लद्दाख के डेमचोक मार्ग से कैलास मानसरोवर यात्रा दोबारा शुरू करने की मांग तेज हो गई है। समर्थकों का दावा है कि यह पारंपरिक रास्ता खुलने पर श्रद्धालु कम समय और कम खर्च में भगवान शिव के धाम तक पहुंच सकेंगे।
जम्मू: कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए लद्दाख के डेमचोक मार्ग को फिर से खोलने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ रही है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास स्थित इस पारंपरिक रास्ते को वर्ष 1962 के बाद बंद कर दिया गया था। अब धार्मिक और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि यह मार्ग बहाल होता है तो श्रद्धालुओं के लिए यात्रा पहले की तुलना में अधिक आसान और किफायती हो सकती है।
डेमचोक मार्ग को फिर से खोलने की उठी मांग
कैलास मानसरोवर यात्रा हिंदू धर्म की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है। वर्तमान में श्रद्धालु मुख्य रूप से उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथू ला मार्ग के जरिए कैलास मानसरोवर पहुंचते हैं। हालांकि अब लद्दाख के डेमचोक क्षेत्र से गुजरने वाले पुराने पारंपरिक मार्ग को फिर से खोलने की मांग तेज हो रही है।
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लद्दाख के सामाजिक और धार्मिक संगठनों का कहना है कि यह मार्ग ऐतिहासिक रूप से कैलास मानसरोवर तक पहुंचने का महत्वपूर्ण रास्ता रहा है। उनका दावा है कि डेमचोक से यात्रा शुरू होने पर श्रद्धालु बहुत कम समय में कैलास क्षेत्र तक पहुंच सकते हैं। यही वजह है कि इस मांग को फिर से राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा रहा है।
सिंधु कुंभ में उठेगा प्रमुख मुद्दा
22 जून से लेह में आयोजित होने जा रहे प्रथम सिंधु कुंभ के दौरान भी इस विषय को प्रमुखता से उठाने की तैयारी है। आयोजकों के अनुसार श्रद्धालु और विभिन्न सामाजिक संगठन केंद्र सरकार से आग्रह करेंगे कि वह इस मार्ग को बहाल करने के लिए आवश्यक कूटनीतिक प्रयास करे।
आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि श्रद्धालु सांकेतिक रूप से तिरंगा लेकर मार्च करेंगे और सरकार से इस ऐतिहासिक मार्ग को दोबारा खोलने की मांग करेंगे। उनका मानना है कि इससे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और लद्दाख क्षेत्र के आर्थिक विकास को भी नई गति मिल सकती है।
यात्रा समय और खर्च में आ सकती है कमी
वर्तमान में कैलास मानसरोवर यात्रा में श्रद्धालुओं को कई दिन लग जाते हैं। सड़क मार्ग और अन्य व्यवस्थाओं के आधार पर यात्रा अवधि एक से दो सप्ताह तक पहुंच सकती है। वहीं यात्रा का खर्च भी लाखों रुपये तक पहुंच जाता है।
डेमचोक मार्ग के समर्थकों का दावा है कि यदि यह रास्ता खुलता है तो यात्रा का समय काफी कम हो सकता है। इससे श्रद्धालुओं पर आर्थिक बोझ भी घटेगा। साथ ही अधिक संख्या में लोग कैलास मानसरोवर यात्रा का लाभ उठा सकेंगे। हालांकि यह सब संबंधित देशों की सहमति और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर निर्भर करेगा।
ऐतिहासिक महत्व भी रखता है यह मार्ग
डेमचोक का यह रास्ता केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार डोगरा सेना के प्रसिद्ध सेनापति जनरल जोरावर सिंह ने भी तिब्बत की ओर बढ़ने के लिए इसी क्षेत्र का उपयोग किया था।
स्थानीय लोग मानते हैं कि इस मार्ग के पुनरुद्धार से क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को भी नई मान्यता मिलेगी। इसके साथ ही लद्दाख और तिब्बत के बीच पुराने सांस्कृतिक संबंधों की याद भी ताजा होगी।
चीन से संबंधों पर निर्भर करेगा फैसला
विशेषज्ञों का मानना है कि डेमचोक मार्ग को खोलने का मुद्दा केवल धार्मिक नहीं बल्कि कूटनीतिक और रणनीतिक महत्व भी रखता है। चूंकि यह क्षेत्र वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब स्थित है, इसलिए किसी भी निर्णय के लिए भारत और चीन के बीच सहमति आवश्यक होगी।
फिलहाल सरकार की ओर से इस मार्ग को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। हालांकि लगातार उठ रही मांगों के कारण यह विषय फिर चर्चा में आ गया है। आने वाले समय में यदि इस दिशा में सकारात्मक पहल होती है तो कैलास मानसरोवर यात्रा का स्वरूप बदल सकता है और श्रद्धालुओं को एक नया विकल्प मिल सकता है।
श्रद्धालुओं को फैसले का इंतजार
कैलास मानसरोवर को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है और हर वर्ष हजारों श्रद्धालु वहां दर्शन की इच्छा रखते हैं। ऐसे में डेमचोक मार्ग को खोलने की मांग को कई धार्मिक संगठनों का समर्थन मिल रहा है।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियां इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाती हैं। यदि भविष्य में यह मार्ग बहाल होता है तो न केवल यात्रा आसान होगी, बल्कि लद्दाख को धार्मिक पर्यटन के एक नए केंद्र के रूप में भी पहचान मिल सकती है।










