APK फाइल भेजकर बैंक-गैस ग्राहकों को ठगते थे जामताड़ा के साइबर अपराधी, 4 गिरफ्तार

जामताड़ा में फर्जी APK फाइल भेजकर बैंक और गैस उपभोक्ताओं को ठगने के आरोप में चार लोग गिरफ्तार हुए। पुलिस ने 13 मोबाइल, 13 सिम और 2.20 लाख रुपये बरामद किए।
APK फाइल भेजकर बैंक-गैस ग्राहकों को ठगते थे जामताड़ा के साइबर अपराधी, 4 गिरफ्तार
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झारखंड के जामताड़ा में साइबर अपराध के खिलाफ पुलिस ने एक बार फिर बड़ी कार्रवाई की है। साइबर थाना पुलिस ने जिले के दो अलग-अलग स्थानों पर छापेमारी कर चार लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, पकड़े गए आरोपी मोबाइल पर फर्जी APK फाइल भेजकर बैंक और गैस उपभोक्ताओं को निशाना बनाते थे। आरोप है कि उपभोक्ताओं को बिल अपडेट या दूसरी जरूरी सेवा के नाम पर मोबाइल में APK फाइल डाउनलोड और इंस्टॉल करने के लिए कहा जाता था। फाइल इंस्टॉल होने के बाद मोबाइल में मौजूद गोपनीय जानकारी तक पहुंच हासिल कर उसका इस्तेमाल साइबर ठगी के लिए किया जाता था। पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों के पास से 13 मोबाइल फोन, 13 सिम कार्ड, आठ एटीएम कार्ड, एक चेकबुक और 2.20 लाख रुपये नकद बरामद किए हैं।

जामताड़ा पुलिस अधीक्षक शंभू कुमार सिंह ने शनिवार को अपने कार्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूरी कार्रवाई की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि साइबर अपराध डीएसपी अमित कुमार के नेतृत्व में टीम गठित की गई थी। इसी टीम ने जिले के करमाटांड़ और जामताड़ा थाना क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर छापेमारी की। पहली कार्रवाई करमाटांड़ थाना क्षेत्र के दुधानी गांव में की गई, जहां मनीष कुमार मंडल के घर पर छापेमारी के दौरान एक आरोपी को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद पुलिस टीम ने जामताड़ा थाना क्षेत्र के सोनबाद गांव में सिद्धार्थ दत्त के घर पर कार्रवाई की। यहां से तीन लोगों को पकड़ा गया।

पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान नारायणपुर थाना क्षेत्र के लटैया गांव निवासी 22 वर्षीय विकास मंडल, सोनबाद निवासी 20 वर्षीय देव दत्त, 19 वर्षीय जयदेव साहनी और 34 वर्षीय सिद्धार्थ दत्त के रूप में हुई है। पुलिस अब इन सभी से पूछताछ कर यह पता लगाने में जुटी है कि कथित साइबर ठगी का नेटवर्क किस तरह संचालित किया जा रहा था और इसके पीछे कितने अन्य लोग जुड़े हुए हैं। गिरफ्तार आरोपियों के मोबाइल फोन और सिम कार्ड भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, क्योंकि इन्हीं डिजिटल उपकरणों के जरिए संभावित संपर्क, कॉल, मैसेज और अन्य गतिविधियों की जानकारी सामने आ सकती है।

जामताड़ा पुलिस के मुताबिक आरोपियों का तरीका काफी हद तक फर्जी APK फाइल पर आधारित था। APK यानी Android Package Kit ऐसी फाइल होती है जिसका इस्तेमाल एंड्रॉयड डिवाइस पर एप्लिकेशन इंस्टॉल करने के लिए किया जाता है। आम तौर पर मोबाइल उपयोगकर्ता किसी भरोसेमंद आधिकारिक ऐप स्टोर से एप डाउनलोड करते हैं, लेकिन साइबर ठग कई बार किसी कंपनी, बैंक, गैस एजेंसी या सरकारी सेवा के नाम का इस्तेमाल करके सीधे मोबाइल पर APK फाइल या उसका लिंक भेजते हैं। इस मामले में भी पुलिस का आरोप है कि उपभोक्ताओं को किसी सेवा या बिल को अपडेट करने का बहाना बनाकर फर्जी फाइल इंस्टॉल कराई जाती थी।

पुलिस के अनुसार आरोपी हरियाणा सिटी और अडानी गैस के उपभोक्ताओं को बिल अपडेट कराने के नाम पर निशाना बनाते थे। उपभोक्ता को यह भरोसा दिलाया जाता था कि उसके गैस कनेक्शन या बिल से जुड़ी कोई जानकारी अपडेट करनी है। इसी बहाने उसके मोबाइल पर फर्जी APK फाइल भेजी जाती थी। आरोप है कि जैसे ही पीड़ित व्यक्ति उस फाइल को अपने मोबाइल में इंस्टॉल करता था, उसके फोन की गोपनीय जानकारी तक पहुंच हासिल करने की कोशिश की जाती थी। इसके बाद बैंकिंग या अन्य संवेदनशील जानकारी का इस्तेमाल कथित तौर पर आर्थिक धोखाधड़ी के लिए किया जाता था।

