एशियाई खेलों में ब्रॉन्ज के बाद गोल्ड के लिए दौड़ेंगी चंबा की सीमा मां केसरी देवी कर रहीं भगवान से प्रार्थना

चंबा की धाविका सीमा एशियाई खेलों में 10 हजार मीटर का ब्रॉन्ज जीतने के बाद 5000 मीटर में गोल्ड के लिए दौड़ेंगी। मां केसरी देवी बेटी की जीत के लिए प्रार्थना कर रही हैं।
एशियाई खेलों में ब्रॉन्ज के बाद गोल्ड के लिए दौड़ेंगी चंबा की सीमा मां केसरी देवी कर रहीं भगवान से प्रार्थना
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हिमाचल प्रदेश के चंबा की बेटी और धाविका सीमा कुमारी एक बार फिर एशियाई खेलों के ट्रैक पर उतरने जा रही हैं। 10 हजार मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर भारत का खाता खोलने वाली सीमा अब 5000 मीटर की दौड़ में पदक का रंग बदलने के इरादे से मैदान में उतरेंगी। जापान के आइची-नागोया में चल रहे एशियाई खेलों में सोमवार को होने वाली 5000 मीटर स्पर्धा को लेकर चंबा से लेकर पूरे हिमाचल तक उत्साह का माहौल है। सीमा के परिवार, गांव और खेल प्रेमियों को उनसे शानदार प्रदर्शन की उम्मीद है। सीमा ने इससे पहले 10 हजार मीटर की रेस में 32 मिनट 50.05 सेकेंड का समय निकालकर कांस्य पदक जीता था। इस प्रदर्शन ने उनके आत्मविश्वास को और मजबूत किया है।

5000 मीटर की दौड़ सीमा के लिए एक और बड़ी चुनौती होगी, लेकिन 10 हजार मीटर में पोडियम फिनिश के बाद उनका हौसला बढ़ा हुआ है। सीमा ने एशियाई खेलों के लिए अपनी तैयारी के दौरान लंबी दूरी की रेस के साथ-साथ गति और तकनीक पर भी काम किया है। 5000 मीटर में उन्हें कम दूरी में तेज रफ्तार बनाए रखने और शुरुआती तथा अंतिम चरण में सही रणनीति अपनाने की जरूरत होगी। इस स्पर्धा में भारत की पारुल चौधरी भी चुनौती पेश करेंगी। सीमा ने इससे पहले ही साफ किया था कि उनका लक्ष्य सिर्फ भाग लेना नहीं, बल्कि स्वर्ण पदक के लिए पूरी ताकत से प्रयास करना है।

सीमा की इस दौड़ से सबसे ज्यादा भावनात्मक रूप से उनका परिवार जुड़ा हुआ है। चंबा के रेटा गांव में उनकी मां केसरी देवी बेटी की सफलता के लिए भगवान से प्रार्थना कर रही हैं। 10 हजार मीटर में जब सीमा ने कांस्य पदक जीता था, तब भी उनकी मां ने बेटी की दौड़ के दौरान भगवान से उसकी जीत की प्रार्थना की थी। अब 5000 मीटर की स्पर्धा से पहले मां की उम्मीदें और भी बढ़ गई हैं। केसरी देवी ने बेटी की सफलता के लिए कुलदेवी से मन्नत मांगी है और चाहती हैं कि उनकी बेटी इस बार स्वर्ण पदक लेकर लौटे। बेटी की उपलब्धियों को याद करते हुए उनकी आंखों में खुशी के आंसू भी छलक आते हैं।

सीमा की कहानी सिर्फ एक सफल खिलाड़ी की कहानी नहीं है, बल्कि संघर्ष और परिवार के सहयोग की भी कहानी है। चंबा के रेटा जैसे पहाड़ी गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के एथलेटिक्स ट्रैक तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं रहा। कम उम्र में पिता को खोने के बाद परिवार की जिम्मेदारियां उनकी मां केसरी देवी के कंधों पर आ गई थीं। इसके बावजूद उन्होंने अपने छह बच्चों को संभाला और सीमा के खेल के सपने को आगे बढ़ने दिया। सीमित आर्थिक संसाधनों के बीच बेटी की ट्रेनिंग और खेल से जुड़ी जरूरतों को पूरा करना परिवार के लिए बड़ी चुनौती रहा, लेकिन मां ने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी।

सीमा ने भी अपने संघर्ष के दौरान दौड़ना नहीं छोड़ा। पहाड़ों के रास्तों और गांव के वातावरण से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। यही वजह है कि उनकी उपलब्धि चंबा के लोगों के लिए खास महत्व रखती है। 10 हजार मीटर में कांस्य जीतने के बाद जब सीमा ने पोडियम पर जगह बनाई तो उनके गांव और परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। अब 5000 मीटर में उनकी दूसरी बड़ी चुनौती का इंतजार किया जा रहा है।

