चंपत राय बोले- दाऊ दयाल खन्ना ने 1983 में कहा था, अरे हिंदुओं अयोध्या मथुरा, काशी मुक्त कराओ

चंपत राय ने बताया कि 1983 में कांग्रेस नेता दाऊ दयाल खन्ना ने अयोध्या, मथुरा और काशी को मुक्त कराने की बात कही थी। इसके बाद आंदोलन आगे बढ़ा।
 चंपत राय बोले- दाऊ दयाल खन्ना ने 1983 में कहा था, अरे हिंदुओं अयोध्या मथुरा, काशी मुक्त कराओ
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राम जन्मभूमि आंदोलन के शुरुआती दौर को लेकर विश्व हिंदू परिषद के महासचिव चंपत राय ने एक महत्वपूर्ण प्रसंग का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि अयोध्या में राम जन्मभूमि से जुड़े आंदोलन को आगे बढ़ाने में कांग्रेस से जुड़े रहे नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री दाऊ दयाल खन्ना की भूमिका शुरुआती दौर में सामने आई थी। चंपत राय के अनुसार, वर्ष 1983 में मुजफ्फरनगर में आयोजित एक हिंदू सम्मेलन के दौरान दाऊ दयाल खन्ना ने अयोध्या, मथुरा और काशी के धार्मिक स्थलों को लेकर आवाज उठाई थी। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत भी 1983 के मुजफ्फरनगर सम्मेलन में खन्ना द्वारा इन तीनों स्थलों का मुद्दा उठाए जाने का उल्लेख करते हैं।

चंपत राय ने अपने हालिया संबोधन में उस दौर की घटनाओं को याद करते हुए बताया कि किस तरह दाऊ दयाल खन्ना की बात के बाद इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई। उनके अनुसार, 1983 में दाऊ दयाल खन्ना ने हिंदू समाज से अयोध्या, मथुरा और काशी को लेकर आवाज उठाने का आह्वान किया था। चंपत राय ने इस प्रसंग को राम जन्मभूमि आंदोलन के आगे बढ़ने की शुरुआती कड़ी के तौर पर प्रस्तुत किया है।

दाऊ दयाल खन्ना उस समय कांग्रेस से जुड़े नेता थे और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी रह चुके थे। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने कांग्रेस में रहते हुए ही राम जन्मभूमि से संबंधित मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाया। जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 1983 में उन्होंने इस विषय को सामने रखा और बाद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी अयोध्या, काशी और मथुरा से जुड़े विषय पर पत्र लिखा था।

मुजफ्फरनगर में हुए उस सम्मेलन को आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में अलग-अलग स्रोतों में दर्ज किया गया है। अमर उजाला के अनुसार, मार्च 1983 में मुजफ्फरनगर के जीआईसी मैदान में हुए हिंदू सम्मेलन में अयोध्या के साथ मथुरा और काशी के धार्मिक स्थलों को लेकर मांग उठी थी। सम्मेलन में दाऊ दयाल खन्ना के साथ कई अन्य प्रमुख लोग भी मौजूद थे।

चंपत राय ने जिस प्रसंग का उल्लेख किया है, उसके अनुसार दाऊ दयाल खन्ना के संबोधन के बाद इस विषय को आगे किस तरह बढ़ाया जाए, इस पर भी विचार हुआ। चंपत राय के पुराने वक्तव्य में बताया गया है कि सम्मेलन के बाद अशोक सिंघल को दाऊ दयाल खन्ना से मिलने के लिए भेजा गया था। इसके बाद इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर साधु-संतों तक ले जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

दाऊ दयाल खन्ना का राजनीतिक परिचय भी इस पूरे घटनाक्रम को अलग संदर्भ देता है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक वह कांग्रेस के नेता थे, मुरादाबाद से विधायक रहे और उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुके थे। वह स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रहे थे। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा था।

राम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास पर लिखे गए विभिन्न स्रोतों में 1983 के दौर को एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज किया गया है। भारतीय ऐतिहासिक घटनाक्रम से जुड़े उपलब्ध दस्तावेजों में भी यह उल्लेख मिलता है कि 1980 के दशक की शुरुआत में अयोध्या विवाद को काशी और मथुरा से जुड़े मुद्दों के साथ जोड़कर व्यापक स्तर पर उठाने की प्रक्रिया शुरू हुई। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट के एक अंश में 1983 के आसपास अयोध्या विवाद के काशी और मथुरा से जुड़े विवादों के साथ जुड़ने का उल्लेख है।

इस पूरे घटनाक्रम के अगले चरण में अप्रैल 1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में संतों का सम्मेलन हुआ। चंपत राय के पूर्व प्रकाशित विवरण के अनुसार, 7 और 8 अप्रैल 1984 को आयोजित इस सम्मेलन में दाऊ दयाल खन्ना ने अपनी बात दोबारा रखी। इसके बाद राम जन्मभूमि से संबंधित आंदोलन को संगठित रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाए गए।

उपलब्ध विवरणों के अनुसार, इसी दौर में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के गठन की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी। विभिन्न स्रोतों में बताया गया है कि महंत अवैद्यनाथ को समिति का अध्यक्ष और दाऊ दयाल खन्ना को महामंत्री बनाया गया था। इस तरह दाऊ दयाल खन्ना केवल शुरुआती सार्वजनिक अपील तक सीमित नहीं रहे, बल्कि आगे बनने वाली संगठनात्मक व्यवस्था में भी उनकी भूमिका रही।

