एआई की बढ़ती कंप्यूटिंग जरूरतों को देखते हुए गूगल अब डेटा सेंटर को पृथ्वी से बाहर अंतरिक्ष में ले जाने की संभावनाओं पर काम कर रही है। अमेरिकी टेक कंपनी अपने प्रोजेक्ट सनकैचर के तहत पृथ्वी की कक्षा में एआई कंप्यूटिंग की क्षमता का परीक्षण करने की तैयारी में है।
टेक न्यूज़: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती मांग के साथ दुनिया भर में डेटा सेंटर की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। इन केंद्रों को चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली, जमीन और पानी की आवश्यकता होती है। इसी चुनौती के बीच गूगल अब एक ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जो भविष्य में AI कंप्यूटिंग का बड़ा हिस्सा अंतरिक्ष में ले जा सकती है। कंपनी ने ‘प्रोजेक्ट सनकैचर’ (Project Suncatcher) के तहत पृथ्वी की कक्षा में AI कंप्यूटिंग सिस्टम विकसित करने की योजना बनाई है।
गूगल की इस पहल का उद्देश्य ऐसे उपग्रहों का नेटवर्क तैयार करना है, जिनमें AI कंप्यूटिंग के लिए विशेष टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट (TPU) लगाई जाएंगी। कंपनी के मुताबिक, अंतरिक्ष में मौजूद सौर ऊर्जा का इस्तेमाल AI सिस्टम को चलाने के लिए किया जा सकता है। इससे भविष्य में पृथ्वी पर बड़े-बड़े डेटा सेंटर बनाने और उन्हें ठंडा रखने की जरूरत कम हो सकती है।
अक्टूबर में होगा पहला परीक्षण
प्रोजेक्ट सनकैचर के तहत गूगल अपने शुरुआती प्रोटोटाइप उपग्रह का परीक्षण करने की तैयारी कर रहा है। इसे SpaceX के Falcon 9 रॉकेट के जरिए कक्षा में भेजने की योजना है। इस मिशन में गूगल के Trillium TPU को अंतरिक्ष के कठिन वातावरण में परखा जाएगा।
परीक्षण का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि AI कंप्यूटिंग हार्डवेयर अंतरिक्ष में रेडिएशन, अत्यधिक तापमान, कंपन और अन्य परिस्थितियों के बीच कितनी विश्वसनीयता से काम कर सकता है। इस प्रयोग से यह भी पता लगाने की कोशिश होगी कि अंतरिक्ष आधारित AI कंप्यूटिंग भविष्य में व्यावहारिक और बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने योग्य बन सकती है या नहीं।
इस परियोजना को लेकर Elon Musk ने भी प्रतिक्रिया दी है। एएनआई के अनुसार, उन्होंने गूगल से संबंधित एक वीडियो साझा करते हुए कहा कि भविष्य में कंप्यूटिंग का बड़ा हिस्सा, संभवतः पूरा कंप्यूटिंग कार्य, अंतरिक्ष में स्थानांतरित हो सकता है।
अंतरिक्ष में ज्यादा सौर ऊर्जा मिलने का दावा

गूगल के प्रोजेक्ट के पीछे सबसे महत्वपूर्ण तर्क सौर ऊर्जा की उपलब्धता है। पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में मौजूद उपग्रहों को नियमित रूप से सूर्य की रोशनी मिल सकती है। कंपनी का अनुमान है कि कुछ परिस्थितियों में अंतरिक्ष आधारित सौर ऊर्जा प्रणाली पृथ्वी पर स्थित डेटा सेंटर की तुलना में कई गुना अधिक सौर ऊर्जा हासिल कर सकती है।
अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो AI के लिए जरूरी कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ बिजली, जमीन और कूलिंग से जुड़ी चुनौतियों को कम करने का रास्ता खुल सकता है। हालांकि, अभी इसे बड़े व्यावसायिक स्तर पर लागू करने से पहले कई तकनीकी और आर्थिक बाधाओं को पार करना होगा।
रेडिएशन और गर्मी सबसे बड़ी चुनौती
अंतरिक्ष में AI चिप्स चलाना आसान नहीं है। वहां मौजूद रेडिएशन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नुकसान पहुंचा सकता है। गूगल ने अपने TPU सिस्टम की मजबूती जांचने के लिए वाइब्रेशन टेस्ट और रेडिएशन एक्सपोजर से जुड़े प्रयोग किए हैं। कंपनी के अनुसार, शुरुआती परीक्षणों में Trillium TPU के अगले कई वर्षों के रेडिएशन प्रभाव को सहन करने की क्षमता के संकेत मिले हैं।
इसके अलावा AI चिप्स लगातार काम करने के दौरान काफी गर्मी पैदा करती हैं। पृथ्वी पर डेटा सेंटर में पंखे, एयर-कंडीशनिंग और अन्य कूलिंग सिस्टम के जरिए इस गर्मी को बाहर निकाला जाता है। लेकिन अंतरिक्ष में हवा नहीं होती, इसलिए हीट को हटाना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है। गूगल इसके लिए हीट पाइप और रेडिएटर जैसी तकनीकों की संभावनाओं पर काम कर रहा है।
उपग्रहों के बीच लेजर से होगा डेटा ट्रांसफर
गूगल की दीर्घकालिक योजना केवल एक या दो उपग्रहों तक सीमित नहीं है। कंपनी ऐसे कई AI-सक्षम उपग्रहों का नेटवर्क विकसित करना चाहती है, जो आपस में हाई-बैंडविड्थ लेजर लिंक के जरिए जुड़े हों। इसके माध्यम से उपग्रह एक-दूसरे के साथ डेटा और कंप्यूटिंग वर्कलोड साझा कर सकेंगे। गूगल 2027 में दो उपग्रहों के बीच लेजर संचार का परीक्षण करने की योजना पर भी काम कर रहा है। यदि ये प्रयोग सफल रहते हैं, तो भविष्य में अंतरिक्ष में एक ऐसा ऑर्बिटल कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा सकता है, जो बढ़ते AI वर्कलोड को संभालने में मदद करे।











