पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस यानी TMC के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। चुनाव आयोग ने पार्टी के भीतर चल रहे संगठनात्मक विवाद के बीच फिलहाल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और उसके आरक्षित ‘फूल और घास’ चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। यह रोक आगामी विधानसभा उपचुनावों के लिए अंतरिम व्यवस्था के तौर पर लगाई गई है। इसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने चुनाव आयोग को तीन वैकल्पिक पार्टी नाम और तीन चुनाव चिन्हों के विकल्प सौंप दिए हैं। पार्टी ने यह जवाब आयोग के आदेश के विरोध के साथ दिया है।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस की आधिकारिक पहचान, संगठन और चुनाव चिन्ह पर अपना दावा करता रहा है। दूसरी ओर पार्टी के भीतर बने दूसरे गुट ने भी खुद को वास्तविक तृणमूल कांग्रेस बताया है। इसी विवाद के कारण मामला चुनाव आयोग के सामने पहुंचा। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें और दस्तावेज देखने के बाद माना कि फिलहाल पार्टी के भीतर दो प्रतिद्वंद्वी समूह हैं और दोनों ही मूल पार्टी होने का दावा कर रहे हैं। आयोग के मुताबिक इस विवाद का अंतिम फैसला चुनाव चिन्ह आदेश के पैरा 15 के तहत विस्तृत प्रक्रिया से किया जाना है।
चुनाव आयोग ने कहा कि आगामी उपचुनावों के लिए उपलब्ध समय इतना कम है कि पैरा 15 के तहत पूरे विवाद का अंतिम निर्धारण अभी नहीं किया जा सकता। इसी वजह से अंतरिम व्यवस्था लागू की गई है। इसके तहत ममता बनर्जी गुट और दूसरे गुट, दोनों को फिलहाल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ वाले आरक्षित चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल करने से रोक दिया गया है। दोनों पक्षों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ उपचुनाव लड़ने की व्यवस्था की गई है।
आयोग के निर्देश के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने गुरुवार देर रात अपना जवाब भेजा। रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी ने रात 11 बजकर 36 मिनट पर ईमेल के जरिए तीन पसंदीदा नाम और तीन चुनाव चिन्ह के विकल्प आयोग को भेजे। यह जवाब पार्टी ने ‘सबसे कड़े विरोध’ के साथ दिया है। हालांकि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों में इन तीन नामों और तीन प्रतीकों की पूरी सूची स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई है। इसलिए यह कहना अभी सही नहीं होगा कि ममता बनर्जी की पार्टी का नया नाम या नया चुनाव चिन्ह कौन सा होगा। अंतिम विकल्प चुनाव आयोग की ओर से तय किया जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर पश्चिम बंगाल के आगामी उपचुनावों में दिखाई देगा। चुनाव आयोग के मुताबिक दोनों गुटों को मौजूदा उपचुनावों के लिए उपलब्ध ‘फ्री सिंबल’ की सूची में से अपनी पसंद के तीन-तीन चुनाव चिन्ह बताने हैं। इसके बाद आयोग प्रत्येक गुट के लिए एक नाम और एक चुनाव चिन्ह आवंटित करेगा। दोनों पक्ष अपने नए नाम में मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ से संबंध का संकेत रखना चाहें तो ऐसा कर सकते हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि चुनाव आयोग ने स्थायी रूप से तृणमूल कांग्रेस का नाम बदल दिया है। अभी जो फैसला हुआ है, वह आगामी उपचुनावों को ध्यान में रखते हुए अंतरिम व्यवस्था है। आयोग का अंतिम निर्णय बाद में होने वाली पैरा 15 की कार्यवाही के बाद आएगा। उस प्रक्रिया में दोनों गुटों के संगठनात्मक दावे, पार्टी के संविधान, संबंधित दस्तावेज और अन्य सामग्री पर विचार किया जाएगा। इसलिए फिलहाल TMC का स्थायी नाम और ‘फूल-घास’ वाला चुनाव चिन्ह किस गुट के पास रहेगा, इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
‘फूल और घास’ का चुनाव चिन्ह तृणमूल कांग्रेस की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। पार्टी की स्थापना 1998 में कांग्रेस से अलग होकर हुई थी और इसी चुनाव चिन्ह के साथ ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। पिछले करीब 28 वर्षों से यह प्रतीक तृणमूल कांग्रेस की चुनावी पहचान से जुड़ा रहा है। अब पहली बार पार्टी के भीतर मौजूदा विवाद के कारण आगामी उपचुनावों में इस प्रतीक के इस्तेमाल पर रोक लगी है।
