कर्नाटक में धर्मांतरण कानून रद्द करने की मांग तेज, अल्पसंख्यक नेताओं ने सरकार को याद दिलाया वादा

कर्नाटक में अल्पसंख्यक नेताओं ने धर्मांतरण विरोधी कानून 2022 को रद्द करने की मांग की। सरकार से नफरत भरे भाषणों और अपराधों पर सख्त कार्रवाई करने को भी कहा।

कर्नाटक में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों और सामाजिक संगठनों ने धर्मांतरण विरोधी कानून को रद्द करने की मांग की है। बेंगलुरु में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेताओं ने कहा कि सरकार को अपना चुनावी वादा पूरा करना चाहिए। साथ ही नफरत फैलाने वाले भाषणों और अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी उठाई गई।

बेंगलुरु: कर्नाटक में धर्मांतरण विरोधी कानून को लेकर एक बार फिर विवाद बढ़ गया है। धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार से कर्नाटक धर्म स्वतंत्रता अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2022 को वापस लेने की मांग की है। शुक्रवार, 30 अक्टूबर को बेंगलुरु में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेताओं ने कहा कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। उन्होंने कांग्रेस सरकार को उसका पुराना वादा याद दिलाते हुए कहा कि संविधान में मिले धार्मिक अधिकारों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है।

धर्मांतरण कानून को लेकर अल्पसंख्यक नेताओं ने क्या कहा?

बेंगलुरु में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में अल्पसंख्यक समुदायों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। उन्होंने कहा कि धर्मांतरण विरोधी कानून के कारण धार्मिक अल्पसंख्यकों को लगातार शक की नजर से देखा जाता है।

प्रतिनिधियों का कहना था कि किसी व्यक्ति को अपना धर्म मानने और धार्मिक परंपराओं का पालन करने की आजादी मिलनी चाहिए। लेकिन जब किसी समुदाय को बार-बार अपनी धार्मिक गतिविधियों को सही साबित करना पड़े, तो उस आजादी का पूरा फायदा नहीं मिल पाता।

नेताओं ने आरोप लगाया कि मौजूदा कानून के कुछ प्रावधान अल्पसंख्यक समुदायों के लिए परेशानी पैदा कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को ऐसे कानून की जरूरत पर दोबारा विचार करना चाहिए, जिससे लोगों को अपनी आस्था के कारण डर या दबाव महसूस न हो।

नफरत फैलाने वाले भाषणों पर भी कार्रवाई की मांग

धर्मांतरण कानून को वापस लेने के साथ प्रतिनिधियों ने नफरत भरे भाषणों और धार्मिक समुदायों के खिलाफ होने वाले अपराधों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि केवल कानून बनाना काफी नहीं है, बल्कि उनका सही तरीके से पालन होना भी जरूरी है।

अल्पसंख्यक नेताओं ने राज्य सरकार से मांग की कि धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों को निशाना बनाने, धमकी देने और हिंसा भड़काने जैसी घटनाओं के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि किसी भी समुदाय के लोगों को अपनी धार्मिक पहचान के कारण असुरक्षित महसूस नहीं करना चाहिए।

इसके लिए पुलिस और प्रशासन को शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई करनी होगी। प्रतिनिधियों ने नफरत फैलाने वाले भाषणों से निपटने के लिए मौजूदा कानूनी व्यवस्था को और मजबूत बनाने पर भी जोर दिया।

साल 2022 में लागू हुआ था धर्मांतरण विरोधी कानून

कर्नाटक में यह कानून सितंबर 2022 में तत्कालीन भाजपा सरकार के कार्यकाल में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य जबरदस्ती, धोखाधड़ी, प्रलोभन या अनुचित दबाव के जरिए होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना बताया गया था। कानून में गैरकानूनी धर्मांतरण के मामलों में सजा और जुर्माने का प्रावधान है। इसके अलावा धर्म बदलने की प्रक्रिया से जुड़ी कुछ प्रशासनिक शर्तें भी तय की गई हैं।

हालांकि, धार्मिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कानून का इस्तेमाल धार्मिक गतिविधियों पर सवाल उठाने के लिए भी किया जा सकता है। दूसरी ओर, कानून के समर्थकों का तर्क है कि इसका उद्देश्य किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि जबरन धर्मांतरण को रोकना है।

कांग्रेस सरकार ने कानून वापस लेने का किया था वादा

कर्नाटक में 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने पिछली भाजपा सरकार के कुछ कानूनों को वापस लेने का वादा किया था। धर्मांतरण विरोधी कानून भी लंबे समय से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है। राज्य में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद जून 2023 में इस कानून को रद्द करने की योजना सामने आई थी। हालांकि, अक्टूबर 2026 तक इसे वापस नहीं लिया गया है।

इसी बात को लेकर अल्पसंख्यक संगठनों ने सरकार से सवाल किया है। उनका कहना है कि चुनाव के समय किए गए वादों को पूरा करना चाहिए और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में स्पष्ट फैसला लेना चाहिए।

संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर क्या व्यवस्था है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतरात्मा की स्वतंत्रता और अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने तथा प्रचार करने का अधिकार देता है। हालांकि, यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसी संवैधानिक शर्तों के अधीन है।

भारतीय कानून में अपनी इच्छा से धर्म बदलने और किसी दूसरे व्यक्ति का जबरदस्ती धर्म परिवर्तन कराने के बीच अंतर किया गया है। जबरदस्ती या धोखे से धर्मांतरण कराने पर रोक लगाने के लिए कई राज्यों में कानून मौजूद हैं। कर्नाटक में उठी नई मांग का मुख्य मुद्दा यही है कि धर्मांतरण रोकने के नाम पर किसी व्यक्ति की अपनी धार्मिक मान्यताओं और पसंद की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

फिलहाल अल्पसंख्यक संगठनों ने राज्य सरकार से कानून वापस लेने और नफरत से जुड़े अपराधों पर प्रभावी कार्रवाई करने की अपील की है। अब देखना होगा कि सरकार इन मांगों पर क्या कदम उठाती है

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