बिहार विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की आठ सीटों पर आए चुनाव परिणाम के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर राजनीतिक खींचतान तेज हो गई है। चुनाव के दौरान और नतीजे आने के बाद सहयोगी दलों के बीच जिस तरह के मतभेद सामने आए हैं, उससे बिहार की सियासत में नई चर्चा शुरू हो गई है। खासकर भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के बीच बढ़ती तल्खी को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी के बयान ने इस विवाद को और हवा दे दी है।
दरअसल, बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए 23 अक्टूबर को मतदान हुआ था। इनमें चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र और चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्र शामिल थे। चुनाव परिणाम 28 और 29 अक्टूबर को सामने आए। इन नतीजों में कई बड़े राजनीतिक उलटफेर देखने को मिले। पटना शिक्षक सीट पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और पांच बार के विधान पार्षद रहे नवल किशोर यादव को हार का सामना करना पड़ा। वहीं दरभंगा शिक्षक सीट पर जन सुराज के उम्मीदवार सुरेश प्रसाद राय ने जीत दर्ज कर पार्टी का विधान परिषद में खाता खोला। इसके अलावा सारण शिक्षक और तिरहुत स्नातक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जदयू के अधिकृत प्रत्याशियों को शिकस्त दी।
चुनाव परिणाम आने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र और तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र को लेकर हो रही है। सारण शिक्षक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार राहुल राज ने जदयू के आनंद पुष्कर को हराया। वहीं तिरहुत स्नातक सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी वंशीधर ब्रजवासी ने जदयू के अभिषेक झा को पराजित किया। इन दोनों सीटों पर जदयू उम्मीदवारों की हार ने गठबंधन के भीतर चुनावी तालमेल और सहयोग को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विवाद उस समय और बढ़ गया जब चुनाव जीतने के बाद दोनों निर्दलीय विधान पार्षदों को भाजपा के करीब देखा जाने लगा। राहुल राज और वंशीधर ब्रजवासी ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात की और भाजपा विधायक दल की बैठक में भी शामिल हुए। इसके बाद दोनों ने एनडीए सरकार को समर्थन देने की घोषणा की। हालांकि दल-बदल से जुड़े कानूनी प्रावधानों के कारण भाजपा में औपचारिक रूप से शामिल होने का मामला विवादित हो गया और दोनों नेताओं ने अपने रुख में बदलाव करते हुए पार्टी में शामिल होने के बजाय समर्थन देने की बात कही।
इस पूरे घटनाक्रम पर जदयू नेताओं ने नाराजगी जताई। पार्टी का कहना है कि जिन उम्मीदवारों ने एनडीए के आधिकारिक प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव लड़ा था और उन्हें हराया था, उन्हें जीत के तुरंत बाद भाजपा के करीब लाना गठबंधन की भावना के अनुकूल नहीं है। जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने भी इस मामले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिस नेता को पार्टी ने छह साल के लिए निष्कासित किया था, उसे चुनाव जीतने के तुरंत बाद वापस लेने के प्रयास पर भाजपा नेतृत्व को विचार करना चाहिए।
इसी बीच सारण शिक्षक सीट से चुनाव हारने वाले जदयू प्रत्याशी आनंद पुष्कर ने भी भाजपा के कुछ नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि चुनाव के दौरान गठबंधन के धर्म का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। पुष्कर ने भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी, जनार्दन सिंह सिग्रीवाल और राधामोहन सिंह की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें गठबंधन उम्मीदवार के पक्ष में अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। इन नेताओं के संसदीय क्षेत्र सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।