सीमा ने कांस्य पदक जीतने के बाद कहा था कि इस सफलता से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है, लेकिन उनका ध्यान अब 5000 मीटर पर है। उन्होंने बताया कि वह अपनी रणनीति के मुताबिक दौड़ने और ट्रैक पर अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए तैयार हैं। सीमा ने अपनी साथी भारतीय धाविका पारुल चौधरी के साथ अभ्यास का भी जिक्र किया है। उनका कहना है कि एशियाई खेलों का यह अनुभव आगे ओलंपिक की तैयारी के लिए भी महत्वपूर्ण होगा।

10 हजार मीटर में सीमा ने जिस तरह मजबूत अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बनाई, उससे उनकी क्षमता का अंदाजा लगाया जा सकता है। उस रेस में बहरीन की विनफ्रेड यावी ने स्वर्ण, जापान की नोजोमी तनाका ने रजत और सीमा ने कांस्य पदक जीता था। सीमा का समय 32:50.05 रहा। इस पदक के साथ उन्होंने एशियाई खेलों में भारतीय एथलेटिक्स के लिए भी महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की।

अब 5000 मीटर में सीमा के सामने अलग तरह की चुनौती होगी। 10 हजार मीटर की तुलना में यह रेस आधी दूरी की है, इसलिए इसमें गति और रणनीति की भूमिका और बढ़ जाती है। खिलाड़ियों को शुरुआत से ही प्रतिद्वंद्वियों पर नजर रखते हुए अपनी ऊर्जा को सही तरीके से इस्तेमाल करना होता है। अंतिम कुछ चक्करों में रफ्तार बढ़ाने की क्षमता पदक की स्थिति तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है। सीमा के पास लंबी दूरी की दौड़ का अनुभव है और हाल में एशियाई खेलों में मिले कांस्य से उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है।

सीमा के प्रदर्शन पर केवल चंबा ही नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल प्रदेश की नजर है। उनकी उपलब्धि ने प्रदेश के उन युवाओं के लिए भी उम्मीद पैदा की है जो सीमित संसाधनों के बावजूद खेलों में आगे बढ़ने का सपना देखते हैं। पहाड़ी इलाकों से आने वाले खिलाड़ियों के लिए प्रशिक्षण, सुविधाओं और प्रतियोगिताओं तक पहुंच कई बार चुनौतीपूर्ण रहती है। ऐसे में सीमा का अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना स्थानीय युवाओं के लिए प्रेरणा का कारण बना है।

सीमा की मां केसरी देवी के लिए बेटी की यह यात्रा सबसे भावुक करने वाला दौर है। पति की मृत्यु के बाद छह बच्चों की जिम्मेदारी उठाने वाली मां ने जिस बेटी को संघर्ष के बीच दौड़ते हुए देखा, वही बेटी आज देश के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक जीत चुकी है। कांस्य पदक के बाद अब जब सीमा 5000 मीटर में उतरेंगी तो मां की प्रार्थना एक बार फिर बेटी के साथ होगी। परिवार को उम्मीद है कि ट्रैक पर सीमा अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेंगी और इस बार पदक का रंग बदलने में सफल रहेंगी।

सीमा ने खुद भी अपनी सफलता का बड़ा श्रेय अपनी मां को दिया है। उन्होंने कहा है कि उनकी मां ने उनके सपने को पूरा करने के लिए बहुत त्याग किया और उनकी सफलता में मां की सबसे बड़ी भूमिका है। सीमा का कहना है कि वह जो भी पदक जीतेंगी, उसे अपनी मां को समर्पित करना चाहती हैं। उनके लिए मां केवल परिवार का सहारा नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी ताकत हैं।

एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतने के बाद अब सीमा के सामने 5000 मीटर में खुद को फिर साबित करने का मौका है। ट्रैक पर उनके सामने एशिया की मजबूत धाविकाएं होंगी, लेकिन चंबा की इस धाविका की नजर अपने लक्ष्य पर है। रेटा गांव से जापान तक का उनका सफर पहले ही एक बड़ी उपलब्धि बन चुका है। अब 5000 मीटर की रेस में जब सीमा ट्रैक पर उतरेंगी, तो चंबा की पहाड़ियों से लेकर हिमाचल के हर खेल प्रेमी की निगाहें उनकी दौड़ पर टिकी रहेंगी। मां केसरी देवी की प्रार्थना और करोड़ों भारतीयों की शुभका

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