महाराष्ट्र नगरपालिका चुनावों में ‘निर्विरोध’ जीत पर उठे सवाल: लोकतंत्र की प्रतिष्ठा पर शिकंजा

महाराष्ट्र नगरपालिका चुनावों में ‘निर्विरोध’ जीत पर उठे सवाल: लोकतंत्र की प्रतिष्ठा पर शिकंजा

महाराष्ट्र में चल रहे नगरपालिका चुनावों में बड़ी संख्या में निर्विरोध जीत ने लोकतंत्र की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य के कई शहरों में लगभग 70 नगरसेवक बिना किसी मुकाबले के जीत गए हैं।

मुंबई: महाराष्ट्र में चल रहे नगरपालिका चुनावों में बड़ी संख्या में निर्विरोध जीत ने लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अलग-अलग नगरपालिकाओं में करीब 70 नगरसेवक बिना किसी मुकाबले के चुने गए हैं और आरोप है कि ये सभी सत्ताधारी खेमे से जुड़े हैं। विपक्ष का कहना है कि यह सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र में एक खतरनाक विकृति है। 

उनका आरोप है कि चुनाव में वास्तविक मुकाबले की जगह उम्मीदवारों को पैसे, दबाव और सत्ता के दुरुपयोग के जरिए मैदान से हटाया गया, ताकि जीत ‘निर्विरोध’ दिखाई दे और सत्ताधारी खेमे की ताकत को बढ़ावा मिले।

बड़ी संख्या में निर्विरोध जीत और विपक्ष की प्रतिक्रिया

कल्याण-डोंबिवली, ठाणे, जलगांव, पनवेल, भिवंडी और धुले जैसे शहरों में सत्ताधारी दलों के उम्मीदवारों की भारी संख्या में निर्विरोध जीत हुई। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया नहीं बल्कि लोकतंत्र में एक खतरनाक विकृति है। उनका दावा है कि चुनाव मैदान में मुकाबला होने के बजाय उम्मीदवारों को पैसे और दबाव के जरिए हटाया गया, ताकि जीत ‘निर्विरोध’ दिखाई दे।

अलगे शहरों से मिली जानकारी के अनुसार, विरोधी उम्मीदवारों को नामांकन वापस लेने के लिए करोड़ों रुपये तक की रकम देने की बात सामने आई है। कहीं 5 से 8 करोड़, कहीं 3 करोड़ और कुछ जगहों पर 20–30 लाख की रकम की चर्चा है। विपक्ष का कहना है कि यह प्रक्रिया खुलेआम हुई और उम्मीदवारों के पीछे खड़ी पार्टियों की औपचारिक अनुमति तक नहीं ली गई।

बीजेपी पर दोहरे रवैये का आरोप

विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों ने भाजपा पर दोहरे रवैये का आरोप लगाया है। ‘सामना’ की रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में तृणमूल कांग्रेस द्वारा बड़ी संख्या में निर्विरोध जीत पर भाजपा ने इसे लोकतंत्र की हत्या बताया था। उस समय आरोप लगे थे कि नामांकन से रोक लगाई गई, सरकारी तंत्र का दुरुपयोग हुआ और चुनाव आयोग ने आंखें मूंद रखी थीं।

अब वही स्थिति महाराष्ट्र में नजर आ रही है, लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि तब भाजपा विपक्ष में थी और अब सत्ता में है। उस वक्त भाजपा ने इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक भी अपील की थी। अदालत ने हजारों ग्राम पंचायत सीटों पर निर्विरोध जीत पर आश्चर्य व्यक्त किया था। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर महाराष्ट्र में इसी तरह के हालात बन रहे हैं, तो क्या इसे लोकतंत्र के लिए उतना ही खतरनाक नहीं माना जाना चाहिए?

‘नोटा’ विकल्प और मतदाताओं का अपमान

कानूनन हर चुनाव में ‘नोटा’ यानी None of The Above का विकल्प मौजूद होता है। इसका मतलब है कि मतदाता किसी भी उम्मीदवार को स्वीकार न करे। आलोचकों का कहना है कि जब नोटा का विकल्प उपलब्ध है, तो कोई चुनाव पूरी तरह निर्विरोध कैसे हो सकता है। यदि नोटा को पर्याप्त मत मिलते हैं, तो चुनाव दोबारा कराया जा सकता है।

विपक्ष ने इस प्रक्रिया को मतदाताओं का अपमान बताया है। उनका कहना है कि बिना वोट डाले जीत दर्ज करना जनता के भरोसे के साथ धोखाधड़ी है। कुछ सीटों पर तकनीकी कारणों से निर्विरोध चुनाव संभव हो सकते हैं, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर ऐसा होना सामान्य नहीं माना जा सकता। मतदाताओं और विपक्ष के आरोपों के अनुसार, पैसे और दबाव की बारिश में न सिर्फ उम्मीदवार बल्कि कुछ मतदाता भी प्रभावित हुए हैं। इसे लोकतंत्र का ‘माफियाकरण’ बताया जा रहा है, जहां जीत वोट से नहीं, बल्कि धन और राजनीतिक दबाव से तय होती है।

चुनाव आयोग, पुलिस प्रशासन और पूरी चुनाव व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक मांग कर रहे हैं कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो और भविष्य में लोकतंत्र की प्रक्रिया को सुरक्षित बनाया जाए।

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