एसोसिएटेड प्रेस की जांच में खुलासा हुआ है कि गाजा से फिलिस्तीनियों को बाहर ले जाने वाली कुछ उड़ानों के पीछे एक इजरायली संगठन की भूमिका हो सकती है। इन उड़ानों के जरिए लोग इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका तक पहुंचे।
Middle East: गाजा में जारी युद्ध और मानवीय संकट के बीच एक नई रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस को तेज कर दिया है। एसोसिएटेड प्रेस (Associated Press – AP) की एक जांच में खुलासा हुआ है कि गाजा से फिलिस्तीनियों को बाहर ले जाने वाली कुछ उड़ानों के पीछे एक इजरायली संगठन की भूमिका हो सकती है। यह खुलासा ऐसे समय आया है जब गाजा में मानवीय हालात लगातार बिगड़ रहे हैं और बड़ी संख्या में लोग वहां से निकलने के रास्ते तलाश रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर में जब गाजा से करीब 150 फिलिस्तीनियों को लेकर एक विमान दक्षिण अफ्रीका पहुंचा, तो वहां मौजूद कई लोगों के लिए यह घटना चौंकाने वाली थी। जानकारी के अनुसार मई से अब तक कम से कम तीन उड़ानें गाजा से निकलकर इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका पहुंच चुकी हैं। इन उड़ानों में वे लोग सवार थे जिन्होंने युद्धग्रस्त गाजा छोड़ने के लिए पहले रजिस्ट्रेशन कराया था।
जांच में सामने आया इजरायली समूह का नाम
एसोसिएटेड प्रेस की जांच के अनुसार इन उड़ानों के पीछे एक इजरायली संगठन का हाथ हो सकता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस संगठन के संस्थापक पहले भी गाजा से फिलिस्तीनियों को दूसरे देशों में बसाने के विचार का समर्थन कर चुके हैं।
जांच में यह भी सामने आया कि इस संगठन से जुड़े लोग पूर्व खुफिया अधिकारियों और सैनिकों का एक समूह हैं। आरोप है कि उन्होंने एक छद्म कंपनी यानी शेल कंपनी (Shell Company) के जरिए इन उड़ानों की व्यवस्था की। इस कंपनी का नाम ‘अल-मजद’ बताया गया है, जिसने खुद को एक मानवीय संस्था के रूप में पेश किया।
रिपोर्ट के अनुसार अल-मजद ने इन उड़ानों को मानवीय सहायता और राहत मिशन के रूप में दिखाया। हालांकि बाद में सामने आए दस्तावेज और इंटरव्यू इस पूरी प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े करते हैं।
दक्षिण अफ्रीका ने जताई चिंता
जब गाजा से आए लोगों की उड़ान दक्षिण अफ्रीका पहुंची तो वहां की सरकार ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी। दक्षिण अफ्रीका के विदेश मंत्री रोनाल्ड लामोला ने उस समय इन उड़ानों को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि यह प्रक्रिया गाजा और वेस्ट बैंक से फिलिस्तीनियों को व्यवस्थित तरीके से बाहर निकालने की योजना का हिस्सा हो सकती है। उनके बयान के बाद इस मामले ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा।
कई विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस तरह के प्रयास किसी राजनीतिक या रणनीतिक योजना के तहत किए जा रहे हैं तो इससे क्षेत्रीय राजनीति और शांति प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।
यात्रियों को नहीं थी पूरी जानकारी
जांच के दौरान सामने आए दस्तावेजों में अनुबंध, यात्रियों की सूची, टेक्स्ट संदेश और वित्तीय विवरण शामिल थे। इसके अलावा एसोसिएटेड प्रेस ने दो दर्जन से अधिक लोगों से बातचीत की, जिनमें इजरायली, फिलिस्तीनी और यात्रा से जुड़े अन्य लोग शामिल थे।

इन साक्षात्कारों में कई यात्रियों ने बताया कि उन्हें यह नहीं पता था कि उनकी यात्रा की व्यवस्था किसने की थी। उन्होंने कहा कि उस समय उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात गाजा से बाहर निकलना था।
नवंबर में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे एक 37 वर्षीय फिलिस्तीनी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि गाजा में हालात बेहद खराब हो चुके थे। उनके मुताबिक वहां भोजन की भारी कमी थी और कई जगहों पर अकाल जैसी स्थिति बन गई थी।
उन्होंने कहा कि उनके बच्चों की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उन्हें लगा वे शायद जीवित नहीं बच पाएंगे। ऐसे में जब बाहर निकलने का मौका मिला तो उन्होंने बिना ज्यादा सवाल पूछे यात्रा स्वीकार कर ली।
अल-मजद कंपनी की भूमिका
यात्रियों ने बताया कि उन्हें बताया गया था कि उनकी निकासी का आयोजन ‘अल-मजद’ नाम की एक कंपनी कर रही है। यह कंपनी खुद को एक मानवीय संगठन बताती थी और दावा करती थी कि उसका उद्देश्य फिलिस्तीनी लोगों की मदद करना है।
हालांकि जांच में सामने आए तथ्यों के बाद इस कंपनी की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस कंपनी का संबंध एक इजरायली संगठन से हो सकता है, जो गाजा से फिलिस्तीनियों के पुनर्वास के विचार का समर्थन करता रहा है।
ट्रंप के प्रस्ताव से जुड़ा विवाद
रिपोर्ट में जिस इजरायली संगठन का जिक्र किया गया है, उसके संस्थापक गिलाद अच बताए जाते हैं। वह एक इजरायली लड़ाकू आरक्षित सैनिक (Reserve Soldier) भी हैं और वेस्ट बैंक में बसने वाले लोगों के अधिकारों के समर्थक माने जाते हैं। गिलाद अच ने पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस प्रस्ताव का खुलकर समर्थन किया था जिसमें गाजा से करीब 20 लाख फिलिस्तीनियों को अन्य देशों में स्थानांतरित करने की बात कही गई थी।
हालांकि बाद में ट्रंप ने इस योजना को आगे नहीं बढ़ाया। इस प्रस्ताव की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी आलोचना हुई थी। कई देशों, मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र के नेताओं ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताया था। संयुक्त राष्ट्र महासचिव और कई मानवाधिकार समूहों ने कहा था कि यदि किसी समुदाय को जबरन या संगठित तरीके से उसके क्षेत्र से हटाया जाता है तो इसे जातीय सफाए (Ethnic Cleansing) के रूप में देखा जा सकता है।
गाजा से लोगों को हटाने पर जारी बहस
हालांकि ट्रंप के प्रस्ताव को बाद में वापस ले लिया गया, लेकिन इजरायल की राजनीति में कुछ धुर दक्षिणपंथी समूह अभी भी गाजा से फिलिस्तीनियों को बाहर बसाने के विचार का समर्थन करते हैं। इन समूहों में सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ सदस्य भी शामिल बताए जाते हैं।
दूसरी ओर कई अंतरराष्ट्रीय संगठन और मानवाधिकार कार्यकर्ता इस तरह की योजनाओं का विरोध करते हैं। उनका कहना है कि गाजा के लोगों को अपने घरों और जमीन पर रहने का अधिकार है।








