मुस्लिम समुदाय ने शुरू की थी जन्माष्टमी, अब केवल हिंदू करेंगे आयोजन; कोलकाता में 58 साल पुरानी परंपरा में बड़ा बदलाव

कोलकाता के मोमिनपुर में करीब छह दशक से चली आ रही जन्माष्टमी परंपरा में बदलाव हुआ है। इस बार आयोजन समिति में मुस्लिम सदस्यों को शामिल नहीं किया गया।
मुस्लिम समुदाय ने शुरू की थी जन्माष्टमी, अब केवल हिंदू करेंगे आयोजन; कोलकाता में 58 साल पुरानी परंपरा में बड़ा बदलाव
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कोलकाता के मोमिनपुर इलाके में करीब छह दशक से चली आ रही जन्माष्टमी की एक अनोखी परंपरा इस साल बदल गई है। जिस आयोजन की शुरुआत मुस्लिम समुदाय से जुड़े एक सामाजिक कार्यकर्ता ने की थी और जिसमें वर्षों तक हिंदू-मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर जन्माष्टमी मनाते रहे, इस बार उसका संचालन केवल हिंदू समुदाय के लोगों द्वारा किया जाएगा। आयोजन समिति से मुस्लिम सदस्यों को बाहर रखने की जानकारी सामने आने के बाद यह मामला चर्चा में आ गया है। यह आयोजन कोलकाता के पोर्ट क्षेत्र में भुकैलाश रोड और हुसैन शाह रोड के चौराहे के पास होता है और इस वर्ष इसका 58वां आयोजन बताया जा रहा है।

स्थानीय लोगों और आयोजन से जुड़े पुराने सदस्यों के अनुसार, इस जन्माष्टमी आयोजन की शुरुआत करीब छह दशक पहले मोहम्मद काशिम नाम के एक मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ता ने की थी। समय के साथ यह आयोजन कुछ कमजोर पड़ा, लेकिन 2011 के बाद मुस्लिम युवाओं के एक समूह ने इसे दोबारा सक्रिय किया। इसके बाद कई वर्षों तक यहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर जन्माष्टमी का आयोजन करते रहे। आयोजन समिति में करीब 20 सदस्य होते थे, जिनमें लगभग आधे सदस्य मुस्लिम समुदाय से थे। पूजा-पाठ से लेकर प्रसाद वितरण और आयोजन की दूसरी व्यवस्थाओं में दोनों समुदायों की भागीदारी रहती थी।

पुराने आयोजकों का कहना है कि पिछले वर्षों में जन्माष्टमी का यह आयोजन स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल के तौर पर देखा जाता था। मुस्लिम समुदाय के लोग आयोजन की व्यवस्थाओं में हिस्सा लेते थे और हिंदू श्रद्धालुओं के साथ मिलकर धार्मिक कार्यक्रम को आगे बढ़ाते थे। आयोजन के दौरान प्रसाद का वितरण भी किया जाता था और जन्माष्टमी से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान निर्धारित तरीके से कराए जाते थे। इस वजह से मोमिनपुर का यह आयोजन दूसरे धार्मिक आयोजनों से अलग पहचान रखता था।

लेकिन इस वर्ष आयोजन की व्यवस्था में बड़ा बदलाव हुआ है। आयोजन समिति से जुड़े कुछ लोगों के मुताबिक अब समिति में मुस्लिम सदस्यों को शामिल नहीं किया गया है और जन्माष्टमी कार्यक्रम का संचालन हिंदू समुदाय के लोग ही करेंगे। आयोजन से जुड़े भाजपा के पूर्व उम्मीदवार राकेश सिंह ने भी कहा है कि इस साल कार्यक्रम केवल हिंदुओं द्वारा आयोजित किया जाएगा। उनका तर्क है कि जन्माष्टमी हिंदू धर्म का त्योहार है और धार्मिक आयोजन का संचालन हिंदू समुदाय के लोगों को ही करना चाहिए।

राकेश सिंह के अनुसार, दूसरे धर्मों के लोग जन्माष्टमी के पंडाल में आ सकते हैं, लेकिन धार्मिक गतिविधियों के संचालन की जिम्मेदारी हिंदू समुदाय की होनी चाहिए। उन्होंने इसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा से जोड़कर देखा है। दूसरी ओर, पुराने आयोजन से जुड़े मुस्लिम सदस्यों का कहना है कि वर्षों से वे इस कार्यक्रम में सक्रिय भूमिका निभाते आए हैं और समिति में हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग शामिल रहते थे। इस बार मुस्लिम सदस्यों को समिति से अलग किया जाना उनके लिए एक बड़ा बदलाव है।

इस आयोजन से जुड़े पुराने सदस्य मोहम्मद आलम ने बताया कि 2011 से मुस्लिम युवाओं की भी आयोजन में सक्रिय भूमिका रही थी। उनके अनुसार करीब 20 सदस्यीय समिति में आधे सदस्य मुस्लिम होते थे। सभी लोग मिलकर कार्यक्रम आयोजित करते थे, प्रसाद बांटते थे और जन्माष्टमी के धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा कराने में सहयोग करते थे। इस बार समिति से मुस्लिम चेहरों के हटने को उन्होंने आयोजन की पुरानी व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन बताया है।

