कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोपों के बीच पूर्व आईपीएस अधिकारी Kiran Bedi की प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि छात्र आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों की स्थिति सीधे सुरक्षा बलों के साथ टकराव तक क्यों पहुंच जाती है।
नई दिल्ली: पूर्व भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी और देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी ने हाल ही में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सशस्त्र बलों (Armed Forces) के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलनों और सार्वजनिक प्रदर्शनों से निपटने के लिए हर बार सीधे सशस्त्र बलों या बल प्रयोग वाली पुलिस व्यवस्था का सहारा लेना एक पुरानी और अप्रभावी सोच को दर्शाता है।
किरण बेदी की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब हाल के कुछ प्रदर्शनों के दौरान भीड़ नियंत्रण के तरीकों और सुरक्षा बलों की भूमिका को लेकर बहस तेज हो गई है। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को कानून-व्यवस्था संभालने के लिए औपनिवेशिक दौर से चली आ रही व्यवस्थाओं की समीक्षा करनी चाहिए और अधिक आधुनिक तथा नागरिक-केंद्रित मॉडल अपनाने चाहिए।
“ब्रिटिश दौर की सोच से बाहर निकलने की जरूरत”
किरण बेदी का मानना है कि भारत में भीड़ नियंत्रण और विरोध प्रदर्शनों को संभालने का मौजूदा ढांचा काफी हद तक ब्रिटिश शासनकाल की प्रशासनिक सोच पर आधारित है। उनके अनुसार, किसी भी छात्र आंदोलन या सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान सीधे सशस्त्र बलों को सामने लाना उचित रणनीति नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक समाज में विरोध प्रदर्शन एक सामान्य प्रक्रिया है और ऐसे मामलों में प्राथमिक स्तर पर संवाद, मध्यस्थता और नागरिक सुरक्षा तंत्र का उपयोग किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि बल प्रयोग को हमेशा अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि शुरुआती प्रतिक्रिया के रूप में।
सिविल डिफेंस को पहली पंक्ति में रखने का सुझाव

पूर्व आईपीएस अधिकारी ने भीड़ नियंत्रण के लिए एक वैकल्पिक मॉडल का सुझाव दिया। उनके अनुसार, किसी भी विरोध प्रदर्शन की स्थिति में सबसे पहले प्रशिक्षित सिविल डिफेंस कर्मियों को तैनात किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सिविल डिफेंस के स्वयंसेवक और प्रशिक्षित युवा बिना हथियारों के भीड़ को नियंत्रित करने, संवाद स्थापित करने और तनाव कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इससे प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच सीधे टकराव की संभावना कम हो सकती है। बेदी के अनुसार, इस तरह का मॉडल कई लोकतांत्रिक देशों में सफलतापूर्वक अपनाया गया है, जहां प्राथमिकता संवाद और शांतिपूर्ण प्रबंधन को दी जाती है।
महिला पुलिस को दूसरी सुरक्षा पंक्ति बनाने की वकालत
किरण बेदी ने सुझाव दिया कि यदि स्थिति तनावपूर्ण हो जाती है, तो दूसरी पंक्ति में महिला पुलिसकर्मियों को तैनात किया जा सकता है। उनका कहना है कि महिला पुलिसकर्मियों की मौजूदगी कई बार तनावपूर्ण परिस्थितियों को शांत करने में मदद करती है। उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक सुरक्षा उपकरण, बॉडी आर्मर और सुरक्षात्मक हेलमेट जैसे संसाधनों का उपयोग करके पुलिस बल की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है, जबकि अनावश्यक बल प्रयोग से बचा जा सकता है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने का उद्देश्य केवल भीड़ को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करना भी है।
सशस्त्र पुलिस को अंतिम विकल्प बताया
किरण बेदी के अनुसार, यदि किसी प्रदर्शन के दौरान स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो जाए और सार्वजनिक संपत्ति या लोगों की सुरक्षा को खतरा पैदा हो, तभी सशस्त्र पुलिस या विशेष बलों की तैनाती की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में भी तकनीक का अधिक उपयोग किया जाना चाहिए। ड्रोन निगरानी, सीसीटीवी कैमरे और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम की मदद से यह स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है कि हिंसा या तोड़फोड़ के लिए कौन जिम्मेदार है। उनका मानना है कि तकनीक आधारित निगरानी से जवाबदेही बढ़ती है और निर्दोष लोगों के प्रभावित होने की संभावना कम होती है।