इसी तरह पुलिस ने बताया कि यूको बैंक समेत अन्य बैंकों के ग्राहकों को भी इस कथित नेटवर्क द्वारा निशाना बनाया जाता था। बैंक ग्राहक को किसी अपडेट, केवाईसी या अन्य बैंकिंग प्रक्रिया का बहाना बनाकर APK फाइल डाउनलोड करने के लिए प्रेरित किया जाता था। मोबाइल में ऐसी संदिग्ध फाइल इंस्टॉल होने के बाद साइबर अपराधी संवेदनशील जानकारी हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। पुलिस का कहना है कि गिरफ्तार आरोपियों के पास से बरामद मोबाइल और सिम कार्ड की जांच के बाद इस पूरे तरीके और इससे जुड़े अन्य मामलों की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।

इस कार्रवाई में बरामद सामान भी पुलिस जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पुलिस ने 13 मोबाइल फोन और 13 सिम कार्ड जब्त किए हैं। इसके अलावा आठ एटीएम कार्ड, एक चेकबुक और 2.20 लाख रुपये नकद बरामद किए गए हैं। इतनी संख्या में मोबाइल और सिम कार्ड मिलने के बाद पुलिस यह जांच कर रही है कि इनका इस्तेमाल किन-किन नंबरों से संपर्क करने और कथित ठगी की गतिविधियों में किया जाता था। एटीएम कार्ड और चेकबुक की भी जांच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कथित साइबर ठगी से जुड़े पैसों के लेनदेन में इनका कोई इस्तेमाल हुआ था या नहीं।

पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों का कथित साइबर अपराध नेटवर्क केवल जामताड़ा तक सीमित नहीं था। उनका कार्यक्षेत्र देश के अलग-अलग राज्यों तक फैला होने की बात सामने आई है। इसका मतलब यह है कि जामताड़ा में बैठकर दूसरे राज्यों के उपभोक्ताओं को फोन, मैसेज या डिजिटल माध्यम से निशाना बनाए जाने की आशंका है। पुलिस अब बरामद मोबाइल और सिम कार्ड के तकनीकी विश्लेषण के जरिए उन राज्यों और लोगों की जानकारी जुटाने की कोशिश करेगी, जहां इस नेटवर्क का संपर्क रहा हो सकता है।

जामताड़ा लंबे समय से साइबर अपराध से जुड़े मामलों के कारण चर्चा में रहा है। हालांकि हर मामले में आरोपी अलग-अलग हो सकते हैं और किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप साबित होना अदालत की प्रक्रिया पर निर्भर करता है, लेकिन पुलिस की ताजा कार्रवाई बताती है कि फर्जी APK फाइल का इस्तेमाल साइबर ठगी के एक तरीके के रूप में किया जा रहा है। इससे पहले भी अलग-अलग राज्यों की पुलिस ने जामताड़ा और आसपास के इलाकों से जुड़े ऐसे मामलों में कार्रवाई की है, जिनमें बैंक अधिकारी, कूरियर कंपनी, गैस सेवा या सरकारी योजना के नाम पर फर्जी ऐप इंस्टॉल करवाने की बात सामने आई है।

फर्जी APK फाइल से होने वाली ठगी में सबसे बड़ा खतरा यह होता है कि मोबाइल उपयोगकर्ता खुद अपने हाथ से संदिग्ध एप को इंस्टॉल कर देता है। साइबर अपराधी अक्सर फोन करने वाले व्यक्ति को किसी कंपनी का कर्मचारी या सेवा प्रतिनिधि बताकर भरोसा पैदा करने की कोशिश करते हैं। इसके बाद वह किसी समस्या के समाधान, बिल अपडेट, केवाईसी या सर्विस रिन्यूअल का बहाना बनाकर APK डाउनलोड करने के लिए कह सकता है। यदि उपभोक्ता बिना जांच किए ऐसी फाइल इंस्टॉल कर लेता है तो उसके मोबाइल की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसलिए पुलिस लगातार लोगों को अनजान स्रोतों से आए ऐप या फाइल को डाउनलोड नहीं करने की सलाह देती रही है।

जामताड़ा के इस मामले में गैस उपभोक्ताओं को बिल अपडेट करने का बहाना बनाए जाने की बात सामने आई है। ऐसे मामलों में ठग उपभोक्ता को यह महसूस कराने की कोशिश कर सकते हैं कि यदि उसने तुरंत प्रक्रिया पूरी नहीं की तो गैस सेवा या कनेक्शन से जुड़ी कोई समस्या हो जाएगी। इसी तरह बैंक ग्राहकों को खाते से जुड़ी किसी जरूरी प्रक्रिया का हवाला दिया जा सकता है। इस तरह की जल्दबाजी पैदा करना साइबर ठगी के मामलों में आम तरीका माना जाता है। किसी भी ग्राहक को किसी अज्ञात व्यक्ति के कहने पर मोबाइल में APK फाइल इंस्टॉल करने से पहले संबंधित कंपनी या बैंक के आधिकारिक माध्यम से जानकारी की पुष्टि करनी चाहिए।

