कूनो नेशनल पार्क में चीता परियोजना को प्राथमिकता मिलने के बीच एशियाई शेरों के स्थानांतरण का पुराना प्रोजेक्ट अब भी अधर में है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद शेरों को गिर से कूनो लाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी है।
Kuno National Park: मध्य प्रदेश का कूनो नेशनल पार्क एक बार फिर चर्चा में है। जहां एक ओर अफ्रीका से लाए गए चीते यहां नए आवास में खुद को स्थापित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वर्षों पुरानी एशियाई शेर पुनर्वास योजना अब भी पूरी नहीं हो पाई है। यह मामला वन्यजीव संरक्षण, वैज्ञानिक रणनीति और प्रशासनिक निर्णयों के बीच संतुलन की चुनौती को सामने लाता है।
कूनो को शेरों के लिए क्यों चुना गया था?
कूनो नेशनल पार्क को मूल रूप से एशियाई शेरों के दूसरे सुरक्षित आवास के रूप में विकसित किया गया था। वन्यजीव विशेषज्ञ लंबे समय से यह चिंता जताते रहे हैं कि दुनिया के सभी जंगली एशियाई शेर लगभग एक ही क्षेत्र, गुजरात के गिर वन, में केंद्रित हैं। यदि किसी महामारी, प्राकृतिक आपदा या बड़े संकट की स्थिति पैदा होती है तो पूरी प्रजाति पर खतरा मंडरा सकता है।
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इसी वजह से कूनो को वैकल्पिक आवास के रूप में तैयार किया गया। इसके लिए कई गांवों का पुनर्वास किया गया और वर्षों तक संरक्षण संबंधी तैयारियां की गईं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी क्यों नहीं बढ़ी प्रक्रिया?
वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एशियाई शेरों को कूनो स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। अदालत का मानना था कि वन्यजीव संरक्षण के लिए शेरों का दूसरा निवास क्षेत्र आवश्यक है। हालांकि, इस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी।
बीते वर्षों में प्रशासनिक प्रक्रियाओं, राज्यों के बीच सहमति और विभिन्न तकनीकी पहलुओं के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई। परिणामस्वरूप, कूनो में शेरों के आगमन का इंतजार लगातार लंबा होता गया।
चीता परियोजना ने बदला फोकस
कूनो की पहचान तब बदल गई जब यहां अफ्रीका से चीतों को लाकर बसाने की महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की गई। इस प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा मिली। वर्तमान में पार्क का बड़ा हिस्सा चीतों के संरक्षण, निगरानी और उनके प्रजनन पर केंद्रित है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी संरक्षित क्षेत्र में दो बड़े शिकारी प्रजातियों का प्रबंधन बेहद जटिल कार्य होता है। इसलिए फिलहाल प्राथमिकता चीता परियोजना की सफलता सुनिश्चित करने पर दिखाई दे रही है।
क्या एक साथ रह सकते हैं चीते और शेर?
पारिस्थितिकी के दृष्टिकोण से यह आसान नहीं माना जाता। शेर शीर्ष शिकारी होते हैं और बड़े क्षेत्र पर अपना प्रभाव स्थापित कर लेते हैं। दूसरी ओर, चीते अपेक्षाकृत संवेदनशील शिकारी हैं, जिनके शावकों को शेरों और अन्य बड़े मांसाहारी जीवों से खतरा हो सकता है।
इसी कारण विशेषज्ञों के बीच यह बहस जारी है कि कूनो में दोनों प्रजातियों का दीर्घकालिक सह-अस्तित्व कितना व्यावहारिक होगा। यह सवाल भविष्य की संरक्षण नीतियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आगे क्या हो सकता है?
कूनो नेशनल पार्क आज भारत की सबसे चर्चित वन्यजीव परियोजनाओं में से एक बन चुका है। एक ओर चीता पुनर्वास कार्यक्रम की सफलता पर नजरें टिकी हैं, वहीं दूसरी ओर एशियाई शेरों के दूसरे आवास की आवश्यकता का मुद्दा भी बना हुआ है।
आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि कूनो केवल चीतों का घर बनेगा या फिर कभी यहां एशियाई शेरों की दहाड़ भी सुनाई देगी। फिलहाल यह भारत के वन्यजीव संरक्षण से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण और बहस वाले विषयों में शामिल है।