चुनाव आयोग के आदेश का सीधा संबंध पार्टी के अंदर चल रहे संगठनात्मक विवाद से है। आयोग के सामने दोनों पक्षों ने संगठन पर नियंत्रण और पार्टी की आधिकारिक पहचान को लेकर अपने-अपने दावे रखे हैं। आयोग ने फिलहाल किसी एक गुट को मूल पार्टी के नाम और चिन्ह का अधिकार देने के बजाय दोनों को समान स्थिति में रखने के लिए अंतरिम व्यवस्था लागू की है। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि दोनों गुटों के अधिकारों और हितों की रक्षा तथा आगामी चुनाव की प्रक्रिया को देखते हुए यह कदम जरूरी था।
विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि दोनों गुट आगामी चुनाव में अपने उम्मीदवार उतार चुके हैं और दोनों ही तृणमूल कांग्रेस की पहचान के साथ चुनाव लड़ने का दावा कर रहे थे। ऐसे में यदि एक ही नाम और चुनाव चिन्ह दोनों पक्षों को इस्तेमाल करने की अनुमति मिलती तो मतदाताओं और चुनावी प्रक्रिया के सामने भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती थी। आयोग ने इसी स्थिति को देखते हुए दोनों पक्षों को अलग-अलग नाम और चिन्ह देने का रास्ता अपनाया है।
आगामी उपचुनावों में नंदीग्राम और रेजीनगर की सीटें इस विवाद के केंद्र में हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक इन सीटों पर 6 अक्टूबर को मतदान होना है। आयोग की अंतरिम व्यवस्था के कारण इन चुनावों में मतदाताओं को TMC के पारंपरिक ‘फूल और घास’ वाले प्रतीक के बजाय संबंधित गुट को आवंटित नया चुनाव चिन्ह दिखाई देगा। दोनों गुटों के लिए अलग-अलग पहचान तय होने के बाद ही EVM पर उनके उम्मीदवारों के सामने इस्तेमाल होने वाले चिन्ह की अंतिम तस्वीर स्पष्ट होगी।
ममता बनर्जी गुट की ओर से आयोग के आदेश पर आपत्ति भी जताई गई है। पार्टी ने अपना जवाब विरोध दर्ज कराते हुए दिया है। दूसरी तरफ प्रतिद्वंद्वी गुट ने आयोग के फैसले का स्वागत किया है। यानी चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश को लेकर दोनों पक्षों की प्रतिक्रिया अलग-अलग है। इन राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का अंतिम विवाद पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह आयोग की आगे की कार्यवाही पर निर्भर करेगा।
यह मामला केवल चुनाव चिन्ह तक सीमित नहीं है। किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह उसके संगठनात्मक अस्तित्व और चुनावी पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण विषय होते हैं। जब एक ही दल के दो गुट किसी नाम और चिन्ह पर दावा करते हैं, तो चुनाव आयोग के सामने यह तय करने की जरूरत होती है कि चुनाव प्रक्रिया में किसे आधिकारिक पहचान दी जाए। चुनाव चिन्ह आदेश का पैरा 15 ऐसे विवादों के निर्धारण के लिए आयोग को अधिकार देता है। इस मामले में आयोग ने फिलहाल अंतिम फैसला सुरक्षित रखते हुए उपचुनावों के लिए अंतरिम व्यवस्था बनाई है।
ममता बनर्जी के लिए यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘फूल और घास’ वाला चुनाव चिन्ह उनकी पार्टी की स्थापना से जुड़ा हुआ है। हालांकि मौजूदा आदेश को स्थायी तौर पर चुनाव चिन्ह छिनने का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। आयोग ने खुद इसे अंतरिम व्यवस्था बताया है और अंतिम निर्धारण बाद की प्रक्रिया के जरिए किया जाना है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भविष्य में तृणमूल कांग्रेस हमेशा के लिए नया नाम और नया चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करेगी। फिलहाल बदलाव आगामी उपचुनावों तक सीमित है।
ममता गुट द्वारा तीन नाम और तीन चुनाव चिन्ह के विकल्प सौंपे जाने के बाद अब अगला कदम चुनाव आयोग का होगा। आयोग इन विकल्पों में से नियमों के मुताबिक एक नाम और एक उपलब्ध चुनाव चिन्ह आवंटित करेगा। दूसरी ओर प्रतिद्वंद्वी गुट को भी अपनी पसंद के विकल्प देने हैं। इसके बाद दोनों पक्ष अलग-अलग पहचान के साथ उपचुनाव में उतरेंगे।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव आयोग ने TMC का स्थायी नाम या चुनाव चिन्ह बदलने का अंतिम फैसला नहीं किया है। मौजूदा निर्णय केवल आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम व्यवस्था है। ममता बनर्जी के गुट ने तीन वैकल्पिक नाम और तीन चुनाव चिन्हों के विकल्प जरूर सौंप दिए हैं, लेकिन इनमें से कौन सा नाम और कौन सा प्रतीक आयोग मंजूर करेगा, यह अभी तय होना बाकी है। अंतिम तस्वीर चुनाव आयोग की आगे की कार्यवाही और पैरा 15 के तहत होने वाले विवाद के निपटारे के बाद ही साफ होगी।











