शिमला। हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था और हजारों बागवान परिवारों के लिए इस बार सेब का सीजन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। मौसम की मार ने प्रदेश में सेब उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित किया है। सेब सीजन अब अंतिम दौर में पहुंच चुका है, लेकिन 13 सितंबर तक राज्य की मंडियों में एक करोड़ पेटी सेब भी नहीं पहुंच पाई है। बागवानी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस तारीख तक प्रदेश की मंडियों में करीब 91 लाख 20 हजार पेटी सेब ही पहुंची हैं। ऐसे में पिछले अनुमान और सामान्य उत्पादन की तुलना में बड़ी कमी सामने आ रही है।
इस बार सेब उत्पादन में आई गिरावट को बागवान सीधे तौर पर मौसम की अनिश्चितता और प्राकृतिक परिस्थितियों से जोड़ रहे हैं। हिमाचल के ऊंचाई वाले इलाकों में सेब की खेती बड़ी संख्या में परिवारों की आजीविका का आधार है। सेब की फसल तैयार होने से लेकर उसे तोड़ने और मंडियों तक पहुंचाने तक मौसम की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। इस साल अलग-अलग चरणों में मौसम के बदलाव, बारिश और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियों का असर बागानों पर पड़ा, जिसका प्रभाव अब उत्पादन के आंकड़ों में दिखाई दे रहा है।
बागवानी विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 13 सितंबर तक राज्य की मंडियों में 91.20 लाख पेटी सेब पहुंचा है। खबर में उत्पादन में करीब 70.80 लाख पेटी की कमी का उल्लेख किया गया है। इस आंकड़े से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सेब उत्पादक क्षेत्रों में इस बार फसल का प्रदर्शन कितना प्रभावित हुआ है। सीजन अंतिम दौर में होने के कारण अब बहुत बड़ी मात्रा में सेब के मंडियों तक पहुंचने की संभावना भी सीमित होती जा रही है।
हिमाचल का सेब कारोबार केवल बागवानों तक सीमित नहीं है। इससे मंडियों, आढ़तियों, ट्रांसपोर्टरों, पैकिंग कारोबार, मजदूरों, कोल्ड स्टोरेज और दूसरे स्थानीय व्यवसायों को भी काम मिलता है। जब उत्पादन कम होता है तो उसका असर पूरी सप्लाई चेन पर पड़ता है। बागवानों को कम मात्रा में फल मिलने के कारण उनकी कुल आमदनी प्रभावित हो सकती है, जबकि सेब की ढुलाई, पैकिंग और मंडी कारोबार से जुड़े लोगों को भी सामान्य सीजन की तुलना में कम माल मिलने का असर महसूस हो सकता है।
सेब की फसल हिमाचल के पहाड़ी जिलों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। शिमला, कुल्लू, मंडी, किन्नौर, चंबा और सिरमौर समेत कई क्षेत्रों में हजारों परिवार बागवानी पर निर्भर हैं। एक सफल सेब सीजन का मतलब केवल बागवानों की अच्छी कमाई नहीं होता, बल्कि पूरे ग्रामीण बाजार में आर्थिक गतिविधियां बढ़ना भी होता है। इसी वजह से उत्पादन में बड़ी कमी आने को केवल कृषि क्षेत्र की समस्या नहीं बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी चुनौती माना जा रहा है।
