डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला मरीजों की रिकवरी: इलाज के बाद अस्पताल में खुशी और उम्मीद का माहौल

DR Congo के इटुरी प्रांत में Ebola से ठीक हुए मरीजों की बढ़ती संख्या ने राहत दी है। इलाज से जुड़ी भ्रांतियों के बीच अब लोगों में खुसी और जागरूकता बढ़ रही है।

DR Congo के इटुरी प्रांत में Ebola मरीजों के ठीक होने से उम्मीद की किरण दिखी है। अस्पताल में स्वास्थ्यकर्मियों ने मरीज की रिकवरी पर जश्न मनाया। हालांकि क्षेत्र में अब भी संक्रमण और अफवाहों से लड़ाई जारी है।

इटुरी प्रांत: डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) के उत्तर-पूर्वी इटुरी प्रांत में जारी इबोला प्रकोप के बीच एक राहत भरी खबर सामने आई है। यहां इबोला वायरस से संक्रमित मरीजों के ठीक होने के बाद अस्पताल में खुशी और उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला।

मोंग्बवालू स्थित एक उपचार केंद्र में स्वास्थ्यकर्मियों ने एक मरीज के पूरी तरह स्वस्थ होकर डिस्चार्ज होने पर गीत गाकर और नाचकर उसका स्वागत किया। यह दृश्य उस क्षेत्र में दुर्लभ माना जा रहा है, जहां इस बीमारी ने अब तक 140 से अधिक लोगों की जान ले ली है।

तीन सप्ताह के इलाज के बाद मरीज की रिकवरी

49 वर्षीय डेनियल किताम्बाला नाम के मरीज को लगभग तीन सप्ताह तक उपचार केंद्र में रखा गया था। दो लगातार नकारात्मक परीक्षणों (negative tests) के बाद यह पुष्टि हुई कि वह इबोला वायरस से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं। डिस्चार्ज के समय स्वास्थ्यकर्मी हरे रंग की यूनिफॉर्म में प्रार्थना गीत गा रहे थे और मरीज को अस्पताल से बाहर ले जा रहे थे। यह पल अस्पताल में काम कर रहे चिकित्सा कर्मियों और मरीज दोनों के लिए भावनात्मक था। किताम्बाला ने अपनी रिकवरी पर खुशी जताते हुए कहा कि यह बीमारी बेहद खतरनाक है, लेकिन समय पर इलाज मिलने से जीवन बचाया जा सकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि बीमारी के लक्षण दिखने पर तुरंत अस्पताल जाएं।

“ईश्वर की कृपा से ठीक हुआ हूं”: मरीज का अनुभव

डेनियल किताम्बाला ने अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद कहा कि जब वह संक्रमित हुए थे तो उनकी हालत बेहद गंभीर थी। उन्होंने कहा कि प्रारंभ में उन्होंने पारंपरिक उपचार (traditional medicine) का सहारा लिया, लेकिन हालत बिगड़ने पर अस्पताल पहुंचे। उन्होंने कहा कि यह अनुभव उनके लिए बेहद कठिन था, लेकिन समय पर इलाज और चिकित्सकीय देखभाल ने उनकी जान बचाई।

संक्रमण फैलने की वजह और शुरुआती भ्रम

अधिकारियों के अनुसार, इबोला वायरस संक्रमित शरीर के तरल पदार्थ जैसे रक्त और उल्टी के संपर्क में आने से फैलता है। इस बीमारी को लेकर स्थानीय समुदाय में कई तरह की गलत धारणाएं और अफवाहें भी फैली हुई हैं। कुछ लोगों का मानना था कि यह बीमारी “कॉफिन कर्स” (coffin curse) यानी शव और अंतिम संस्कार से जुड़ी किसी श्राप जैसी घटना का परिणाम है। इसी तरह की अफवाहों के कारण कई लोग अस्पतालों और उपचार केंद्रों से दूरी बनाते रहे, जिससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ गया।

स्वास्थ्य प्रणाली पर अविश्वास और हिंसा की घटनाएं

मोंग्बवालू अस्पताल के निदेशक डॉ. रिचर्ड लुकुडो के अनुसार, समुदाय में फैली गलत सूचनाओं के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं पर हमला भी हुआ है। 21 मई को अस्पताल परिसर में बनाए गए एक इबोला टेंट को आग के हवाले कर दिया गया था। यह घटनाएं दर्शाती हैं कि बीमारी के साथ-साथ अफवाहों और अविश्वास से भी लड़ना उतना ही जरूरी है जितना वायरस से। डॉ. लुकुडो ने कहा कि पिछले कुछ महीनों में स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है और अब अधिक लोग इलाज के लिए अस्पताल आ रहे हैं।

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला मरीजों की रिकवरी: इलाज के बाद अस्पताल में खुशी और उम्मीद का माहौल

2018-2020 के प्रकोप की यादें और डर

विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति नई नहीं है। 2018 से 2020 के बीच पड़ोसी नॉर्थ किवु प्रांत में इबोला के दौरान भी उपचार केंद्रों पर हमले हुए थे और स्वास्थ्यकर्मियों को भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। इसका असर वर्तमान प्रकोप पर भी देखने को मिल रहा है, जहां लोग अभी भी चिकित्सा व्यवस्था पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर पा रहे हैं।

संक्रमण के शुरुआती चरण में अफवाहों का असर

स्थानीय प्रशासन के अनुसार, फरवरी महीने में जब इलाके में अज्ञात बीमारी से मौतों की संख्या बढ़ने लगी थी, तब से ही अफवाहें फैलने लगी थीं। कुछ लोगों का मानना था कि एक अंतिम संस्कार के दौरान एक टूटे हुए ताबूत (coffin) की घटना ने “श्राप” जैसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसके बाद मौतों का सिलसिला शुरू हुआ। स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि इसी गलत धारणा ने संक्रमण को और फैलने में मदद की, क्योंकि लोग समय पर इलाज कराने नहीं पहुंचे।

धीरे-धीरे बदल रही स्थिति

स्थानीय प्रशासन के अनुसार, अब स्थिति धीरे-धीरे सुधर रही है। मोंग्बवालू के मेयर सेसेरेकी मंड्रो इज़राइल ने बताया कि पहले हर दिन कई मौतें हो रही थीं, लेकिन अब हालात में सुधार देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि शुरुआती दिनों में प्रतिदिन सात से दस लोगों की मौत तक की खबरें थीं, लेकिन अब जागरूकता बढ़ने के कारण लोग अस्पतालों की ओर रुख कर रहे हैं।

पहला मरीज बना उम्मीद की किरण

इस अस्पताल में एक और महत्वपूर्ण मामला 55 वर्षीय पादरी डेओग्रातियस कसरेका का था, जो सबसे पहले ठीक होकर बाहर निकले थे। उनकी रिकवरी ने समुदाय में सकारात्मक संदेश दिया और लोगों का भरोसा बढ़ाया। इसके बाद अन्य मरीजों के ठीक होने की खबरों ने यह साबित किया कि इबोला का इलाज संभव है, यदि समय पर चिकित्सा सहायता ली जाए।

समुदाय में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के प्रकोपों में सबसे बड़ी चुनौती केवल वायरस नहीं, बल्कि गलत जानकारी और सामाजिक डर होता है। लोगों को यह समझाना जरूरी है कि इबोला कोई “श्राप” नहीं बल्कि एक वायरस है, जिसका इलाज संभव है। समय पर इलाज और उचित सावधानियों से जीवन बचाया जा सकता है।

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