गणगौर व्रत 2026 आज चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा से पति की लंबी आयु और वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है। महिलाएं सुबह शुभ मुहूर्त में पूजा कर षोडशोपचार विधि अपनाती हैं। त्योहार राजस्थान, गुजरात और मध्य भारत में विशेष रूप से मनाया जाता है।
गणगौर व्रत 2026: आज चैत्र शुक्ल तृतीया को पूरे भारत में गणगौर व्रत और पूजा का आयोजन किया जा रहा है। महिलाएं अपने घरों में भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्तियों की स्थापना कर ब्रह्म मुहूर्त से पूजा शुरू कर रही हैं। यह व्रत विशेष रूप से पति की लंबी आयु और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति के लिए रखा जाता है। राजस्थान, गुजरात और मध्य भारत में यह त्योहार सांस्कृतिक और पारिवारिक महत्व के साथ मनाया जाता है। महिलाएं षोडशोपचार विधि का पालन करते हुए आरती और प्रसाद वितरण भी करती हैं।
गणगौर व्रत का समय और मुहूर्त
आज गणगौर पूजा का मुख्य समय सुबह 7:55 बजे से 9:26 बजे तक निर्धारित है। इसके अतिरिक्त कुछ विशेष मुहूर्त भी हैं, जिनका ध्यान रखकर पूजा अधिक फलदायक मानी जाती है।
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:49 से 5:37 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:04 से 12:53 बजे तक
- विजय मुहूर्त: दोपहर 2:30 से 3:18 बजे तक
धार्मिक मान्यता है कि इन समयों में पूजा करने से गणगौर व्रत का प्रभाव अधिक होता है। इसलिए लोग पूजा के समय का विशेष ध्यान रखते हैं।
गणगौर पूजा की विधि
गणगौर व्रत का आरंभ ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान और शुद्ध वस्त्र धारण से होता है। पूजा स्थल को साफ कर लकड़ी की चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाया जाता है। उसके ऊपर मिट्टी या लकड़ी की बनी ईसर (भगवान शिव) और गौरी (माता पार्वती) की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं।
इस दौरान एक कलश में गंगाजल भरकर उसके ऊपर गेहूं के दाने रखे जाते हैं। माता रानी को मेहंदी, कुमकुम, चूड़ियां, मंगलसूत्र और नए वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। षोडशोपचार पूजा में जल, अक्षत, फूल, धूप, दीपक, नैवेद्य और फल जैसी वस्तुएं शामिल होती हैं। पूजा के अंत में आरती और प्रसाद वितरण किया जाता है।

गणगौर व्रत का महत्व
गणगौर व्रत की धार्मिक मान्यता महिलाओं के जीवन में विशेष महत्व रखती है। इसे करने से पति की लंबी आयु और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति रूप में पाने के लिए गणगौर व्रत किया था। यही कारण है कि यह व्रत विवाहित महिलाओं के साथ-साथ कुंवारी कन्याओं के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
गणगौर व्रत होली के बाद शुरू होकर 18 दिनों तक चलता है और तृतीया तिथि को समाप्त होता है। इस दौरान महिलाएं नियमित रूप से पूजा और व्रत का पालन करती हैं, जिससे उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
सांस्कृतिक और धार्मिक पहलू
गणगौर त्योहार राजस्थान, गुजरात और मध्य भारत में विशेष रूप से मनाया जाता है। महिलाएं इस दिन अपने घर की छत पर या आंगन में मिट्टी के बर्तन सजाकर जल भरती हैं और शोभायात्रा निकालती हैं। यह त्योहार सामूहिक रूप से समाज में भाईचारे और सौभाग्य की भावना को भी मजबूत करता है।
त्योहार का प्रमुख संदेश है कि श्रद्धा और आस्था से जीवन में खुशहाली आती है। इसके साथ ही यह पर्व पारिवारिक मेलजोल और सांस्कृतिक रीतियों का भी प्रतीक है।