कार्यक्रम स्थल पर इस वर्ष तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। रिपोर्टों के अनुसार वहां केसरिया और सफेद रंग का बड़ा पंडाल तैयार किया जा रहा है। पंडाल निर्माण और आयोजन की व्यवस्था को लेकर आयोजकों की ओर से तैयारियां की जा रही हैं। आयोजन स्थल को सजाया जा रहा है और जन्माष्टमी के अवसर पर श्रद्धालुओं के पहुंचने की तैयारी भी की जा रही है।

मोमिनपुर का यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह कोलकाता के उस सामाजिक ताने-बाने से जुड़ा रहा है, जहां अलग-अलग समुदायों के लोग कई धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में एक-दूसरे की भागीदारी देखते रहे हैं। छह दशक के लंबे इतिहास में इस जन्माष्टमी कार्यक्रम का स्वरूप कई बार बदला, लेकिन हिंदू-मुस्लिम सहभागिता इसकी प्रमुख पहचान बनी रही। अब समिति की संरचना में बदलाव के बाद इस पुराने स्वरूप के खत्म होने की चर्चा हो रही है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक इस आयोजन का इतिहास केवल धार्मिक उत्सव तक सीमित नहीं रहा है। यह इलाके के लोगों की सामूहिक भागीदारी का भी हिस्सा था। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने आयोजन की शुरुआत करने में भूमिका निभाई और बाद के वर्षों में हिंदू समुदाय के लोगों के साथ मिलकर इसे आगे बढ़ाया। इसी वजह से यह कार्यक्रम स्थानीय स्तर पर एक अलग पहचान बनाने में सफल रहा। अब जब आयोजन का संचालन केवल हिंदू समुदाय के हाथों में जाने की बात सामने आई है, तो पुराने आयोजकों और स्थानीय लोगों के बीच इसे लेकर अलग-अलग राय भी सामने आ रही है।

यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम बंगाल में धार्मिक आयोजनों और सांस्कृतिक पहचान को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। हाल के दिनों में विश्व हिंदू परिषद की ओर से दुर्गा पूजा समितियों को आयोजन में हिंदू संस्कृति और परंपराओं को प्राथमिकता देने की सलाह दिए जाने की खबरें भी सामने आई थीं। ऐसे माहौल में मोमिनपुर के जन्माष्टमी आयोजन में हुआ बदलाव राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से चर्चा का विषय बन गया है।

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि आयोजन की शुरुआत जिस मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ता से जुड़ी बताई जा रही है, उसी कार्यक्रम में आज मुस्लिम समुदाय की आयोजन समिति में भागीदारी खत्म हो गई है। करीब छह दशक के अंतराल में किसी धार्मिक आयोजन का स्वरूप इस तरह बदलना स्थानीय इतिहास और सामाजिक संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आयोजकों के एक वर्ग का कहना है कि धार्मिक त्योहारों के संचालन का अधिकार उसी समुदाय के पास होना चाहिए, जिसका वह त्योहार है। वहीं पुराने आयोजन से जुड़े लोग इसे वर्षों से चली आ रही साझी भागीदारी के खत्म होने के रूप में देख रहे हैं। यही वजह है कि इस बार मोमिनपुर की जन्माष्टमी सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक बहस का विषय भी बन गई है।

कोलकाता के इस इलाके में जन्माष्टमी के दौरान हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम स्थल पर पहुंचते रहे हैं। इस बार भी आयोजन की तैयारियां जारी हैं और पंडाल तैयार किया जा रहा है। हालांकि आयोजन का संचालन और समिति की संरचना पहले के वर्षों से अलग होगी। कार्यक्रम में दूसरे समुदायों के लोगों के प्रवेश को लेकर भी आयोजकों की ओर से अलग-अलग बातें सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार आयोजन से जुड़े लोगों ने कहा है कि दूसरे धर्मों के लोग पंडाल में आ सकते हैं, लेकिन धार्मिक गतिविधियों का संचालन हिंदू समुदाय करेगा।

जन्माष्टमी 2026 में देशभर में 4 सितंबर को मनाई जाएगी। कोलकाता समेत पश्चिम बंगाल में भी मंदिरों और पूजा पंडालों में इसकी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। ऐसे समय में मोमिनपुर के इस पुराने आयोजन में आया बदलाव खास तौर पर चर्चा में है।

कुल मिलाकर, कोलकाता के मोमिनपुर में करीब छह दशक पुराने जन्माष्टमी आयोजन का स्वरूप इस वर्ष बदल गया है। मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद काशिम से जुड़ी बताई जाने वाली इस परंपरा में लंबे समय तक मुस्लिम और हिंदू समुदाय के लोगों की संयुक्त भागीदारी रही। 2011 के बाद मुस्लिम युवाओं ने भी आयोजन को फिर से सक्रिय करने में भूमिका निभाई और समिति में मुस्लिम सदस्यों की अच्छी-खासी भागीदारी रही। अब 2026 में आयोजन समिति को केवल हिंदू सदस्यों के साथ संचालित करने का फैसला सामने आया है। इस बदलाव ने कोलकाता की पुरानी सांझी संस्कृति, धार्मिक आयोजन और सामुदायिक भागीदारी को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

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