोकने के लिए ट्रेड सीक्रेट और बौद्धिक संपदा अधिकारों का हवाला दिया है। AI और मशीन लर्निंग के इस्तेमाल पर भी स्थिति स्पष्ट नहीं की गई। हालांकि आयोग ने कहा कि SIR के लिए कोई नया सॉफ्टवेयर तैयार नहीं किया गया और न ही खरीदा गया।
तेलंगाना के सामाजिक कार्यकर्ता ने RTI में पूछे थे सवाल
हिंदुस्तान टाइम्स की 25 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना के करीमनगर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता एमए मुजीब अय्यूब ने चुनाव आयोग से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी थी। उनके सवाल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR में इस्तेमाल होने वाली तकनीक को लेकर थे।
अय्यूब जानना चाहते थे कि वोटर लिस्ट में गलतियां, दोहरी एंट्री या संदिग्ध रिकॉर्ड पहचानने के लिए किस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने सॉफ्टवेयर का नाम और वर्जन पूछा। इसके अलावा यह भी जानना चाहा कि क्या किसी मतदाता का रिकॉर्ड जांच के लिए अपने आप चिह्नित होता है और ऐसे मामलों में आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है।
आयोग ने 16 अक्टूबर 2026 को इस RTI आवेदन का जवाब दिया। इसमें कुछ सवालों पर कानून की अलग-अलग धाराओं का उल्लेख किया गया, जबकि नाम जोड़ने या हटाने की जिम्मेदारी स्थानीय चुनाव अधिकारी की बताई गई।
सॉफ्टवेयर का नाम बताने से आयोग ने क्यों किया इनकार?
RTI के पहले सवाल में सॉफ्टवेयर का नाम और उसका वर्जन मांगा गया था। आयोग ने यह जानकारी देने से मना कर दिया। इसके लिए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(d) का हवाला दिया गया।
इस धारा के तहत कारोबारी गोपनीयता, ट्रेड सीक्रेट और बौद्धिक संपदा से जुड़ी ऐसी जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट मिल सकती है, जिसके खुलासे से किसी तीसरे पक्ष के प्रतिस्पर्धी हितों को नुकसान पहुंचता हो। हालांकि कानून में व्यापक जनहित के आधार पर जानकारी देने का प्रावधान भी है।
आयोग ने अपने जवाब में यह जरूर स्पष्ट किया कि SIR के लिए अलग से कोई नया सॉफ्टवेयर विकसित नहीं किया गया है। इस काम के लिए नया सॉफ्टवेयर खरीदने की बात से भी इनकार किया गया। लेकिन पहले से मौजूद किस तकनीकी सिस्टम का इस्तेमाल हुआ, इसका नाम नहीं बताया गया।
क्या वोटर लिस्ट की जांच में AI का इस्तेमाल हुआ?
RTI में सबसे अहम सवालों में एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर था। पूछा गया था कि मतदाताओं के रिकॉर्ड में गड़बड़ी पहचानने के लिए AI, मशीन लर्निंग या प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स जैसी तकनीकों का इस्तेमाल हुआ या नहीं।
इस सवाल पर आयोग ने न तो हां कहा और न ही साफ तौर पर इनकार किया। उसका जवाब था कि आवेदन में मांगा गया स्पष्टीकरण RTI कानून की धारा 2(f) में दी गई सूचना की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आता।
यही जवाब उन सवालों पर भी दिया गया, जिनमें रिकॉर्ड अपने आप चिह्नित होने और गलत तरीके से किसी सही मतदाता का नाम संदिग्ध बताए जाने से बचाने के इंतजाम पूछे गए थे।
इसलिए फिलहाल उपलब्ध जवाब के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि SIR में AI का इस्तेमाल हुआ था। यह दावा भी नहीं किया जा सकता कि AI का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं हुआ।
वोटर लिस्ट से नाम हटाने का फैसला कौन करता है?
RTI में यह भी पूछा गया कि सॉफ्टवेयर अगर किसी मतदाता के रिकॉर्ड को संदिग्ध बताता है तो क्या उसका नाम अपने आप हटाया जा सकता है। इस पर आयोग ने निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी यानी ERO की जिम्मेदारी बताई।
आयोग के अनुसार, संबंधित विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने का अधिकार ERO के पास होता है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13B(1) और 13B(2) में इस अधिकारी की भूमिका निर्धारित है।
आयोग ने कहा कि किसी मतदाता का नाम जोड़ने या हटाने का फैसला तथ्यों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर किया जाता है। हालांकि सॉफ्टवेयर की ओर से चिह्नित रिकॉर्ड अधिकारी तक कैसे पहुंचता है और उसकी जांच किन चरणों में होती है, इस बारे में अलग से विस्तृत जानकारी नहीं दी गई।
रिकॉर्ड की जांच करने वालों पर भी नहीं मिली पूरी जानकारी
अय्यूब ने यह सवाल भी पूछा था कि सॉफ्टवेयर किसी रिकॉर्ड में गलती दिखाता है तो उसे कौन देखता है। संबंधित अधिकारी की मंजूरी किस स्तर पर ली जाती है और गलत पहचान के मामलों से बचने की क्या व्यवस्था है?
