झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren आगामी राजनीतिक रणनीति के तहत आदिवासी, दलित और मुस्लिम (ADM) सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
रांची: झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर बड़ा सियासी संदेश सामने आया है। मुख्यमंत्री Hemant Soren ने अपने परिवार से आगे बढ़कर वरिष्ठ दलित नेता Baijnath Ram को राज्यसभा भेजकर राजनीतिक समीकरणों में नया अध्याय जोड़ दिया है। इस फैसले को राज्य की जातीय और सामाजिक राजनीति के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम केवल राज्यसभा चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे 2029 के आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए एक दीर्घकालिक रणनीति भी दिखाई देती है।
‘ADM’ समीकरण क्या है?
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के रणनीतिक हलकों में जिस नए सामाजिक-राजनीतिक समीकरण की चर्चा है, उसे ‘ADM’ कहा जा रहा है। इसका अर्थ है:
- A – आदिवासी (Adivasi)
- D – दलित (Dalit)
- M – मुस्लिम (Muslim)
यह त्रिकोणीय सामाजिक गठजोड़ राज्य की लगभग 50 प्रतिशत से अधिक आबादी को राजनीतिक रूप से प्रभावित करता है। इसी आधार पर माना जा रहा है कि यह रणनीति भविष्य के चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
बैजनाथ राम को राज्यसभा क्यों?
JMM ने इस बार परिवारवाद से अलग जाकर बैजनाथ राम को उम्मीदवार बनाकर एक स्पष्ट राजनीतिक संकेत दिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह फैसला संगठन को व्यापक सामाजिक आधार देने और पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है। बैजनाथ राम, जो पहले विभिन्न राजनीतिक भूमिकाओं में रह चुके हैं, दलित समाज में अपनी पहचान रखते हैं। उनकी राज्यसभा में एंट्री को दलित प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने के रूप में देखा जा रहा है।
झारखंड की राजनीति में आदिवासी समुदाय हमेशा से केंद्रीय भूमिका में रहा है। राज्य की लगभग 26 प्रतिशत आबादी आदिवासी है, और राजनीतिक समीकरण इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमते हैं। JMM का पारंपरिक आधार भी आदिवासी समाज में मजबूत रहा है, और पार्टी इस समर्थन को और मजबूत करने की दिशा में लगातार काम करती रही है।
दलित वोट बैंक पर रणनीतिक फोकस
राज्य में दलित आबादी लगभग 11 प्रतिशत के आसपास है। अब तक यह वर्ग विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रभाव में बंटा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बैजनाथ राम को राज्यसभा भेजना इस वोट बैंक को एकजुट करने की रणनीति का हिस्सा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में दलित वोटों को एक दिशा में लाने का प्रयास हो सकता है।
झारखंड में मुस्लिम समुदाय की आबादी लगभग 14–15 प्रतिशत मानी जाती है, और कई विधानसभा क्षेत्रों में यह निर्णायक भूमिका निभाती है। ADM समीकरण में मुस्लिम समुदाय को शामिल करना JMM की समावेशी रणनीति को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तीनों समूह एक साथ आते हैं, तो यह राज्य की राजनीति में निर्णायक बहुमत का आधार बन सकता है।
‘2029 रणनीति’ पर नजर
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यह पूरा कदम केवल तत्कालीन राज्यसभा चुनाव तक सीमित नहीं है। इसे 2029 के चुनावों के लिए एक “टेस्ट रन” के रूप में भी देखा जा रहा है। JMM के रणनीतिकार मानते हैं कि सामाजिक समीकरणों को मजबूत करके पार्टी अपने चुनावी प्रदर्शन को और स्थिर बना सकती है।हालांकि इस फैसले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया मिली-जुली रही है।
सत्ताधारी पक्ष इसे “सभी वर्गों के प्रतिनिधित्व” का कदम बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे रणनीतिक जातीय समीकरण के रूप में देख रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि इस तरह की राजनीतिक रणनीतियां चुनावी लाभ के लिए सामाजिक समीकरणों को साधने का प्रयास हो सकती हैं।











