हिसार के केंद्रीय विद्यालय के शिक्षक और तीन छात्राओं ने एआई तकनीक की मदद से 8.30 मिनट की शॉर्ट फिल्म तैयार की है। यह फिल्म दादी-पोते के भावनात्मक रिश्ते पर आधारित है और शिक्षा में तकनीक के बेहतर उपयोग का उदाहरण पेश करती है।
हिसार: केंद्रीय विद्यालय हिसार के अंग्रेजी शिक्षक संतोष काना ने तीन छात्राओं के साथ मिलकर एआई तकनीक की मदद से एक भावनात्मक शॉर्ट फिल्म तैयार की है। 'महिला का चित्र' अध्याय पर आधारित यह फिल्म दादी और पोते के रिश्ते को संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करती है और शिक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के रचनात्मक उपयोग को दर्शाती है।
AI तकनीक से तैयार हुई भावनात्मक शॉर्ट फिल्म
हर शिक्षक की पढ़ाने की अपनी अलग शैली होती है, लेकिन कुछ शिक्षक विद्यार्थियों को विषय से जोड़ने के लिए पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर नई तकनीकों का सहारा लेते हैं। हिसार स्थित केंद्रीय विद्यालय के अंग्रेजी शिक्षक संतोष काना ने भी ऐसा ही एक अनूठा प्रयोग किया है। उन्होंने कक्षा 11 के पाठ 'महिला का चित्र' से प्रेरित होकर 'वापसी: बैक टू द रूट्स' शीर्षक से 8.30 मिनट की एक शॉर्ट फिल्म तैयार की है, जिसे पूरी तरह एआई तकनीक की मदद से बनाया गया है।]

इस परियोजना में विद्यालय की तीन छात्राएं वर्तिका, अनुष्का और खुशी भी शामिल रहीं। फिल्म का मुख्य विषय ग्रामीण परिवेश में दादी और पोते के बीच का भावनात्मक रिश्ता है। कहानी के माध्यम से बदलती जीवनशैली, परिवारों के बिखराव और बुजुर्गों के अकेलेपन को संवेदनशील ढंग से दिखाया गया है।
30 दिनों की मेहनत से पूरा हुआ प्रोजेक्ट
शिक्षक संतोष काना के अनुसार इस प्रोजेक्ट की शुरुआत जून महीने में हुई थी। शुरुआत में टीम ने इस बात पर विचार किया कि फिल्म को पारंपरिक तरीके से शूट किया जाए या किसी नई तकनीक का उपयोग किया जाए। अभिनय, लोकेशन और समय जैसी चुनौतियों को देखते हुए एआई तकनीक का उपयोग करने का निर्णय लिया गया।
इसके बाद शिक्षक और तीनों छात्राओं ने मिलकर करीब 30 दिनों में इस शॉर्ट फिल्म को तैयार किया। एआई की मदद से कहानी को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया गया, जिससे सीमित संसाधनों में भी उच्च गुणवत्ता वाली प्रस्तुति संभव हो सकी। इस पहल ने यह भी दिखाया कि आधुनिक तकनीक का उपयोग शिक्षा को अधिक रोचक और प्रभावी बनाने में किया जा सकता है।
दादी-पोते के रिश्ते को दिखाती है फिल्म
फिल्म की कहानी एक गांव में रहने वाली दादी और उसके पोते के इर्द-गिर्द घूमती है। परिवार के अन्य सदस्य रोजगार के लिए शहर चले जाते हैं और दादी अपने पोते के साथ गांव में रहती है। दोनों के बीच गहरा स्नेह और अपनापन होता है। बाद में पोते को भी शहर जाना पड़ता है, जहां आधुनिक जीवन की व्यस्तता के कारण वह दादी के साथ पहले जैसा समय नहीं बिता पाता।
समय के साथ पोता पढ़ाई पूरी कर विदेश चला जाता है और दादी अकेली पड़ जाती है। कई वर्षों बाद जब वह वापस लौटता है, तब तक बहुत कुछ बदल चुका होता है। दादी की तबीयत बिगड़ने के बाद उनका निधन हो जाता है और पोते को रिश्तों की अहमियत का गहरा एहसास होता है। फिल्म परिवार, संस्कार और बुजुर्गों के सम्मान का भावनात्मक संदेश देती है।
शिक्षक की उपलब्धियां भी हैं प्रेरणादायक
संतोष काना लंबे समय से शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार के लिए जाने जाते हैं। वह शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में रिसोर्स पर्सन के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। नेपाल के काठमांडू स्थित केंद्रीय विद्यालय में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 2011 से वह विद्यार्थियों के साथ मिलकर कई शॉर्ट फिल्में, रेडियो नाटक और रचनात्मक शैक्षणिक प्रोजेक्ट तैयार कर चुके हैं।
इसके अलावा उन्हें विद्यार्थियों के साथ इनोवेटिव प्रोजेक्ट्स पर उत्कृष्ट कार्य के लिए केंद्रीय विद्यालय संगठन की ओर से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने यात्रा-वृत्तांत पर पुस्तकें लिखी हैं तथा अंग्रेजी और मलयालम भाषा में कई कविताएं भी प्रकाशित की हैं। उनकी यह नई पहल शिक्षा और तकनीक के समन्वय का एक प्रेरक उदाहरण मानी जा रही है।










