संयुक्त राष्ट्र के नए महासचिव के चुनाव को लेकर वीटो पावर का मुद्दा चर्चा में है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर का कहना है कि भारत इस मामले में दूसरे देशों को साथ लाकर चुनाव के तरीके में बदलाव की पहल कर सकता है।
नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र में नया महासचिव चुनने की प्रक्रिया को लेकर बहस तेज हो गई है। इस बार सवाल सुरक्षा परिषद के उन पांच स्थायी देशों की ताकत पर उठ रहा है, जिनके पास वीटो पावर है। इसी मुद्दे पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भारत के लिए एक मौका देखा है। उनका कहना है कि अगर सुरक्षा परिषद किसी एक नाम पर सहमत नहीं हो पाती, तो भारत को चुप बैठने के बजाय दूसरे देशों से बात करनी चाहिए।
थरूर चाहते हैं कि महासचिव चुनने में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य देशों की भी बड़ी भूमिका हो। फिलहाल सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी देशों का इस प्रक्रिया पर काफी असर रहता है।
शशि थरूर ने भारत को लेकर क्या कहा?
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मंगलवार, 3 नवंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की चुनाव प्रक्रिया में बदलाव के सुझाव का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यदि सुरक्षा परिषद नवंबर में भी किसी उम्मीदवार के नाम पर सहमति नहीं बना पाती है, तो भारत को संयुक्त राष्ट्र महासभा के दूसरे सदस्य देशों के साथ बातचीत करने पर विचार करना चाहिए।
थरूर ने यह सवाल प्रोफेसर वेसेलिन पोपोव्स्की के एक लेख को लेकर उठाया। पोपोव्स्की ने हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित लेख में महासचिव के चुनाव पर सुरक्षा परिषद के नियंत्रण को कम करने और महासभा को अधिक अधिकार देने की वकालत की थी। थरूर के मुताबिक, भारत के पास इस मुद्दे पर दूसरे देशों को साथ लेकर चुनाव प्रक्रिया में सुधार की पहल करने का अवसर हो सकता है। हालांकि, उन्होंने इसे एक सुझाव के तौर पर रखा है। भारत सरकार की ओर से ऐसी कोई नई पहल घोषित नहीं की गई है।
महासचिव के चुनाव में आखिर विवाद क्यों हुआ?
संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का दूसरा कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को समाप्त हो रहा है। नए महासचिव को 1 जनवरी 2027 से जिम्मेदारी संभालनी है। इस पद के लिए कई देशों ने अपने उम्मीदवार उतारे हैं। इनमें कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिनस्पैन और गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स बर्केट भी शामिल हैं।
इस बार संयुक्त राष्ट्र को पहली महिला महासचिव मिलने की संभावना पर काफी चर्चा हो रही है। हालांकि, उम्मीदवारों के नाम पर सुरक्षा परिषद में सहमति नहीं बन पा रही है। अक्टूबर में हुई अनौपचारिक मतदान प्रक्रिया के दौरान दोनों महिला उम्मीदवारों को स्थायी सदस्यों की ओर से विरोध के संकेत मिले थे। इससे उनके चयन की राह मुश्किल हो गई।
30 अक्टूबर को सातवें दौर के मतदान में रेबेका ग्रिनस्पैन को 11 सदस्यों का समर्थन मिला, लेकिन चार सदस्यों ने उनकी उम्मीदवारी का विरोध किया। यह मतदान औपचारिक वीटो नहीं था। इसके बावजूद किसी स्थायी सदस्य का विरोध अंतिम चयन में बाधा बन सकता है।
पांच देशों के पास क्यों है वीटो पावर?
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस पांच स्थायी सदस्य हैं। बाकी 10 सदस्य सीमित कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं। महासचिव की नियुक्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 97 के तहत सुरक्षा परिषद पहले उम्मीदवार के नाम की सिफारिश करती है। इसके बाद महासभा उस उम्मीदवार की नियुक्ति करती है।
सुरक्षा परिषद में किसी उम्मीदवार की औपचारिक सिफारिश के लिए कम से कम नौ सदस्यों का समर्थन जरूरी है। साथ ही पांच स्थायी सदस्यों में से किसी का वीटो नहीं होना चाहिए। इसी व्यवस्था के कारण कोई उम्मीदवार अधिकतर सदस्यों का समर्थन हासिल करने के बावजूद महासचिव नहीं बन सकता। अब इसी प्रक्रिया में बदलाव की मांग उठ रही है।
महासभा को ज्यादा अधिकार देने का क्या है प्रस्ताव?
प्रोफेसर वेसेलिन पोपोव्स्की ने अपने लेख में सुझाव दिया कि महासचिव चुनने की प्रक्रिया में संयुक्त राष्ट्र महासभा को ज्यादा निर्णायक भूमिका मिलनी चाहिए। उनका कहना है कि सुरक्षा परिषद केवल एक उम्मीदवार का नाम भेजने के बजाय कई नाम महासभा के सामने रखे। इससे सदस्य देशों को अलग-अलग उम्मीदवारों पर विचार करने का मौका मिल सकेगा।
एक दूसरा सुझाव यह भी है कि महासभा प्रस्ताव पारित करके सुरक्षा परिषद से एक से ज्यादा उम्मीदवारों की सिफारिश करने को कह सकती है। इसके अलावा उम्मीदवारों के मूल्यांकन के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाने का विचार भी सामने आया है। हालांकि, ये फिलहाल प्रस्ताव हैं। संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा नियमों के अनुसार महासचिव की नियुक्ति के लिए सुरक्षा परिषद की सिफारिश जरूरी है। इस व्यवस्था में बदलाव को लेकर कानूनी और राजनीतिक सहमति की आवश्यकता होगी।
खुद महासचिव का चुनाव लड़ चुके हैं शशि थरूर
शशि थरूर लंबे समय तक संयुक्त राष्ट्र से जुड़े रहे हैं। उन्होंने 1978 में संयुक्त राष्ट्र में काम करना शुरू किया था और 2007 तक अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाईं। साल 2006 में भारत सरकार ने उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद के लिए उम्मीदवार बनाया था। उस चुनाव में सात उम्मीदवारों के बीच वह दूसरे स्थान पर रहे थे।
आखिरकार दक्षिण कोरिया के बान की मून महासचिव चुने गए। इसके बाद थरूर ने संयुक्त राष्ट्र से इस्तीफा दे दिया। बाद में उन्होंने भारतीय राजनीति में कदम रखा और 2009 में तिरुवनंतपुरम से लोकसभा चुनाव जीता। संयुक्त राष्ट्र में अपने लंबे अनुभव के कारण थरूर महासचिव के चुनाव और संगठन में सुधार के मुद्दों पर लगातार अपनी राय रखते रहे हैं।
क्या भारत संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका निभा सकता है?
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करता रहा है। भारत का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में दुनिया के कई बड़े और विकासशील देशों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। अक्टूबर 2026 में भी भारत ने महासचिव के चयन में महासभा की भूमिका बढ़ाने का समर्थन किया था। ऐसे में शशि थरूर का ताजा सुझाव इसी चर्चा को आगे बढ़ाता है।
हालांकि, महासभा में दूसरे देशों का समर्थन हासिल करना और सुरक्षा परिषद की मौजूदा प्रक्रिया में बदलाव कराना आसान नहीं होगा। अब नजर इस बात पर रहेगी कि नवंबर में सुरक्षा परिषद किसी उम्मीदवार के नाम पर सहमति बना पाती है या महासचिव के चुनाव की प्रक्रिया में बदलाव की मांग और तेज होती है।