आयोग ने रिकॉर्ड की समीक्षा और मंजूरी से जुड़े सवाल पर RTI कानून की धारा 8(1)(g) का उल्लेख किया। यह धारा ऐसी जानकारी के खुलासे से छूट देती है, जिससे किसी व्यक्ति की जान या शारीरिक सुरक्षा को खतरा हो सकता है अथवा गोपनीय स्रोत की पहचान सामने आ सकती है।
इसके साथ ही आयोग ने ERO की कानूनी जिम्मेदारी दोहराई। लेकिन तकनीकी प्रक्रिया में अलग-अलग अधिकारियों की भूमिका के बारे में आवेदनकर्ता को विस्तृत जवाब नहीं मिला।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपील करने की सलाह दी
चुनाव आयोग के जवाब पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने कहा कि आवेदनकर्ता को जानकारी हासिल करने के लिए सक्षम अपीलीय प्राधिकारी के सामने अपील करनी चाहिए।
रावत के मुताबिक, यह कानूनी मामला है और जिन सवालों के जवाब नहीं मिले हैं, उनके लिए RTI की अपील प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
दरअसल, मतदाता सूची तैयार करने में तकनीक का इस्तेमाल और उस पर अधिकारियों की निगरानी दोनों महत्वपूर्ण विषय हैं। कंप्यूटर के जरिए किसी रिकॉर्ड में संभावित गलती पहचानना एक प्रक्रिया है, जबकि जांच के बाद मतदाता का नाम हटाने का कानूनी फैसला अलग प्रक्रिया है। दोनों के बीच अंतर स्पष्ट रहना जरूरी है।
दो चुनाव आयुक्तों ने वरिष्ठ अधिकारी की शिकायत की थी
सॉफ्टवेयर पर RTI का जवाब ऐसे समय सामने आया है, जब चुनाव आयोग के भीतर प्रशासनिक फैसलों को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां भी चर्चा में हैं।
एक अन्य RTI आवेदन से सामने आए दस्तावेजों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे। इनमें वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज पर सवाल उठाए गए थे।
दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया था कि गर्ग ने आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच काम के बंटवारे में बदलाव कर दिया, जबकि इस फैसले पर पहले आयोग से चर्चा नहीं की गई थी।
यह विवाद 28 जुलाई को जारी एक प्रशासनिक आदेश से जुड़ा था। आदेश में वरिष्ठ अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों और फाइलों के आवंटन में बदलाव किया गया था।
कैबिनेट सचिवालय ने शिकायत पर कार्रवाई क्यों नहीं की?
रिटायर्ड नौसेना अधिकारी और RTI कार्यकर्ता लोकेश के. बत्रा को मिले दस्तावेजों में बताया गया कि कैबिनेट सचिवालय ने दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्रों का परीक्षण किया था।
सचिवालय का कहना था कि ये पत्र दोनों आयुक्तों की व्यक्तिगत हैसियत से भेजे गए थे। इन्हें पूरे चुनाव आयोग की आधिकारिक शिकायत नहीं माना जा सकता था। ऐसी स्थिति में सीधे कार्रवाई करने से संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप का सवाल उठ सकता था।
इसके बाद 5 अगस्त को दोनों आयुक्तों को पत्र मिलने की पुष्टि भेजी गई। संबंधित दस्तावेज मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग तक भी पहुंचाए गए।
चुनाव आयोग ने पहले स्पष्ट किया था कि विवादित कार्य आवंटन आदेश लागू नहीं किए गए थे। आयोग के मुताबिक, अधिकारियों के बीच अलग-अलग राय सामने आना उसकी आंतरिक निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है।
SIR में पारदर्शिता को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के जरिए चुनाव आयोग मतदाता सूची की जांच और उसे अपडेट करने का काम करता है। इसमें पात्र लोगों के नाम शामिल करना, गलत प्रविष्टियां सुधारना और नियमों के मुताबिक अपात्र नाम हटाना शामिल है।
लेकिन जब बड़ी संख्या में मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच होती है, तब यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि संभावित गलतियों की पहचान किस तरीके से की गई। अगर किसी व्यक्ति का रिकॉर्ड गलत तरीके से संदिग्ध चिह्नित हो जाए तो उसकी जांच और सुधार की व्यवस्था भी अहम होती है।
आयोग ने स्पष्ट किया है कि अंतिम कानूनी जिम्मेदारी ERO की है। दूसरी तरफ RTI आवेदन में पूछे गए कई तकनीकी सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। इन सवालों का जवाब अपील के जरिए मिलता है या नहीं, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।









