उत्तराखंड के नैनीताल जिले में पहाड़ी क्षेत्रों के किसान कद्दू उत्पादन में आगे हैं। जिले में 329.50 हेक्टेयर भूमि पर सालाना 15,730 क्विंटल कद्दू उगाया जा रहा है। हालांकि, बंदरों से फसल बचाना और उपज को सही कीमत पर बेचना किसानों के लिए मुश्किल बना हुआ है।
हल्द्वानी: उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में खेती करना आसान नहीं है। छोटे खेत, बंदरों से फसल को बचाने की परेशानी और मंडी तक पहुंचने का खर्च किसानों के सामने बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद नैनीताल जिले के पहाड़ी इलाकों में कद्दू की अच्छी पैदावार हो रही है। उद्यान विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, ओखलकांडा और बेतालघाट जैसे पहाड़ी विकासखंड उत्पादन में आगे हैं। हालांकि, अच्छी फसल होने के बाद भी किसानों को उसे बेचने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है।
नैनीताल जिले में हर साल 15,730 क्विंटल कद्दू की पैदावार
नैनीताल जिले में कद्दू की खेती कुल 329.50 हेक्टेयर जमीन पर की जा रही है। उद्यान विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, यहां सालाना 15,730 क्विंटल कद्दू पैदा होता है।
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कद्दू उत्पादन के मामले में पहाड़ी विकासखंड मैदानी क्षेत्रों से आगे हैं। ओखलकांडा, बेतालघाट और भीमताल में इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। वहीं हल्द्वानी विकासखंड में कद्दू की खेती का क्षेत्रफल अपेक्षाकृत कम है।
पहाड़ों में किसान छोटी-छोटी क्यारियां बनाकर कद्दू उगाते हैं। मैदानी क्षेत्रों में खेती का तरीका कुछ अलग है। यहां कई किसान बांस के सहारे जाल बनाते हैं, जिन पर कद्दू की बेलें चढ़ाई जाती हैं।
ओखलकांडा में सबसे ज्यादा कद्दू, बेतालघाट दूसरे स्थान पर
जिले में ओखलकांडा कद्दू उत्पादन के मामले में पहले स्थान पर है। यहां 60 हेक्टेयर जमीन से सालाना 3,000 क्विंटल कद्दू पैदा होता है।
बेतालघाट में 61 हेक्टेयर भूमि पर कद्दू की खेती होती है, जिससे 2,850 क्विंटल उत्पादन मिलता है। भीमताल में 51 हेक्टेयर क्षेत्रफल से 2,450 क्विंटल कद्दू पैदा होता है।
रामनगर में 37 हेक्टेयर में 1,750 क्विंटल, धारी में 32 हेक्टेयर में 1,520 क्विंटल और रामगढ़ में 31.50 हेक्टेयर भूमि से 1,475 क्विंटल उत्पादन दर्ज किया गया है।
कोटाबाग में 31 हेक्टेयर से 1,400 क्विंटल कद्दू की पैदावार होती है। वहीं हल्द्वानी में सबसे कम 26 हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है और यहां 1,285 क्विंटल उत्पादन मिलता है।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि कुल उत्पादन के मामले में पहाड़ी विकासखंड आगे हैं, हालांकि प्रति हेक्टेयर पैदावार की तस्वीर अलग हो सकती है।
मंडी तक कद्दू पहुंचाने में रोज खर्च हो जाते हैं 300 रुपये
हल्द्वानी के गौलापार स्थित कुंवरपुर गांव में रहने वाले किसान रजनीश मौर्य वर्ष 2012 से कद्दू की खेती कर रहे हैं।
