QS World University Rankings 2027 में कोई भारतीय संस्थान टॉप 100 में जगह नहीं बना पाया। IIT दिल्ली 118वें स्थान पर है। IIT BHU के पूर्व छात्र आकाश पांडे ने इसके पीछे तीन बड़ी वजहें बताई हैं।
नई दिल्ली: गूगल के सुंदर पिचाई और IBM के अरविंद कृष्णा जैसे बड़े नाम IIT से पढ़कर निकले हैं। इन संस्थानों के छात्र दुनिया की कई बड़ी कंपनियों में ऊंचे पदों पर काम कर रहे हैं। इसके बावजूद QS World University Rankings 2027 में एक भी IIT टॉप 100 में नहीं है। IIT दिल्ली देश में सबसे आगे होने के बाद भी 118वें नंबर पर है। इस अंतर को लेकर IIT BHU के पूर्व छात्र आकाश संपूर्णानंद पांडे ने तीन वजहें बताई हैं।
IIT दिल्ली देश में पहले नंबर पर, दुनिया में 118वीं रैंक
QS ने जून 2026 में दुनिया की यूनिवर्सिटीज की नई रैंकिंग जारी की थी। इसमें अमेरिका का मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) लगातार 15वें साल पहले स्थान पर रहा। भारत की तरफ से IIT दिल्ली ने सबसे अच्छी रैंक हासिल की।
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IIT दिल्ली इस बार पांच स्थान ऊपर चढ़कर 118वें नंबर पर पहुंचा। पिछले साल उसकी रैंक 123 थी। वहीं IIT बॉम्बे को 134वां स्थान मिला। IIT मद्रास 170वें और IIT खड़गपुर 205वें नंबर पर रहा।
इस साल भारत के कुल 52 संस्थानों को QS की सूची में जगह मिली है। साल 2015 में यह संख्या केवल 14 थी। यानी पहले के मुकाबले ज्यादा भारतीय संस्थान अब अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में शामिल हो रहे हैं, लेकिन दुनिया के शुरुआती 100 संस्थानों में जगह बनाने का इंतजार अभी बाकी है।
इस बीच एक सवाल फिर चर्चा में है। जब IIT से पढ़े छात्र दुनिया की बड़ी कंपनियों में अच्छे पदों पर पहुंच रहे हैं, तो इन संस्थानों की ग्लोबल रैंकिंग उतनी ऊपर क्यों नहीं जाती?
पूर्व IIT छात्र ने बताईं रैंकिंग में पीछे रहने की तीन वजहें
IIT BHU से पढ़ाई कर चुके आकाश संपूर्णानंद पांडे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस सवाल को उठाया है। उनका कहना है कि QS रैंकिंग में ऐसी कई चीजें देखी जाती हैं, जिन पर IIT का उतना जोर नहीं रहा है।
आकाश ने पहली वजह विदेशी छात्रों और शिक्षकों की संख्या को बताया। QS रैंकिंग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थान की मौजूदगी को कुल 15 प्रतिशत महत्व मिलता है। इसमें विदेशी शिक्षक, विदेशी छात्र और दूसरे देशों के संस्थानों के साथ रिसर्च का काम शामिल है।
आकाश का कहना है कि IIT मुख्य रूप से भारत के छात्रों को तकनीकी शिक्षा देने के लिए बनाए गए थे। यहां दाखिला लेने वाले ज्यादातर छात्र भारतीय होते हैं। दूसरी तरफ MIT जैसे बड़े विदेशी संस्थानों में दुनिया के कई देशों से छात्र और शिक्षक आते हैं।
दूसरी वजह शिक्षकों और छात्रों का अनुपात है। QS रैंकिंग में इसके लिए 10 प्रतिशत अंक निर्धारित हैं। किसी संस्थान में छात्रों के मुकाबले कितने शिक्षक उपलब्ध हैं, यह भी उसकी रैंकिंग को प्रभावित करता है।
