हिमंत बिस्वा सरमा बोले- 1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय

असम के CM हिमंत बिस्वा सरमा ने आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ पर 1975 के आपातकाल को लोकतंत्र का काला अध्याय बताया और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संदेश दिया।

आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 1975 के आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय बताया। उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वालों को श्रद्धांजलि दी और संवैधानिक मूल्यों के महत्व पर जोर दिया।

गुवाहाटी: भारत में आपातकाल की घोषणा की 51वीं वर्षगांठ के अवसर पर असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma ने 1975 के आपातकाल को देश के लोकतांत्रिक इतिहास का एक काला अध्याय बताते हुए कहा कि यह भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं को दबाने का सुनियोजित प्रयास था। उन्होंने उन लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की जिन्होंने उस दौर में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया और लोकतांत्रिक मूल्यों को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मुख्यमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब देशभर में 25 जून को आपातकाल की घोषणा की याद में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। केंद्र सरकार भी हाल के वर्षों में इस दिन को विशेष रूप से लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के संदर्भ में याद करती रही है।

सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए व्यक्त किए विचार

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि देश को उस दौर को याद रखना चाहिए जब 1975 में आपातकाल लागू किया गया था। उन्होंने इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक चुनौतीपूर्ण समय बताया और कहा कि उस अवधि में लोकतांत्रिक अधिकारों तथा नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित करने का प्रयास किया गया था।

उन्होंने अपने संदेश में उन लोगों को नमन किया जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए संघर्ष किया। मुख्यमंत्री के अनुसार लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती का आधार है।

क्या था 1975 का आपातकाल?

भारत में 25 जून 1975 को संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की गई थी। यह अवधि लगभग 21 महीनों तक चली और 21 मार्च 1977 को समाप्त हुई।

आपातकाल के दौरान केंद्र सरकार को व्यापक अधिकार प्राप्त हो गए थे। उस समय प्रेस पर नियंत्रण, राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी, सार्वजनिक गतिविधियों पर प्रतिबंध और कई नागरिक स्वतंत्रताओं पर सीमाएं लगाए जाने जैसे कदम उठाए गए थे।

भारतीय राजनीति में यह अवधि आज भी व्यापक चर्चा और बहस का विषय बनी हुई है। समर्थकों और आलोचकों के बीच आपातकाल को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं, लेकिन अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इसे देश के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानते हैं।

लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर बहस का केंद्र

आपातकाल की चर्चा अक्सर लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रताओं के संदर्भ में की जाती है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस अवधि ने भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, मीडिया की आजादी और नागरिक अधिकारों के महत्व को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया।

कई इतिहासकारों के अनुसार इस दौर ने भारतीय समाज को यह समझने का अवसर दिया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा कितनी महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि आपातकाल का उल्लेख आज भी राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता से किया जाता है।

संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर जोर

मुख्यमंत्री सरमा ने अपने संदेश में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के महत्व पर विशेष जोर दिया। उनका कहना था कि किसी भी लोकतांत्रिक देश की शक्ति उसकी संस्थाओं, नागरिकों की स्वतंत्रता और संविधान के प्रति सम्मान में निहित होती है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की भागीदारी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के शासन की अवधारणा से जुड़ा हुआ है। इसलिए लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा प्रत्येक पीढ़ी की जिम्मेदारी है।

‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा 25 जून

केंद्र सरकार ने वर्ष 2025 से 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इस पहल का उद्देश्य आपातकाल की घोषणा को याद करना और उस अवधि के दौरान हुई घटनाओं पर सार्वजनिक चर्चा को प्रोत्साहित करना बताया गया है।

सरकार का कहना है कि यह दिन संविधान और लोकतंत्र के महत्व को समझने तथा भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने की आवश्यकता को रेखांकित करने का अवसर प्रदान करता है।

वहीं विपक्षी दलों और कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने इस पहल पर अलग-अलग राय व्यक्त की है। उनका मानना है कि इतिहास की घटनाओं को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में समझा जाना चाहिए।

हिमंत बिस्वा सरमा बोले- 1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय

भारतीय राजनीति में आपातकाल की विरासत

आपातकाल समाप्त होने के बाद भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं को और मजबूत बनाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। इसके बाद हुए आम चुनावों में सत्ता परिवर्तन हुआ और लोकतांत्रिक प्रक्रिया ने एक बार फिर अपनी मजबूती दिखाई।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आपातकाल की घटनाओं ने भारत की लोकतांत्रिक चेतना को गहराई से प्रभावित किया। इस दौर के अनुभवों ने राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और मीडिया को लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के प्रति अधिक सजग बनाया।

आज भी जब लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों पर चर्चा होती है, तो आपातकाल का संदर्भ अक्सर सामने आता है। यह घटना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखी जाती है।

लोकतांत्रिक जागरूकता का अवसर

विशेषज्ञों का मानना है कि आपातकाल की वर्षगांठ केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की मूल भावना को समझने का भी समय है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति कितने जागरूक हैं।

शिक्षाविदों और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इतिहास की ऐसी घटनाओं का अध्ययन नई पीढ़ियों को लोकतांत्रिक संस्थाओं के महत्व और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की आवश्यकता को समझने में मदद करता है।

लोकतंत्र की रक्षा का संदेश

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की टिप्पणी ने एक बार फिर 1975 के आपातकाल और उसके प्रभावों पर राष्ट्रीय चर्चा को तेज कर दिया है। उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले लोगों को याद करते हुए यह संदेश दिया कि नागरिक स्वतंत्रताओं और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा किसी भी लोकतांत्रिक समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती, नागरिक अधिकारों का सम्मान और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता ही देश की राजनीतिक स्थिरता और विकास का आधार मानी जाती है। यही कारण है कि आपातकाल की स्मृति आज भी लोकतंत्र और स्वतंत्रता के महत्व की याद दिलाती है।

Leave a comment