उनका कहना है कि फसल तैयार होने के बाद उसे बाजार पहुंचाना भी एक बड़ा काम है। सब्जी मंडी आने-जाने में रोज करीब 200 से 300 रुपये खर्च हो जाते हैं।
छोटे किसानों के लिए यह खर्च काफी मायने रखता है। खासकर तब, जब मंडी में उपज का भाव उम्मीद के मुताबिक न मिले।
रजनीश मौर्य का मानना है कि किसानों को कद्दू बेचने के लिए बेहतर बाजार और उचित दाम मिलने चाहिए। इससे दूसरे किसान भी इसकी खेती करने के लिए आगे आ सकते हैं।
देवीधुरा और खन्स्यू के पहाड़ी कद्दू की अलग पहचान
चंपावत के देवीधुरा और नैनीताल के खन्स्यू क्षेत्र में उगाया जाने वाला पहाड़ी कद्दू हल्द्वानी मंडी में अपनी अलग पहचान रखता है।
मंडी कारोबारी आनंद जोशी के मुताबिक, इन इलाकों से पहाड़ी कद्दू की आवक सीमित रहती है। दो से तीन महीने के दौरान करीब ढाई से पांच क्विंटल कद्दू ही मंडी पहुंचता है।
इस कद्दू को मुख्य रूप से फुटकर सब्जी विक्रेता खरीदते हैं। सामान्य दिनों में इसकी मांग कम रहती है, लेकिन कुछ विशेष आयोजनों के दौरान खरीदारी बढ़ जाती है।
मंडी में सीमित आवक के कारण पहाड़ी कद्दू की बिक्री दूसरी सामान्य सब्जियों की तरह नियमित नहीं हो पाती।
उत्तर प्रदेश से रोज आता है 200 किलो हाइब्रिड कद्दू
हल्द्वानी मंडी में पहाड़ी कद्दू के अलावा उत्तर प्रदेश से भी हाइब्रिड कद्दू की आपूर्ति होती है।
आलू फल आढ़ती के अध्यक्ष कैलाश जोशी ने बताया कि उत्तर प्रदेश से प्रतिदिन करीब 200 किलो हाइब्रिड कद्दू मंडी पहुंचता है। हालांकि, अन्य सब्जियों की तुलना में इसकी मांग कम रहती है।
मंडी में स्थानीय और बाहर से आने वाले कद्दू की उपलब्धता होने के बावजूद किसानों के लिए सही खरीदार मिलना जरूरी है।
कद्दू का मंडी भाव आवक और मांग के अनुसार बदलता रहता है। किसान ताजा कीमतों की जानकारी सरकारी मंडी भाव पोर्टल से भी ले सकते हैं।
बंदरों से फसल बचाना पहाड़ी किसानों की बड़ी परेशानी
पहाड़ों में कद्दू की खेती करने वाले किसानों को बंदरों से भी फसल बचानी पड़ती है। कई बार बंदर खेतों में घुसकर तैयार सब्जियों को नुकसान पहुंचाते हैं।
किसानों के लिए खेतों की लगातार निगरानी करना आसान नहीं होता। खेती के साथ उन्हें अपनी उपज को मंडी तक पहुंचाने की व्यवस्था भी खुद करनी पड़ती है।
ऐसे में फसल अच्छी होने के बावजूद बाजार तक पहुंचाने में लगने वाला समय और खर्च उनकी कमाई को प्रभावित कर सकता है।
उद्यान विभाग किसानों को दे रहा मुफ्त बीज
नैनीताल की मुख्य उद्यान अधिकारी प्रेमा राना के मुताबिक, किसानों को कद्दू की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। विभाग की ओर से किसानों को निशुल्क बीज के पैकेट दिए जाते हैं।
ज्यादातर किसानों तक बीज पहुंचाने का काम विभागीय शिविरों के माध्यम से होता है। पहाड़ों में कई किसान दूसरी फसलों के साथ कद्दू भी उगाते हैं।
हालांकि, खेती का क्षेत्रफल बढ़ाने के साथ किसानों को उपज बेचने की बेहतर सुविधा मिलना भी जरूरी है। मंडी तक परिवहन खर्च कम होने और अच्छे दाम मिलने से उनकी आमदनी में सुधार हो सकता है।










