‘जमानत नियम, जेल अपवाद’ सिद्धांत पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संकेत; उमर खालिद-शरजील इमाम मामले पर फिर उठे सवाल

Supreme Court of India ने ‘जमानत नियम, जेल अपवाद’ सिद्धांत पर अहम संकेत दिए हैं, जिससे लंबित मामलों में नई बहस शुरू हो गई है। Umar Khalid और Sharjeel Imam के

Supreme Court of India ने सोमवार (18 मई, 2026) को अपने एक पुराने फैसले पर नाराजगी जताई, जिसमें 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में आरोपियों को जमानत देने से इनकार किया गया था।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए देश की जमानत प्रणाली और लंबे समय तक विचाराधीन कैद (undertrial detention) पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय व्यवस्था में मूल सिद्धांत “जमानत नियम है और जेल अपवाद” है, और इसे कमजोर नहीं किया जा सकता—भले ही मामला कठोर आतंकवाद-रोधी कानूनों जैसे UAPA के तहत ही क्यों न हो।

यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब 2020 दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न मिलने के फैसले पर फिर से बहस तेज हो गई है।

“बेल नियम है, जेल अपवाद” — सुप्रीम कोर्ट की दोहराई गई सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 22 से यह सिद्धांत निकलता है कि किसी भी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता, जब तक उसका मुकदमा तय समय में पूरा न हो। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक ट्रायल न होना और आरोपी के जल्द रिहा होने की संभावना न होना जमानत का मजबूत आधार बनता है, यहां तक कि UAPA जैसे मामलों में भी।

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के सैयद इफ्तेखार अंद्राबी को जमानत देते हुए कहा कि उनके मामले में लंबी हिरासत और ट्रायल में देरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि पहले उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने वाली दो जजों की बेंच ने समान न्यायिक सिद्धांतों का सही तरीके से पालन नहीं किया।

“बड़ी बेंच का फैसला बाध्यकारी है” — न्यायिक अनुशासन पर जोर

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच द्वारा तय किया गया कानून सभी निचली अदालतों और छोटी बेंचों पर बाध्यकारी होता है। अदालत ने कहा कि न्यायिक अनुशासन के तहत यह जरूरी है कि, छोटी बेंच बड़ी बेंच के फैसले को नजरअंदाज नहीं कर सकती किसी भी संदेह की स्थिति में मामला बड़ी बेंच को भेजा जाना चाहिए।

पूर्व के निर्णयों को कमजोर या सीमित नहीं किया जा सकता, के.ए. नजीब केस का हवाला, लंबे ट्रायल पर चिंता, कोर्ट ने 2021 के के.ए. नजीब बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यह एक बाध्यकारी मिसाल (binding precedent) है। इस फैसले में यह स्थापित किया गया था कि यदि किसी आरोपी का ट्रायल लंबे समय तक नहीं पूरा होता और उसके जल्द छूटने की संभावना नहीं है, तो उसे जमानत दी जा सकती है—even under stringent laws like UAPA.

पहले के फैसलों पर असहमति

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ पुराने मामलों में इस सिद्धांत की गलत व्याख्या की गई। कोर्ट ने विशेष रूप से यह टिप्पणी की कि, गुलफिशा फातिमा केस में के.ए. नजीब फैसले का सही पालन नहीं हुआ. 2024 के गुरविंदर सिंह केस में भी बड़ी बेंच के सिद्धांतों को ठीक से लागू नहीं किया गया. UAPA मामलों में “अनिश्चितकालीन प्री-ट्रायल हिरासत” को सही ठहराने के लिए पुराने फैसलों का गलत उपयोग नहीं किया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि UAPA मामलों में अक्सर उद्धृत किए जाने वाले Watali फैसले का इस्तेमाल केवल लंबी हिरासत को उचित ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता।

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