आनंद पुष्कर ने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले गठबंधन के स्तर पर जो सहमति बनी थी, उसे जमीन पर लागू नहीं किया गया। उनका कहना था कि एनडीए के नेताओं और जनप्रतिनिधियों को शिक्षकों के बीच जाकर उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करना था, लेकिन कई नेताओं ने इस दिशा में अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि गठबंधन में सहयोग का नियम केवल भाजपा के उम्मीदवारों के लिए है या फिर सहयोगी दलों के प्रत्याशियों के लिए भी समान रूप से लागू होता है।
आनंद पुष्कर के इन आरोपों पर भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी ने अपनी प्रतिक्रिया दी। रूडी ने राजपूत समाज के नेताओं की राजनीतिक हैसियत को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि बिहार में ऐसा कोई राजपूत नेता नहीं है जिसके कहने पर इस समाज के लोग किसी पार्टी को वोट दें या चुनाव मैदान से हट जाएं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भाजपा नेतृत्व किसी राजपूत नेता को इतना महत्व दे रहा है कि उसके कहने पर लोग अपनी राजनीतिक रणनीति बदल लें। रूडी का यह बयान सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद और गहरा गया है।
रूडी की टिप्पणी को आनंद पुष्कर के आरोपों के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। चुनाव के दौरान भाजपा सांसदों की भूमिका को लेकर उठे सवाल और उसके बाद राजपूत नेतृत्व पर दिया गया बयान अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। इससे भाजपा और जदयू के बीच पहले से मौजूद असहजता और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
तिरहुत स्नातक सीट पर भी जदयू को इसी तरह की स्थिति का सामना करना पड़ा। यहां पार्टी के उम्मीदवार अभिषेक झा को निर्दलीय प्रत्याशी वंशीधर ब्रजवासी ने 9147 मतों से हराया। हार के बाद अभिषेक झा ने भी चुनाव में अपने खिलाफ राजनीतिक चक्रव्यूह रचे जाने की बात कही थी। उन्होंने अपनी हार को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से गठबंधन के भीतर के कुछ लोगों की भूमिका पर सवाल उठाए थे। जदयू सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने भी आरोप लगाया था कि एनडीए के कुछ नेताओं ने अभिषेक झा का पूरी ईमानदारी से समर्थन नहीं किया।
इन घटनाओं ने जदयू के भीतर नाराजगी को और बढ़ा दिया है। पार्टी के लिए परेशानी यह भी है कि जिन निर्दलीय उम्मीदवारों ने उसके प्रत्याशियों को हराया, वे अब भाजपा और एनडीए के करीब दिखाई दे रहे हैं। जदयू नेतृत्व इसे चुनावी सहयोग और गठबंधन की आपसी समझ के लिहाज से महत्वपूर्ण मुद्दा मान रहा है।
हालांकि एनडीए के अन्य सहयोगी दलों की ओर से इस घटनाक्रम पर अलग रुख देखने को मिला है। लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान तथा हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन ने निर्दलीय विधान पार्षदों के एनडीए सरकार को समर्थन देने पर आपत्ति नहीं जताई है। उनका कहना है कि किसी निर्वाचित सदस्य का सरकार को समर्थन देना अपने आप में गलत नहीं है। हालांकि औपचारिक रूप से किसी दल में शामिल होने और उससे जुड़े कानूनी प्रावधान अलग विषय हैं।
इस बीच जदयू ने चुनाव परिणाम और पार्टी के प्रदर्शन की समीक्षा करने का फैसला किया है। इसके लिए पांच नवंबर को बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में चुनाव में मिली हार, गठबंधन के नेताओं की भूमिका और संगठनात्मक स्तर पर हुई कमियों पर चर्चा होने की संभावना है। बैठक के बाद पार्टी का आधिकारिक रुख सामने आ सकता है।
बिहार की राजनीति में इस पूरे घटनाक्रम को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि भाजपा और जदयू राज्य की सत्ता में प्रमुख सहयोगी दल हैं। दोनों के बीच बेहतर तालमेल एनडीए सरकार की मजबूती के लिए जरूरी है। ऐसे में विधान परिषद चुनाव के बाद सामने आए मतभेद और नेताओं के सार्वजनिक बयान गठबंधन के सामने नई चुनौती खड़ी कर रहे हैं। अब सबकी नजर पांच नवंबर की जदयू समीक्षा बैठक और भाजपा नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर टिकी है।










