केरल सरकार ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के दो गोपनीय विभागों को सूचना के अधिकार कानून से छूट दी है। गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने जांच की गोपनीयता के लिए इसे जरूरी बताया। विपक्ष ने फैसले पर सवाल उठाए हैं।
तिरुवनंतपुरम: केरल में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने वाली एजेंसी के दो गोपनीय विभागों को सूचना के अधिकार कानून (RTI) से बाहर रखने के फैसले पर राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। राज्य के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने मंगलवार, 27 अक्टूबर को सरकार के इस कदम का बचाव किया। उन्होंने कहा कि विजिलेंस एंड एंटी करप्शन ब्यूरो (VACB) की संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक होने से जांच प्रभावित हो सकती है। इससे भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे लोगों को भी फायदा मिलने की आशंका रहती है। हालांकि, विपक्ष और पारदर्शिता के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस फैसले को सूचना के अधिकार के खिलाफ बताया है।
केरल सरकार ने RTI कानून में क्या बदलाव किया?
केरल सरकार ने 22 अक्टूबर 2026 को एक गजट अधिसूचना जारी कर विजिलेंस एंड एंटी करप्शन ब्यूरो के टी-1 और टी-2 विभागों को आरटीआई कानून से छूट दी थी। ये दोनों विभाग बेहद संवेदनशील और गोपनीय मामलों से जुड़े दस्तावेज संभालते हैं।
सरकार ने इस फैसले के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 24(4) का इस्तेमाल किया है। इस प्रावधान के तहत राज्य सरकार निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए कुछ खुफिया और सुरक्षा संगठनों को आरटीआई कानून के दायरे से बाहर रख सकती है।
इससे पहले भी केरल में कई खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के कुछ कार्यों को सूचना के अधिकार कानून से छूट मिली हुई है।
गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने क्या कहा?
गृह मंत्री रमेश चेन्निथला का कहना है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच के दौरान कई ऐसी जानकारियां जुटाई जाती हैं, जिन्हें समय से पहले सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा। उनके मुताबिक, गोपनीय दस्तावेजों के बाहर आने से जांच की दिशा प्रभावित हो सकती है। इससे जांच के दायरे में आने वाले व्यक्तियों को साक्ष्यों या जांच की रणनीति की जानकारी मिलने का खतरा रहता है।
चेन्निथला ने स्पष्ट किया कि यह फैसला जांच एजेंसी के कामकाज को सुरक्षित रखने के लिए लिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित प्रस्ताव पिछली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार के कार्यकाल में विजिलेंस निदेशक की सिफारिश के आधार पर आगे बढ़ाया गया था।
टी-1 और टी-2 विभागों में कौन-सी जानकारी होती है?
विजिलेंस ब्यूरो का टी-1 विभाग वरिष्ठ अधिकारियों से संबंधित गोपनीय रिपोर्ट, संवेदनशील व्यक्तिगत फाइलों और उच्चस्तरीय जांच से जुड़े दस्तावेज संभालता है। इनमें सरकारी अधिकारियों और सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ प्राप्त शिकायतों से संबंधित जानकारी भी शामिल हो सकती है।
दूसरी ओर, टी-2 विभाग खुफिया सूचनाओं, जांच अधिकारियों की साप्ताहिक रिपोर्ट और गोपनीय स्रोतों से मिलने वाली जानकारियों पर काम करता है। इन विभागों के पास मौजूद सूचनाएं कई बार शुरुआती जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। यही वजह है कि सरकार इनकी गोपनीयता बनाए रखने पर जोर दे रही है।
विपक्ष ने फैसले पर क्यों उठाए सवाल?
केरल में भाजपा ने सरकार के फैसले का विरोध करते हुए आरोप लगाया है कि इस छूट से राजनीतिक नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की जानकारी सार्वजनिक होने में बाधा आ सकती है। भाजपा नेता के. सुरेंद्रन ने इसे लोकतांत्रिक पारदर्शिता के खिलाफ कदम बताया। पार्टी का आरोप है कि सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश कर रही है।
कुछ कानूनी विशेषज्ञों और आरटीआई कार्यकर्ताओं ने भी चिंता जताई है कि यदि गोपनीय विभागों में फाइलें स्थानांतरित करने के अधिकार का गलत इस्तेमाल हुआ, तो नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, ये आरोप और आशंकाएं हैं। सरकार की ओर से भ्रष्टाचार के किसी विशेष आरोपी को बचाने का उद्देश्य साबित नहीं हुआ है।
पहले भी बदले जा चुके हैं नियम
केरल में विजिलेंस ब्यूरो के गोपनीय विभागों को आरटीआई कानून से छूट देने का मुद्दा नया नहीं है। साल 2006 में राज्य सरकार ने कई सुरक्षा और खुफिया संगठनों को सूचना के अधिकार कानून से बाहर रखने की अधिसूचना जारी की थी। बाद में विजिलेंस के गोपनीय विभागों की स्थिति को लेकर भी बदलाव हुए।
साल 2022 में इन विभागों को फिर आरटीआई के दायरे में लाया गया था। अब अक्टूबर 2026 की नई अधिसूचना के जरिए उन्हें दोबारा छूट दी गई है। इस फैसले से यह बहस फिर शुरू हो गई है कि भ्रष्टाचार की जांच की गोपनीयता और नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
क्या भ्रष्टाचार से जुड़ी जानकारी भी नहीं मिलेगी?
आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) में एक महत्वपूर्ण अपवाद मौजूद है। इसके अनुसार, छूट प्राप्त संगठनों से संबंधित भ्रष्टाचार के आरोपों और मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतों से जुड़ी जानकारी पर सामान्य छूट लागू नहीं होती। इसका मतलब है कि सरकार की अधिसूचना के बावजूद हर प्रकार की जानकारी को पूरी तरह गोपनीय नहीं रखा जा सकता।
इसके अलावा चल रही जांच को प्रभावित करने वाली जानकारी पर अलग कानूनी प्रतिबंध भी लागू हो सकते हैं। किसी सूचना को उपलब्ध कराने या रोकने का फैसला संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार करना होगा। फिलहाल सरकार अपने निर्णय को जांच की सुरक्षा के लिए जरूरी बता रही है, जबकि आलोचक जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।









