महाभारत में युयुत्सु धृतराष्ट्र का 101वां पुत्र था, जिसका जन्म एक दासी से हुआ था। धर्मप्रिय युयुत्सु ने महाभारत युद्ध के बाद मारे गए कौरवों का अंतिम संस्कार किया और बाद में युधिष्ठिर के सलाहकार बने।
Mahabharat Yuyutsu: Mahabharat Yuyutsu Story में युयुत्सु को एक ऐसे पात्र के रूप में देखा जाता है, जिसने अधर्म के खिलाफ खड़े होकर धर्म का साथ चुना। धृतराष्ट्र के पुत्र होने के बावजूद उन्होंने महाभारत युद्ध में पांडवों का समर्थन किया। युद्ध समाप्त होने के बाद उन्हीं के हाथों 100 कौरवों का अंतिम संस्कार कराया गया था।
धृतराष्ट्र का 101वां पुत्र था युयुत्सु
महाभारत में युयुत्सु का नाम उन पात्रों में लिया जाता है, जिनका उल्लेख कम होता है, लेकिन जिनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। युयुत्सु धृतराष्ट्र का 101वां पुत्र था। उसका जन्म महारानी गांधारी से नहीं, बल्कि राजमहल की एक वैश्य दासी से हुआ था।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब गांधारी का गर्भ लंबे समय तक स्थिर रहा, तब धृतराष्ट्र की सेवा के लिए एक दासी को नियुक्त किया गया था। उसी दासी से युयुत्सु का जन्म हुआ। हालांकि वह कौरव वंश का हिस्सा था, लेकिन उसे हमेशा दासी-पुत्र कहकर अपमानित किया जाता था।
अधर्म के खिलाफ खड़ा हुआ था युयुत्सु
युयुत्सु बचपन से ही धर्मप्रिय, बुद्धिमान और न्याय का पक्ष लेने वाला माना जाता था। उसे यह अच्छी तरह समझ में आ गया था कि दुर्योधन और शकुनि के कई निर्णय अधर्म की ओर ले जा रहे हैं। उसने कई बार कौरवों को समझाने की कोशिश भी की, लेकिन उसकी बातों को नजरअंदाज कर दिया गया।
महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले जब श्रीकृष्ण ने दोनों पक्षों को अंतिम अवसर दिया, तब युयुत्सु ने धर्म का साथ चुनते हुए पांडवों की ओर से युद्ध लड़ने का फैसला किया। यही वजह थी कि वह युद्ध के बाद जीवित बचने वाले धृतराष्ट्र के इकलौते पुत्र बने।
युधिष्ठिर के आदेश पर किया कौरवों का अंतिम संस्कार
महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद धृतराष्ट्र और गांधारी के 100 पुत्र मारे जा चुके थे। कौरव वंश में ऐसा कोई भाई जीवित नहीं बचा था, जो उनका अंतिम संस्कार कर सके। ऐसे समय में युधिष्ठिर ने युयुत्सु को यह जिम्मेदारी सौंपी।
युयुत्सु ने सभी कौरवों का अंतिम संस्कार विधि-विधान से किया। महाभारत के स्त्री पर्व में इस प्रसंग का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह घटना केवल पारिवारिक कर्तव्य नहीं, बल्कि धर्म और परंपरा के पालन का प्रतीक भी मानी जाती है।
युद्ध के बाद बना युधिष्ठिर का सलाहकार
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद जब युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने, तब उन्होंने युयुत्सु को अपना विशेष मंत्री और सलाहकार नियुक्त किया। युधिष्ठिर को युयुत्सु की निष्ठा, न्यायप्रियता और धर्म के प्रति समर्पण पर पूरा विश्वास था।
महाभारत में युयुत्सु का चरित्र इस बात का उदाहरण माना जाता है कि जन्म नहीं, बल्कि व्यक्ति के कर्म और धर्म के प्रति उसका दृष्टिकोण ही उसकी वास्तविक पहचान बनाते हैं।








