वैश्विक कर्ज संकट पर IMF की चेतावनी, अमेरिका और अमीर देशों से बजट घाटा घटाने की अपील

IMF क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने अमेरिका और अमीर देशों से बढ़ते सरकारी कर्ज और बजट घाटे पर नियंत्रण की अपील। ऊंची ब्याज दरों, घटती सहायता से गरीब देशों पर दबाव

IMF प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने अमेरिका और अन्य अमीर देशों से बढ़ते सरकारी कर्ज तथा बजट घाटे पर नियंत्रण की अपील की। ऊंची ब्याज दरों और घटती विदेशी सहायता के कारण गरीब देशों के लिए कर्ज चुकाना और जरूरी सेवाएं जारी रखना मुश्किल हो रहा है।

बैंकॉक: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने अमेरिका और अन्य धनी देशों से बढ़ते सरकारी कर्ज और बजट घाटे पर तत्काल नियंत्रण करने की अपील की है। उन्होंने चेतावनी दी कि वैश्विक कर्ज का बढ़ता बोझ गरीब देशों पर सबसे ज्यादा दबाव डाल रहा है और इससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था पर भी असर पड़ रहा है।

बुधवार को बैंकॉक में IMF और विश्व बैंक की शरदकालीन बैठक के दौरान जॉर्जीवा ने कहा कि आर्थिक विकास कर्ज की समस्या कम करने में मदद कर सकता है, लेकिन केवल विकास के भरोसे जरूरी वित्तीय सुधार समय पर करना संभव नहीं होगा। उनके मुताबिक, सरकारों को घाटा घटाने और वित्तीय अनुशासन मजबूत करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने होंगे।

अमेरिका के कर्ज और बजट घाटे पर चिंता

जॉर्जीवा ने कहा कि अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और अन्य अमेरिकी नेता इस बात को समझते हैं कि संघीय बजट घाटा और राष्ट्रीय कर्ज जरूरत से ज्यादा बढ़ गए हैं। हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि सिर्फ अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि के सहारे 40 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के राष्ट्रीय कर्ज की समस्या हल नहीं की जा सकती।

उन्होंने कहा कि विकास आर्थिक स्थिति सुधारने में मददगार है, लेकिन आवश्यक वित्तीय समायोजन के लिए पर्याप्त तेजी से परिणाम नहीं दे सकता। इसलिए बजट घाटे को कम करने और सरकारी वित्त को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में कदम उठाने जरूरी हैं।

यह अपील ऐसे समय आई है, जब कई देशों में सरकारी कर्ज और महंगाई का दबाव बना हुआ है। बढ़ती ऊर्जा कीमतों, विशेषकर ईरान युद्ध से जुड़ी महंगी ऊर्जा लागत, ने वैश्विक मुद्रास्फीति को प्रभावित किया है। इसके साथ ही ब्याज दरें कई दशकों के उच्च स्तर तक पहुंच गई हैं, जिससे कर्ज लेना और पुराने कर्ज की अदायगी महंगी हो गई है।

गरीब देशों पर कर्ज भुगतान का बढ़ता बोझ

IMF के नवीनतम फिस्कल मॉनिटर के अनुसार, दुनिया के सबसे गरीब देशों में ब्याज भुगतान सरकारी राजस्व के मुकाबले ऐतिहासिक रूप से ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। दूसरी ओर, विदेशी सहायता में गिरावट से वित्तीय अंतर पैदा हो रहे हैं। कुछ देशों के लिए इन कमियों को दूसरे स्रोतों से पूरा करना भी संभव नहीं हो पा रहा है।

इस स्थिति में सरकारों को कठिन फैसले लेने पड़ रहे हैं। उन्हें एक तरफ गरीब और कमजोर तबकों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा तथा अन्य जरूरी सहायता बनाए रखनी है, वहीं दूसरी तरफ कर्ज की किस्तें और ब्याज भी चुकाना है।

IMF के राजकोषीय मामलों के विभाग के निदेशक रोड्रिगो वाल्देस ने कहा कि कई देशों में राजकोषीय जोखिम बढ़ रहे हैं, लेकिन उनके अनुरूप नीतिगत प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दे रही है। उन्होंने यह भी कहा कि बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय अनुशासन की कमी का असर उनकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों तक पहुंचता है।

इसका मतलब है कि बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की उधारी और बजट नीतियां वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों को प्रभावित कर सकती हैं। जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो कम आय वाले देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से पूंजी जुटाना अधिक महंगा हो सकता है।

