इजराइल में जबरदस्त मतदान, दोपहर तक 31.5% वोटिंग; नेतन्याहू को आइजनकोट से कड़ी टक्कर

Israel election: इजराइल चुनाव में दोपहर तक 31.5% मतदान दर्ज हुआ, जो 1977 के बाद सबसे अधिक है। नेतन्याहू और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट में कड़ा मुकाबला है।

इजराइल में संसदीय चुनाव के लिए मतदान जारी है। दोपहर 12 बजे तक 31.5 प्रतिशत वोट पड़े, जो 1977 के बाद इस समय का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट से कड़ी चुनौती मिल रही है।

यरुशलम: इजराइल में मंगलवार को नई संसद चुनने के लिए मतदान हो रहा है। सुबह से ही मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की अच्छी भागीदारी दर्ज की गई। केंद्रीय चुनाव समिति के मुताबिक, स्थानीय समयानुसार दोपहर 12 बजे तक 31.5 प्रतिशत मतदाता वोट डाल चुके थे। यह उस समय तक का 1977 के बाद सबसे अधिक मतदान है। चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। मतदान रात 10 बजे तक चलेगा, जिसके बाद वोटों की गिनती और नई सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू होगी। 

शुरुआती मतदान में दशकों पुराना रिकॉर्ड टूटा

इजराइल में इस बार मतदाताओं का उत्साह पिछले कई चुनावों से ज्यादा दिखाई दे रहा है। सुबह 10 बजे तक 16.7 प्रतिशत वोट पड़ चुके थे। करीब 12 लाख लोगों ने मतदान के शुरुआती तीन घंटों में अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। दोपहर तक मतदान बढ़कर 31.5 प्रतिशत पहुंच गया। वर्ष 2022 के चुनाव में इसी समय तक 28.4 प्रतिशत मतदान हुआ था।

हालांकि, 53 साल पुराना रिकॉर्ड टूटने का दावा सही नहीं है। चुनाव आयोग के ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, 1973 में दोपहर तक 33.1 प्रतिशत मतदान हुआ था। इसलिए मौजूदा आंकड़ा 1977 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। 

नेतन्याहू और गादी आइजनकोट के बीच मुकाबला

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपनी लिकुड पार्टी और दक्षिणपंथी सहयोगियों के सहारे सत्ता में बने रहने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट अपनी याशार पार्टी के साथ बदलाव का वादा कर रहे हैं।

चुनाव से पहले आए कई सर्वेक्षणों में आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी दलों को नेतन्याहू के गठबंधन से अधिक सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि, किसी भी खेमे को स्पष्ट बहुमत मिलने की गारंटी नहीं है। ऐसे में छोटे दलों और चुनाव के बाद होने वाले गठबंधन समझौतों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। 

इजराइल में कैसे चुना जाता है प्रधानमंत्री?

इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। यहां मतदाता सीधे प्रधानमंत्री नहीं चुनते। वे राजनीतिक दलों की सूची के पक्ष में वोट डालते हैं। देशभर में मिले वैध वोटों के अनुपात में पार्टियों को संसद की सीटें आवंटित होती हैं।

किसी दल को संसद में प्रतिनिधित्व पाने के लिए कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध वोट हासिल करने होते हैं। चुनाव के बाद राष्ट्रपति उस नेता को सरकार बनाने का अवसर देते हैं, जिसके बहुमत जुटाने की संभावना सबसे अधिक होती है। 

हमास के 7 अक्टूबर हमले की जांच बड़ा मुद्दा

साल 2023 में हमास के नेतृत्व में हुए हमले और उसे रोकने में इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था की विफलता इस चुनाव का महत्वपूर्ण मुद्दा है। विपक्ष का आरोप है कि नेतन्याहू सरकार ने हमले से पहले सामने आई सुरक्षा संबंधी कमजोरियों की जवाबदेही तय नहीं की।

इजराइल में जबरदस्त मतदान, दोपहर तक 31.5% वोटिंग; नेतन्याहू को आइजनकोट से कड़ी टक्कर

आइजनकोट और अन्य विपक्षी नेता स्वतंत्र राष्ट्रीय जांच आयोग बनाने की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर नेतन्याहू अपने सैन्य और सुरक्षा संबंधी फैसलों को चुनाव प्रचार में प्रमुखता से रख रहे हैं। इस मुद्दे पर मतदाताओं के बीच सरकार की जवाबदेही और भविष्य की राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर बहस जारी है। 

हरेदी समुदाय की सैन्य भर्ती पर मतभेद

इजराइल में अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय, जिसे हरेदी कहा जाता है, के धार्मिक छात्रों को सैन्य सेवा में मिलने वाली छूट लंबे समय से विवाद का विषय है। कई इजराइली नागरिकों का कहना है कि लगातार सैन्य संघर्षों के बीच सेवा की जिम्मेदारी समाज के सभी वर्गों में बांटी जानी चाहिए।

नेतन्याहू के गठबंधन में हरेदी समुदाय से जुड़े राजनीतिक दल शामिल हैं। विपक्ष सैन्य भर्ती के नियमों में बदलाव और धार्मिक छात्रों के लिए लागू छूट को समाप्त करने की मांग कर रहा है। यह मुद्दा नई सरकार बनने के बाद भी राजनीतिक टकराव की वजह बन सकता है। 

सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों को लेकर भी विवाद

न्यायपालिका की भूमिका और सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां भी चुनाव प्रचार में चर्चा का विषय रही हैं। नेतन्याहू सरकार ने पहले न्यायिक व्यवस्था में ऐसे बदलावों की कोशिश की थी, जिनके खिलाफ देश में बड़े प्रदर्शन हुए।

सरकार के समर्थक इन बदलावों को निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकार मजबूत करने का कदम बताते हैं। विरोधियों का कहना है कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। विपक्ष ने सत्ता में आने पर विवादित न्यायिक बदलावों की समीक्षा करने का वादा किया है।

दोनों नेताओं का सेना से पुराना संबंध

बेंजामिन नेतन्याहू इजराइली सेना की विशेष कमांडो इकाई सायरेत मतकल में सेवा दे चुके हैं। उनके बड़े भाई योनातन नेतन्याहू वर्ष 1976 में युगांडा के एंटेबे बंधक-मुक्ति अभियान में मारे गए थे।

गादी आइजनकोट ने अपना सैन्य करियर गोलानी ब्रिगेड से शुरू किया था। वह 2015 से 2019 तक इजराइल के सेना प्रमुख रहे। दिसंबर 2023 में गाजा युद्ध के दौरान उनके बेटे गाल की मौत हो गई थी। अगले दिन उनके भतीजे माओर कोहेन आइजनकोट भी युद्ध में मारे गए थे। दोनों नेताओं के सैन्य अनुभव और युद्ध से जुड़े व्यक्तिगत नुकसान इस चुनाव में उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बने हुए हैं।

नतीजों के बाद गठबंधन की चुनौती

मतदान पूरा होने के बाद पार्टियों को मिले वोटों के आधार पर संसद की सीटें तय होंगी। लेकिन सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी का नेता अपने आप प्रधानमंत्री नहीं बन जाएगा।

यदि किसी भी राजनीतिक खेमे को 61 सांसदों का समर्थन नहीं मिलता, तो गठबंधन बनाने के लिए लंबी बातचीत करनी पड़ सकती है। इसलिए अधिक मतदान और शुरुआती चुनावी रुझानों के बावजूद अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि नेतन्याहू सत्ता में लौटेंगे या आइजनकोट नई सरकार बनाएंगे।

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