इस साल प्रकृति ने सेब की फसल को कई स्तरों पर प्रभावित किया। सेब का उत्पादन मौसम के तापमान, बारिश, बर्फबारी, फूल आने के समय की परिस्थितियों और फलों के विकास के दौरान मौसम पर निर्भर करता है। यदि किसी एक महत्वपूर्ण चरण में मौसम प्रतिकूल हो जाए तो उसका असर बाद में तैयार होने वाले फलों की संख्या और गुणवत्ता पर पड़ सकता है। इस बार बागवानों को ऐसी ही परिस्थितियों से गुजरना पड़ा, जिसके बाद सीजन समाप्ति की ओर पहुंचते-पहुंचते उत्पादन में कमी साफ दिखाई दे रही है।
मंडियों में एक करोड़ पेटी का आंकड़ा भी पार नहीं होना इस सीजन की कमजोर तस्वीर को सामने रखता है। 13 सितंबर तक 91.20 लाख पेटी की आवक दर्ज होने के बाद अब बागवानों और विभाग की नजर सीजन की अंतिम आवक पर है। हालांकि कुछ क्षेत्रों से सेब की खेप आगे भी मंडियों में पहुंच सकती है, लेकिन सीजन समाप्त होने की स्थिति में अब आंकड़े में बहुत बड़ा बदलाव होने की संभावना कम होती जा रही है।
सेब की कम पैदावार का असर बागवानों की आय पर किस हद तक पड़ेगा, यह केवल उत्पादन पर निर्भर नहीं करेगा। बाजार में सेब की कीमत, फल की गुणवत्ता, आकार, ग्रेड और मंडी में मांग भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। कम उत्पादन की स्थिति में यदि बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं तो कुछ बागवानों को नुकसान की भरपाई आंशिक रूप से हो सकती है। लेकिन जिन बागवानों के बगीचों में फल कम लगे हैं, उनके लिए बेहतर कीमत भी कुल उत्पादन में आई कमी को पूरी तरह दूर नहीं कर सकती।
इस पूरे सीजन में बागवानों के सामने एक और चुनौती बढ़ती लागत की रही है। सेब के बगीचे में पेड़ों की देखभाल, दवाइयों, खाद, मजदूरी, पैकिंग सामग्री और परिवहन पर खर्च होता है। जब उत्पादन कम हो जाता है तो प्रति पेटी लागत का दबाव और बढ़ सकता है। यानी बागवानों को जिन खर्चों का भुगतान करना पड़ा, उनके मुकाबले बाजार में बेचने के लिए फल की मात्रा कम रह गई। इससे छोटे और सीमांत बागवानों पर आर्थिक दबाव अधिक महसूस हो सकता है।
हिमाचल में सेब सीजन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से व्यापारी और खरीदार भी पहुंचते हैं। मंडियों में आने वाली पेटियों को अलग-अलग बाजारों तक भेजा जाता है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और देश के दूसरे राज्यों में हिमाचली सेब की मांग रहती है। उत्पादन कम होने से इस साल मंडियों में उपलब्ध माल की मात्रा प्रभावित हुई है। इसके कारण व्यापार की कुल मात्रा भी पिछले सामान्य सीजन की तुलना में कम रह सकती है।
बागवानों के लिए इस सीजन का अनुभव मौसम के बदलते स्वरूप को लेकर भी चिंता बढ़ाने वाला है। सेब की खेती लंबे समय की बागवानी है और एक पेड़ से उत्पादन प्राप्त करने के लिए कई वर्षों तक उसकी देखभाल करनी पड़ती है। ऐसे में लगातार बदलती मौसम परिस्थितियां बागवानों के लिए जोखिम बढ़ाती हैं। बारिश के समय में बदलाव, असामान्य तापमान या दूसरे प्राकृतिक घटनाक्रम फसल के अलग-अलग चरणों को प्रभावित कर सकते हैं।
कम उत्पादन के आंकड़ों के बीच अब बागवानों की नजर आने वाले सीजन पर भी रहेगी। सेब की अगली फसल के लिए बागों की तैयारी सीजन समाप्त होते ही शुरू हो जाती है। पेड़ों की देखभाल, कटाई-छंटाई, खाद और अन्य कृषि कार्यों के साथ बागवान अगले साल बेहतर उत्पादन की उम्मीद करते हैं। लेकिन मौसम की अनिश्चितता के बीच केवल मेहनत से उत्पादन की पूरी गारंटी संभव नहीं होती।
