इजराइल चुनाव में नेतन्याहू गठबंधन आगे, लेकिन बहुमत से चार सीट दूर, अरब पार्टियां बन सकती हैं किंगमेकर

इजराइल चुनाव 2026 में 41.9% मतगणना के बाद नेतन्याहू गठबंधन को 57 और आइजनकोट को 47 सीटों का अनुमान है। अरब पार्टियां सरकार गठन में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

इजराइल के संसदीय चुनाव में 41.9 प्रतिशत मतगणना के बाद नेतन्याहू गठबंधन को 57 और गादी आइजनकोट के पक्ष को 47 सीटें मिलने का अनुमान है। अरब दलों को 16 सीटें मिल सकती हैं, जिससे सरकार गठन में उनकी भूमिका अहम होगी।

यरुशलम: इजराइल में मंगलवार को हुए संसदीय चुनाव के बाद बुधवार सुबह तक वोटों की गिनती जारी रही। शुरुआती रुझानों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन सबसे आगे दिखाई दे रहा है, लेकिन अभी किसी भी पक्ष के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। इजराइली संसद नेसेट की कुल 120 सीटों में सरकार बनाने के लिए 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में अरब पार्टियों के प्रदर्शन ने चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

नेतन्याहू गठबंधन को 57 सीटें मिलने का अनुमान

अब तक 41.9 प्रतिशत मतों की गिनती के आधार पर नेतन्याहू समर्थक दलों को 57 सीटें मिलने की संभावना है। वहीं, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले राजनीतिक खेमे को 47 सीटें मिल सकती हैं।

जॉइंट लिस्ट और राअम जैसी अरब पार्टियों को कुल 16 सीटें मिलने का अनुमान है। इन आंकड़ों के अनुसार नेतन्याहू बहुमत से चार सीट पीछे हैं। हालांकि, यह अंतिम परिणाम नहीं है। मतगणना आगे बढ़ने और छोटे दलों के प्रदर्शन में बदलाव होने से गठबंधन की सीटों का अनुमान बदल सकता है।

सरकार बनाने में अरब पार्टियों की भूमिका अहम

इस बार अरब मतदाताओं की भागीदारी ने चुनावी समीकरणों पर असर डाला है। शुरुआती आंकड़ों में जॉइंट लिस्ट को 11 और राअम को पांच सीटें मिलने के संकेत हैं।

जॉइंट लिस्ट में हदाश, ताल और बलद जैसी पार्टियां शामिल हैं। ये दल मुख्य रूप से इजराइल के अरब नागरिकों के राजनीतिक अधिकार, समान अवसर और सामाजिक मुद्दों को उठाते हैं।

राअम अलग चुनाव लड़ रही है। अगर अंतिम परिणाम में भी अरब दलों की सीटें इसी स्तर पर रहती हैं, तो सरकार बनाने की कोशिश कर रहे राजनीतिक खेमों के लिए उनका समर्थन महत्वपूर्ण होगा।

नेतन्याहू और आइजनकोट के सामने क्या चुनौती?

प्रधानमंत्री नेतन्याहू पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वह अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर सरकार नहीं बनाना चाहते। ऐसे में उन्हें अपने मौजूदा सहयोगियों के अलावा दूसरे सांसदों का समर्थन जुटाना पड़ सकता है।

दूसरी तरफ गादी आइजनकोट के लिए भी बहुमत तक पहुंचना आसान नहीं दिख रहा। विपक्षी दलों के साथ उन्हें अरब पार्टियों के सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।

हालांकि, किसी गठबंधन को बाहर से समर्थन देना और उसमें औपचारिक रूप से शामिल होना अलग राजनीतिक फैसले हैं। इस वजह से सीटों की गणना के साथ दलों की आपसी सहमति भी महत्वपूर्ण होगी।

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नेतन्याहू से समझौते पर विपक्ष में मतभेद संभव

इजराइल के पूर्व राजनयिक एलन पिंकस ने भी चुनाव के बाद गठबंधन बनाने की मुश्किलों का जिक्र किया है। अल जजीरा से बातचीत में उन्होंने कहा कि विपक्ष का समर्थन करने वाले मतदाता गादी आइजनकोट और नेतन्याहू के बीच समझौते को स्वीकार नहीं कर सकते।

पिंकस के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच प्रधानमंत्री पद साझा करने की व्यवस्था भी विवाद पैदा कर सकती है। ऐसी सरकार में नीतिगत फैसलों और नेतृत्व को लेकर लगातार मतभेद रहने की आशंका होगी।

लिकुड सबसे बड़ी पार्टी बनने की ओर

इजराइल के केंद्रीय चुनाव आयोग के शुरुआती आंकड़ों में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे आगे रही। करीब 42 प्रतिशत मतगणना तक लिकुड को 22.24 प्रतिशत वोट मिले थे।

गादी आइजनकोट की याशर पार्टी 15.41 प्रतिशत मतों के साथ दूसरे स्थान पर थी। जॉइंट लिस्ट को 8.28 प्रतिशत और नफ्ताली बेनेट की पार्टी को 8.22 प्रतिशत वोट मिले थे। इस चुनाव में लगभग 73.3 लाख नागरिक मतदान करने के पात्र थे। इनमें से करीब 56.9 लाख लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया।

इजराइल में कैसे तय होती हैं संसद की सीटें?

इजराइल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते। वे राजनीतिक पार्टियों को वोट देते हैं और पूरे देश में मिले मतों के अनुपात के अनुसार संसद की सीटें बांटी जाती हैं।

किसी पार्टी को संसद में पहुंचने के लिए कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध वोट हासिल करने होते हैं। इस सीमा से नीचे रहने वाली पार्टी को कोई सीट नहीं मिलती।
इस व्यवस्था के कारण छोटी पार्टियां भी चुनाव के बाद सरकार गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

बहुमत नहीं मिला तो क्या दोबारा चुनाव होंगे?

अगर कोई गठबंधन 61 सांसदों का समर्थन नहीं जुटा पाता है, तो राष्ट्रपति विभिन्न दलों से बातचीत के बाद सरकार बनाने की जिम्मेदारी किसी नेता को सौंप सकते हैं। गठबंधन बनाने की कोशिशें विफल होने पर दोबारा चुनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि, अभी ऐसा फैसला नहीं हुआ है।

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