पुलिस की ताजा कार्रवाई में साइबर अपराध थाना कांड संख्या 59/26, दिनांक 19 सितंबर 2026 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। मामले में संबंधित कानूनी धाराओं के तहत आगे की कार्रवाई की जा रही है। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पुलिस बरामद डिजिटल उपकरणों की जांच के साथ-साथ गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर रही है। इस जांच के दौरान यह पता लगाने की कोशिश होगी कि कथित ठगी से कितने लोग प्रभावित हुए, कितनी रकम का लेनदेन हुआ और नेटवर्क में अन्य कौन-कौन लोग शामिल हैं।

छापेमारी दल में साइबर अपराध थाना प्रभारी सह पुलिस निरीक्षक राजेश मंडल, पुलिस निरीक्षक अनिल अभिषेक, पुलिस निरीक्षक अमित कुमार तथा रिजर्व गार्ड के जवान शामिल रहे। पुलिस टीम ने अलग-अलग स्थानों पर कार्रवाई कर आरोपियों को गिरफ्तार किया। अधिकारियों के मुताबिक कार्रवाई के बाद अब जांच का अगला चरण डिजिटल साक्ष्यों को खंगालना है। मोबाइल फोन, सिम कार्ड और अन्य बरामद सामान से मिलने वाली जानकारी के आधार पर कथित नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने की कोशिश की जाएगी।

इस मामले की जांच में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि बरामद आठ एटीएम कार्ड और चेकबुक किन लोगों के नाम पर हैं और उनका कथित साइबर गतिविधियों से क्या संबंध है। इसी तरह 13 सिम कार्ड किन दस्तावेजों के आधार पर जारी हुए, उनका इस्तेमाल किन मोबाइल उपकरणों में किया गया और किन राज्यों के नंबरों से संपर्क हुआ, इसकी तकनीकी जांच की जा सकती है। यदि पुलिस को अलग-अलग मामलों से जुड़े डिजिटल साक्ष्य मिलते हैं तो जांच का दायरा बढ़ सकता है।

साइबर अपराध के मामलों में मोबाइल फोन की भूमिका लगातार बढ़ी है। पहले जहां ठगी के लिए फोन कॉल या मैसेज का इस्तेमाल प्रमुखता से किया जाता था, वहीं अब अपराधी लोगों को किसी लिंक या फाइल के जरिए अपने मोबाइल में सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करने के लिए भी तैयार करते हैं। फर्जी APK इसी तरीके का एक रूप है। एक बार संदिग्ध एप मोबाइल में इंस्टॉल हो जाने के बाद अपराधी डिवाइस की अनुमतियों और उपलब्ध जानकारी का गलत इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं। यही कारण है कि मोबाइल में किसी भी बाहरी स्रोत से एप इंस्टॉल करने से पहले उसकी विश्वसनीयता जांचना बेहद जरूरी है।

जामताड़ा पुलिस की इस कार्रवाई के बाद अब जांच का केंद्र गिरफ्तार चारों आरोपियों से जुड़े डिजिटल नेटवर्क पर रहेगा। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि कथित तौर पर तैयार किए गए APK किसने उपलब्ध कराए, उपभोक्ताओं के मोबाइल नंबर और बैंक या गैस से जुड़ी जानकारी कहां से प्राप्त की जाती थी, ठगी के बाद रकम किस खाते में जाती थी और इस पूरी प्रक्रिया में कौन-कौन लोग अलग-अलग भूमिका निभाते थे। अभी इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे।

इस पूरे मामले में आम मोबाइल और बैंक उपभोक्ताओं के लिए भी सावधानी जरूरी है। किसी बैंक, गैस कंपनी या दूसरी सेवा के नाम पर यदि कोई अनजान व्यक्ति मोबाइल पर APK फाइल भेजकर उसे इंस्टॉल करने के लिए कहता है तो उसे सीधे इंस्टॉल नहीं करना चाहिए। किसी भी सेवा अपडेट के लिए संबंधित कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट, ऐप या ग्राहक सेवा नंबर से पुष्टि करना अधिक सुरक्षित तरीका है। अनजान फाइल, संदिग्ध लिंक या अनधिकृत ऐप को इंस्टॉल करने से मोबाइल की निजी और वित्तीय जानकारी जोखिम में पड़ सकती है।

फिलहाल जामताड़ा पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और उनके कब्जे से 13 मोबाइल, 13 सिम, आठ एटीएम कार्ड, एक चेकबुक और 2.20 लाख रुपये नकद बरामद किए हैं। पुलिस का कहना है कि कथित नेटवर्क का दायरा देश के विभिन्न राज्यों तक हो सकता है और जांच जारी है। अब आगे की कार्रवाई बरामद डिजिटल साक्ष्यों और पूछताछ से सामने आने वाली जानकारी के आधार पर होगी। आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की अंतिम कानूनी स्थिति जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही तय होगी।

 

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