सरकार और बागवानी विभाग के लिए भी इस तरह के कमजोर सीजन से कई सवाल सामने आते हैं। बागवानों को आधुनिक तकनीक, मौसम आधारित सलाह, फसल सुरक्षा और बागवानी प्रबंधन से जुड़ी सहायता उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण हो जाता है। प्राकृतिक नुकसान की स्थिति में किसानों और बागवानों तक राहत तथा तकनीकी सहायता पहुंचाने की व्यवस्था भी चर्चा में रहती है। हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में बागवानी क्षेत्र को मौसम के जोखिम से बचाने के लिए लंबे समय की रणनीति की जरूरत है।
इस बार उत्पादन में कमी के कारण सेब की पैकिंग और परिवहन से जुड़े कारोबार पर भी असर पड़ा है। सेब की प्रत्येक पेटी के साथ मजदूरों, पैकिंग यूनिट, कार्टन और ट्रे तैयार करने वाले कारोबारियों, वाहन संचालकों और मंडी से जुड़े लोगों को काम मिलता है। जब कुल पेटियों की संख्या कम होती है तो इन क्षेत्रों में भी काम की मात्रा प्रभावित होती है। इसलिए सेब उत्पादन में गिरावट का प्रभाव बागान से निकलकर आसपास के पूरे आर्थिक तंत्र तक पहुंचता है।
सेब सीजन के अंतिम चरण में पहुंचने के बावजूद मंडियों में एक करोड़ पेटी का आंकड़ा पार नहीं होना इस बार की परिस्थितियों को स्पष्ट करता है। बागवानी विभाग के 13 सितंबर तक के आंकड़ों के मुताबिक 91.20 लाख पेटी की आवक हुई है। खबर में सामान्य या अनुमानित उत्पादन के मुकाबले 70.80 लाख पेटी की कमी का उल्लेख किया गया है। अब सीजन के अंतिम आंकड़े आने के बाद ही यह साफ तस्वीर सामने आएगी कि पूरे राज्य में कुल कितनी पेटियां मंडियों तक पहुंचीं।
बागवानों के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता यह है कि कम उत्पादन के बावजूद उन्हें बगीचे की लागत और मेहनत का उचित प्रतिफल कैसे मिले। जिन बागवानों के पास इस साल कम फल रहा है, उनके लिए बेहतर बाजार भाव राहत दे सकते हैं, लेकिन कम उत्पादन से हुई कुल आय की कमी को पूरी तरह पूरा करना मुश्किल हो सकता है। वहीं जिन क्षेत्रों में फसल अपेक्षाकृत बेहतर रही है, वहां भी बाजार और परिवहन की स्थिति महत्वपूर्ण रहेगी।
हिमाचल के सेब कारोबार का अगला सीजन अब नई उम्मीदों के साथ शुरू होगा। इस साल की प्राकृतिक परिस्थितियों से मिले अनुभव के आधार पर बागवान मौसम की जानकारी, फसल प्रबंधन और आधुनिक बागवानी तकनीकों पर अधिक ध्यान दे सकते हैं। वहीं विभाग के स्तर पर भी उत्पादन में उतार-चढ़ाव के कारणों का अध्ययन महत्वपूर्ण होगा, ताकि आने वाले वर्षों में प्राकृतिक जोखिम को कम करने के उपाय किए जा सकें।
फिलहाल 13 सितंबर तक के आंकड़े हिमाचल के सेब सीजन की कमजोर तस्वीर पेश कर रहे हैं। सीजन लगभग समाप्त होने को है और अभी तक राज्य की मंडियों में एक करोड़ पेटी भी नहीं पहुंची है। 91.20 लाख पेटी की आवक और 70.80 लाख पेटी की कमी का आंकड़ा इस बात की ओर इशारा करता है कि इस बार बागवानों को प्राकृतिक परिस्थितियों की वजह से बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है। आने वाले दिनों में अंतिम उत्पादन और मंडी आवक के आंकड़े सामने आने के बाद ही पूरे सीजन के नुकसान का वास्तविक आकलन हो सकेगा।