आकाश के मुताबिक, IIT में शिक्षकों की कमी एक बड़ी चुनौती रही है। जब छात्रों के मुकाबले शिक्षक कम होते हैं, तो इस पैमाने पर संस्थान को नुकसान हो सकता है।
तीसरी वजह रिसर्च से जुड़ी है। QS रैंकिंग में प्रति शिक्षक शोध पत्रों को मिलने वाले संदर्भों यानी रिसर्च साइटेशन को 20 प्रतिशत महत्व दिया जाता है।
आकाश का तर्क है कि IIT का ध्यान लंबे समय तक इंजीनियरिंग की पढ़ाई और अच्छे तकनीकी पेशेवर तैयार करने पर रहा है। दूसरी तरफ दुनिया की कई बड़ी रिसर्च यूनिवर्सिटीज के पास अलग-अलग विषयों के विभाग, ज्यादा संसाधन और बड़े रिसर्च प्रोजेक्ट होते हैं।
ऐसे में विश्वविद्यालयों की तुलना केवल पढ़ाई या छात्रों की नौकरी के आधार पर नहीं होती। शोध और अंतरराष्ट्रीय पहचान भी उनकी कुल रैंकिंग में असर डालते हैं।
अच्छे छात्र तैयार करना IIT की सबसे बड़ी ताकत
आकाश का मानना है कि IIT की सफलता को केवल अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग से नहीं समझा जा सकता। इन संस्थानों की एक बड़ी पहचान यहां से पढ़कर निकलने वाले छात्र हैं।
हर साल बड़ी संख्या में युवा IIT में दाखिले के लिए प्रतियोगी परीक्षा देते हैं। इनमें से कुछ ही छात्रों को प्रवेश मिल पाता है। इसके बाद वे इंजीनियरिंग और तकनीक से जुड़े अलग-अलग क्षेत्रों में पढ़ाई करते हैं।
IIT के कई पूर्व छात्र आगे चलकर विदेशी कंपनियों में बड़े पदों तक पहुंचे हैं। सुंदर पिचाई ने IIT खड़गपुर से और अरविंद कृष्णा ने IIT कानपुर से पढ़ाई की थी।
हालांकि बड़े पदों पर पहुंचे कुछ पूर्व छात्रों की सफलता और किसी संस्थान की कुल रैंकिंग को एक जैसा नहीं माना जा सकता। QS में रोजगार से जुड़े नतीजे भी देखे जाते हैं, लेकिन इनके अलावा शैक्षणिक प्रतिष्ठा, रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों जैसे दूसरे पैमानों का भी इस्तेमाल होता है।
IIT दिल्ली की रैंकिंग में इस बार सुधार हुआ है। संस्थान के मुताबिक, दुनिया के नियोक्ताओं के बीच उसकी पहचान बेहतर हुई है। रोजगार से जुड़े नतीजों में भी उसने अपनी स्थिति मजबूत की है।
आकाश ने IIT BHU से मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया है। इसके बाद उन्होंने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स की डिग्री ली। वह फिलहाल न्यूयॉर्क की टेक कंपनी Rippling में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं।
उनकी टिप्पणी ने एक बार फिर यह चर्चा शुरू की है कि किसी शिक्षण संस्थान की गुणवत्ता मापते समय छात्रों की सफलता को कितना महत्व मिलना चाहिए।
विदेशी छात्रों की संख्या, शिक्षकों की उपलब्धता और रिसर्च जैसे पैमाने महत्वपूर्ण हैं। वहीं किसी संस्थान से पढ़े युवाओं का करियर भी उसकी पहचान का हिस्सा है। इसलिए कॉलेज चुनते समय केवल एक रैंकिंग देखने के बजाय संबंधित कोर्स, शिक्षकों, रिसर्च सुविधाओं और रोजगार के अवसरों की जानकारी लेना भी जरूरी है।
दुनिया की यूनिवर्सिटीज की पूरी रैंकिंग और संस्थानों के प्रदर्शन की जानकारी QS की आधिकारिक वेबसाइट topuniversities.com पर देखी जा सकती है।








