सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बताया कि हाईकोर्ट में लंबित मुकदमे घटाने के लिए रिटायर्ड जजों की अस्थायी नियुक्ति की योजना वकील संगठनों के विरोध के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। उन्होंने न्यायिक अधिकारियों की पेंशन से जुड़ी परेशानी का भी जिक्र किया।
नई दिल्ली: देश के हाईकोर्ट में लाखों मुकदमे लंबित हैं। इन मामलों को जल्दी निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने रिटायर्ड जजों को दोबारा अस्थायी रूप से नियुक्त करने की पहल की थी। लेकिन वकील संगठनों के विरोध के चलते यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई। गुरुवार, 29 अक्टूबर को एक मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने यह बात कही। उन्होंने बताया कि बार एसोसिएशनों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने शुरू कर दिए थे।
वकील संगठनों के विरोध पर क्या बोले CJI?
सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान के न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता से जुड़े मामले की सुनवाई चल रही थी। इसी दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने हाईकोर्ट में अस्थायी जजों की नियुक्ति का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि पूर्व चीफ जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस संजय किशन कौल के साथ उन्होंने सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को दोबारा नियुक्त करने की व्यवस्था शुरू करने की कोशिश की थी।
इसका मकसद अनुभवी जजों की मदद से हाईकोर्ट में लंबित मामलों को कम करना था। लेकिन बार एसोसिएशनों ने इस पहल का विरोध किया और इसके खिलाफ प्रस्ताव पारित किए। सीजेआई ने कहा कि कोई भी मुख्य न्यायाधीश वकील समुदाय को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता। उनके मुताबिक, इसी विरोध की वजह से नियुक्तियों की योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
रिटायर्ड जजों की नियुक्ति का क्या है नियम?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 224ए में रिटायर्ड हाईकोर्ट जजों को दोबारा अस्थायी रूप से न्यायिक कार्य सौंपने की व्यवस्था है। इसके तहत हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की सहमति से किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को दोबारा न्यायिक कामकाज के लिए बुला सकते हैं। संबंधित जज की सहमति भी जरूरी होती है।
यह व्यवस्था खासतौर पर उन परिस्थितियों में उपयोगी मानी जाती है, जब अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या अधिक हो और नियमित न्यायाधीशों पर काम का दबाव बढ़ रहा हो। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2021 में इस व्यवस्था को लागू करने के लिए दिशा-निर्देश दिए थे। हालांकि, इसे बड़े स्तर पर लागू करने में दिक्कतें सामने आईं।
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2025 में सुप्रीम कोर्ट ने दी थी नियुक्ति की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी 2025 को अस्थायी जजों की नियुक्ति से जुड़ी कुछ शर्तों में ढील दी थी। उस समय उपलब्ध राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के आंकड़ों के अनुसार, देश के हाईकोर्ट में करीब 62 लाख मामले लंबित थे। इनमें 18.20 लाख से ज्यादा आपराधिक और 44 लाख से अधिक दीवानी मामले शामिल थे।अदालत ने इसी स्थिति को देखते हुए प्रत्येक हाईकोर्ट को दो से पांच अस्थायी जज नियुक्त करने की अनुमति दी थी।
हालांकि, ऐसे न्यायाधीशों की संख्या संबंधित हाईकोर्ट के कुल स्वीकृत पदों के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती थी। आदेश के मुताबिक, अस्थायी जज किसी मौजूदा हाईकोर्ट जज की अध्यक्षता वाली पीठ में बैठकर लंबित आपराधिक अपीलों की सुनवाई कर सकते हैं।
पेंशन के कारण नौकरी छोड़ने वाले जजों का जिक्र
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने पंजाब और हरियाणा के दो न्यायिक अधिकारियों से जुड़ा एक पुराना मामला भी बताया। उन्होंने कहा कि दोनों अधिकारी पहले हाईकोर्ट में वकालत करते थे। इसके बाद उन्होंने न्यायिक सेवा में प्रवेश किया, लेकिन सात से आठ साल काम करने के बाद इस्तीफा दे दिया। सीजेआई के मुताबिक, इनमें से एक अधिकारी उनसे मिलने आया था।
जब उन्होंने नौकरी छोड़ने की वजह पूछी, तो अधिकारी ने बताया कि नए पेंशन नियमों के कारण रिटायरमेंट के बाद उसे 25 हजार रुपये से अधिक मासिक पेंशन नहीं मिलेगी। अधिकारी का कहना था कि इतनी पेंशन में गुजारा करना मुश्किल होगा। इसलिए उसने दोबारा वकालत शुरू करना बेहतर समझा। इस मामले में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पीएस पटवालिया ने सुप्रीम कोर्ट से न्यायिक अधिकारियों की पेंशन से जुड़ी समस्याओं पर विचार करने का अनुरोध किया।