विकासशील देशों को विकसित देशों से तीन गुना ब्याज भुगतान

बेल्जियम के पूर्व प्रधानमंत्री और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के प्रशासक अलेक्जेंडर डी क्रू ने कहा कि आज औसत विकासशील देश ब्याज भुगतान पर विकसित देशों की तुलना में तीन गुना राशि खर्च कर रहा है।

उनके अनुसार, औसतन सरकारी खर्च का लगभग 10 प्रतिशत कर्ज चुकाने में जा रहा है। ईंधन, उर्वरक और अन्य आवश्यक वस्तुओं की ऊंची कीमतों, अल नीनो मौसम घटना के प्रभाव और महंगी उधारी ने कम आय वाले देशों की आर्थिक स्थिति को और कठिन बना दिया है।

डी क्रू ने कहा कि मौजूदा हालात में सुधार की स्पष्ट संभावना नजर नहीं आ रही है। कर्ज भुगतान पर अधिक खर्च होने से सरकारों के पास विकास योजनाओं, सार्वजनिक सेवाओं और कमजोर समुदायों की मदद के लिए सीमित संसाधन बचते हैं।

कोविड के बाद बढ़ा वित्तीय दबाव

कोविड-19 महामारी के दौरान और उसके बाद सरकारों ने बड़े पैमाने पर खर्च किया। इससे आर्थिक गतिविधियों और लोगों की सहायता को बनाए रखने में मदद मिली, लेकिन कई देशों के सार्वजनिक वित्त पर दबाव भी बढ़ा। अब बढ़ते कर्ज, महंगाई और ऊंची ब्याज दरों के बीच सरकारों के लिए वित्तीय संतुलन कायम करना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

IMF और अन्य विशेषज्ञ इस स्थिति से निपटने के लिए राजकोषीय समेकन यानी सरकारी राजस्व और खर्च के बीच संतुलन सुधारने पर जोर दे रहे हैं। हालांकि, घाटा घटाने के उपायों के साथ यह भी जरूरी है कि गरीब और कमजोर लोगों की बुनियादी जरूरतों पर प्रतिकूल असर न पड़े।

रोजगार सृजन भी बड़ी चुनौती

कर्ज संकट के अलावा रोजगार की कमी भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती है। अगले लगभग एक दशक में 1.2 अरब से अधिक युवा वैश्विक श्रम बाजार में प्रवेश करने की उम्मीद है। इसके मुकाबले उपलब्ध पूर्वानुमानों के अनुसार, शुद्ध रूप से केवल 40 करोड़ नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते इस्तेमाल से रोजगार बाजार की चुनौतियां और जटिल हो सकती हैं। जहां AI उत्पादकता और आर्थिक वृद्धि के नए अवसर पैदा कर सकता है, वहीं कुछ पारंपरिक कामों की मांग कम होने का जोखिम भी है।

ऐसे में सरकारों के सामने केवल आर्थिक वृद्धि हासिल करने की ही नहीं, बल्कि पर्याप्त रोजगार पैदा करने और युवाओं को बदलती अर्थव्यवस्था के अनुरूप अवसर उपलब्ध कराने की भी चुनौती है।

UNDP की 'जॉब्स फॉर प्रॉस्पेरिटी' पहल

UNDP ने इसी सप्ताह 'जॉब्स फॉर प्रॉस्पेरिटी' नाम से एक पहल की घोषणा की। इसका उद्देश्य सरकारों, विश्व बैंक जैसे विकास बैंकों और निजी कंपनियों के साथ मिलकर रोजगार पैदा करने वाले क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करना है।

इस पहल के तहत पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा। डी क्रू के अनुसार, देशों को निवेश आकर्षित करने में मदद देने के लिए शासन व्यवस्था और नीतियों में सुधार तथा निवेश के योग्य परियोजनाओं की स्पष्ट सूची तैयार करने पर भी काम किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि ऐसे उपाय व्यावहारिक हैं और दुनिया के कई हिस्सों में इन्हें लागू करने के उदाहरण मौजूद हैं।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए आगे की राह

IMF की चेतावनी का मुख्य संदेश यह है कि बढ़ते सरकारी कर्ज और बजट घाटे को केवल आर्थिक वृद्धि के भरोसे नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं होगा। बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय अनुशासन का वैश्विक असर पड़ता है, जबकि गरीब देशों को ऊंचे ब्याज भुगतान और घटती सहायता के कारण विकास की प्राथमिकताओं से समझौता करना पड़ सकता है।

कर्ज प्रबंधन, जरूरी सार्वजनिक सेवाओं की सुरक्षा और रोजगार सृजन के बीच संतुलन बनाना आने वाले वर्षों में सरकारों के लिए अहम रहेगा। IMF की अपील और UNDP की रोजगार पहल इसी व्यापक चुनौती के अलग-अलग पहलुओं को रेखांकित करती हैं।

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