चंपत राय के बयान में अशोक सिंघल की भूमिका का भी उल्लेख आता है। उनके अनुसार, दाऊ दयाल खन्ना के वक्तव्य के बाद अशोक सिंघल ने उनसे मुलाकात की और इस विषय को समझने का प्रयास किया। इसके बाद विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोगों ने भी इस मुद्दे को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाई। आगे चलकर आंदोलन का स्वरूप देशव्यापी हुआ और अयोध्या राम जन्मभूमि इसका प्रमुख केंद्र बन गया।

हालांकि राम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत को लेकर अलग-अलग इतिहासकारों और संगठनों के विवरणों में घटनाओं की व्याख्या अलग हो सकती है। कुछ स्रोत 1983 के मुजफ्फरनगर सम्मेलन को महत्वपूर्ण शुरुआती पड़ाव बताते हैं, जबकि आंदोलन का इतिहास इससे पहले के अयोध्या विवाद, स्थानीय धार्मिक गतिविधियों और विभिन्न संगठनों की गतिविधियों से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए चंपत राय का बयान इस इतिहास के एक विशेष पक्ष और शुरुआती चरण पर केंद्रित है।

इंडियन एक्सप्रेस के ऐतिहासिक विश्लेषण के मुताबिक, 1983 में कांग्रेस नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री दाऊ दयाल खन्ना ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर अयोध्या, काशी और मथुरा से जुड़े स्थलों को हिंदुओं को सौंपने की मांग की थी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि उस समय कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे को लेकर एकराय नहीं थी और कुछ वरिष्ठ नेताओं ने खन्ना के रुख पर आपत्ति जताई थी।

यानी उस दौर की राजनीति में यह मुद्दा केवल धार्मिक संगठनों तक सीमित नहीं था। कांग्रेस से जुड़े कुछ नेताओं ने भी इस पर अपनी राय सार्वजनिक की थी। दाऊ दयाल खन्ना का मामला इसलिए अलग महत्व रखता है क्योंकि उन्होंने कांग्रेस में रहते हुए इस विषय को सार्वजनिक मंच पर उठाया और बाद में पार्टी से अलग होकर आंदोलन से जुड़ गए।

चंपत राय ने अपने हालिया संबोधन में इसी ऐतिहासिक कड़ी को याद करते हुए दाऊ दयाल खन्ना को आंदोलन के शुरुआती दौर से जोड़कर बताया। उनके बयान के मुताबिक, वर्ष 1983 में खन्ना द्वारा उठाई गई आवाज के बाद इस विषय को संत समाज और दूसरे संगठनों के बीच ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके बाद 1984 की धर्म संसद और आगे के वर्षों में हुए कार्यक्रमों के जरिए राम जन्मभूमि आंदोलन का दायरा बढ़ता गया।

दाऊ दयाल खन्ना का कांग्रेस से अलग होना भी इसी घटनाक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया जाता है। चंपत राय के अनुसार, अशोक सिंघल से बातचीत के बाद खन्ना ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। उनके इस्तीफे के बाद वह इस आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़े। अन्य स्रोत भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि खन्ना ने बाद में राम जन्मभूमि से जुड़े आंदोलन में संगठनात्मक भूमिका निभाई।

इसके बाद आंदोलन ने कई चरण देखे। धार्मिक सम्मेलनों, संतों की बैठकों और जनजागरण अभियानों के जरिए राम जन्मभूमि का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति और सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनता गया। 1984 की धर्म संसद को भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। आगे चलकर आंदोलन में अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की भागीदारी बढ़ी और अयोध्या देश की राजनीति का प्रमुख केंद्र बन गया।

चंपत राय का ताजा बयान ऐसे समय में सामने आया है जब राम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास और उसमें शामिल प्रमुख व्यक्तियों की भूमिका को लेकर कई कार्यक्रमों में चर्चा हो रही है। उन्होंने अपने संबोधन में शुरुआती दौर के उन नेताओं और कार्यकर्ताओं का उल्लेख किया, जिन्होंने इस मुद्दे को सार्वजनिक मंचों तक पहुंचाने में भूमिका निभाई थी। इसी क्रम में उन्होंने दाऊ दयाल खन्ना का नाम प्रमुखता से लिया।

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए 1983 का मुजफ्फरनगर सम्मेलन, दाऊ दयाल खन्ना का सार्वजनिक वक्तव्य, इंदिरा गांधी को लिखा गया पत्र, अशोक सिंघल के साथ उनकी बातचीत और 1984 की धर्म संसद जैसे पड़ाव महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अलग-अलग स्रोतों में इन घटनाओं के विवरण और तारीखों में कुछ अंतर भी मिलता है, लेकिन कई स्रोत इस बात पर सहमत हैं कि 1983 में खन्ना ने अयोध्या, मथुरा और काशी से जुड़े मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था।

आज जब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो चुका है और राम जन्मभूमि से जुड़ा लंबा कानूनी व राजनीतिक अध्याय समाप्त हो चुका है, तब आंदोलन के शुरुआती इतिहास को लेकर भी लगातार चर्चा होती रहती है। चंपत राय ने इसी ऐतिहासिक क्रम में दाऊ दयाल खन्ना की भूमिका को याद किया है। उनका कहना है कि आंदोलन के शुरुआती बीज इसी तरह के प्रयासों से पड़े और बाद में इसे व्यापक संगठनात्मक स्वरूप मिला।

इस प्रकार, चंपत राय के बयान का मुख्य केंद्र वर्ष 1983 और दाऊ दयाल खन्ना द्वारा अयोध्या, मथुरा तथा काशी के मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाना है। इतिहास के अलग-अलग स्रोत इस घटनाक्रम को राम जन्मभूमि आंदोलन के शुरुआती चरणों में महत्वपूर्ण मानते हैं। इसके बाद 1984 की धर्म संसद और आगे के वर्षों में हुए आंदोलनों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया।

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