मोखा पर हूतियों का कब्जा, बाब अल-मंदेब के करीब बढ़ा खतरा; पाकिस्तान ने सैन्य कार्रवाई से किया इनकार

यमन में हूतियों ने रणनीतिक मोखा शहर पर कब्जा कर लिया है। बाब अल-मंदेब से करीब 75 किमी दूर इस बढ़त से लाल सागर में जहाजों पर खतरा बढ़ने की आशंका है।

यमन में हूती विद्रोहियों ने रणनीतिक शहर मोखा पर कब्जा कर लिया है, जो बाब अल-मंदेब से करीब 75 किलोमीटर दूर है। इससे लाल सागर में समुद्री यातायात को लेकर चिंता बढ़ी है। पाकिस्तान ने फिलहाल हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से इनकार किया है।

सना: यमन में हूती विद्रोहियों और अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के बीच संघर्ष एक बार फिर तेज होता दिखाई दे रहा है। हूती लड़ाकों ने पश्चिमी तट के महत्वपूर्ण शहर मोखा पर कब्जा कर लिया है। यह शहर रणनीतिक बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से करीब 75 किलोमीटर दूर है। मोखा पर नियंत्रण से लाल सागर के पश्चिमी तट पर हूतियों की सैन्य और रणनीतिक स्थिति मजबूत होने की आशंका जताई जा रही है। इसी बीच यमन संघर्ष को लेकर पाकिस्तान ने फिलहाल किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल होने से इनकार किया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि सऊदी अरब के साथ हुए रक्षा समझौते के तहत हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर अभी कोई चर्चा नहीं चल रही है।

पिछले 10 दिनों से पश्चिमी यमन में बढ़ रहे थे हूती

रिपोर्ट्स के मुताबिक, हूती लड़ाके पिछले करीब 10 दिनों से यमन के ताइज शहर की पश्चिमी दिशा में लगातार आगे बढ़ रहे थे। इस दौरान उन्होंने रास्ते में आने वाले अल-शकीरा इलाके पर भी कब्जा कर लिया। अल-शकीरा ताइज शहर को यमन के पश्चिमी तट से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण मार्ग पर स्थित है। इस क्षेत्र पर नियंत्रण मिलने से हूतियों की पश्चिमी यमन में आवाजाही और स्थिति मजबूत हुई है।

हूती पहले से ही यमन की राजधानी सना और लाल सागर के प्रमुख बंदरगाह होदेइदा पर नियंत्रण रखते हैं। अब मोखा पर कब्जे के बाद पश्चिमी तट पर उनका प्रभाव और बढ़ गया है। इसी वजह से मोखा पर नियंत्रण को केवल एक बंदरगाह शहर पर कब्जे के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। रणनीतिक रूप से यह इलाका लाल सागर और बाब अल-मंदेब के करीब होने के कारण बेहद महत्वपूर्ण है।

बाब अल-मंदेब के करीब हूती, समुद्री यातायात पर बढ़ सकता है दबाव

मोखा बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से करीब 75 किलोमीटर दूर है। यह समुद्री मार्ग लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ता है और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

मोखा पर कब्जे के बाद हूतियों की पहुंच बाब अल-मंदेब के और करीब हो गई है। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने लाल सागर में स्थित हनीश द्वीपों की दिशा में भी बढ़त बनाई है। धुबाब और उसके सामने मौजूद ये द्वीप बाब अल-मंदेब के काफी करीब हैं।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अगर हूती इस क्षेत्र में अपनी स्थिति को और मजबूत करते हैं, तो लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों पर नजर रखना और उन पर दबाव बनाना उनके लिए आसान हो सकता है। बाब अल-मंदेब एक संकरा समुद्री मार्ग है। ऐसे में किसी बड़े समुद्री क्षेत्र पर सीधे नियंत्रण के बिना भी आसपास के रणनीतिक ठिकानों से गुजरने वाले जहाजों के लिए जोखिम पैदा किया जा सकता है।

पाकिस्तान ने सऊदी की मदद के लिए सेना भेजने से किया इनकार

यमन संघर्ष में हूतियों को ईरान का समर्थन हासिल है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को सऊदी अरब समर्थन देता है। संघर्ष के बीच पाकिस्तान ने फिलहाल सैन्य कार्रवाई से दूरी बनाए रखने की बात कही है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के तहत अभी हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर कोई चर्चा नहीं हो रही है।

उन्होंने कहा, “अभी ऐसी कोई बात चर्चा में नहीं है। जब समय आएगा, तब समझौते के तहत कार्रवाई की जाएगी।” पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय का यह बयान रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के एक दिन पहले दिए बयान के बाद आया। आसिफ ने कहा था कि यदि यमन का संघर्ष सऊदी अरब तक पहुंचता है, तो पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुआ रक्षा समझौता लागू हो सकता है।

पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये रक्षा समझौता क्या है?

7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच रक्षा समझौता हुआ था। इसके तहत किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति में बाकी दोनों देश उसकी सुरक्षा में सहायता करेंगे। हालांकि, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा स्थिति में इस समझौते के तहत हूतियों के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई पर चर्चा नहीं हो रही है।

इस बयान से फिलहाल यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तान यमन में सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचना चाहता है। हालांकि, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर समझौते के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

यमन में फिर क्यों तेज हुआ संघर्ष?

यमन में हूती विद्रोहियों और अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के बीच गृहयुद्ध 2014 में शुरू हुआ था। वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र की कोशिशों के बाद दोनों पक्षों के बीच संघर्षविराम हुआ था। हालांकि, इसके बाद कोई स्थायी शांति समझौता नहीं हो सका।

विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष का असर यमन की स्थिति पर भी पड़ रहा है। मौजूदा परिस्थितियों में यमन की सरकार हूतियों के नियंत्रण वाले इलाकों को वापस हासिल करने की कोशिश कर रही है।

दूसरी ओर, हूती लाल सागर के किनारे और बाब अल-मंदेब के आसपास अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं। इसी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण मोखा, ताइज और होदेइदा के आसपास संघर्ष तेज होने की बात कही जा रही है। पिछले कुछ दिनों में दोनों पक्षों के लड़ाकों के साथ आम नागरिकों के भी मारे जाने की जानकारी सामने आई है। संघर्ष के कारण बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर छोड़कर दूसरी जगह जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

सऊदी अरब ने 2015 में शुरू किया था सैन्य अभियान

यमन में राजनीतिक संकट गहराने के बाद देश पर किसी एक सरकार का प्रभावी नियंत्रण नहीं रह गया था। हूतियों को ईरान का समर्थन मिलने के कारण सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी।

2015 में सऊदी अरब ने आठ अरब देशों के साथ मिलकर एक सैन्य गठबंधन बनाया और हूतियों के खिलाफ अभियान शुरू किया। गठबंधन का घोषित उद्देश्य तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दरब्बुह मंसूर हादी की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को सत्ता में वापस लाना था।

करीब आठ साल तक संघर्ष जारी रहने के बाद सऊदी अरब इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि केवल सैन्य शक्ति के जरिए हूतियों को हराना संभव नहीं है। इसके बाद उसने बातचीत का रास्ता अपनाया और हूती नेताओं के साथ सीधे संपर्क की कोशिश शुरू की।

यमन का बड़ा हिस्सा अब भी अलग-अलग शक्तियों के नियंत्रण में

मौजूदा स्थिति में उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर हूतियों का नियंत्रण है। दूसरी ओर, दक्षिणी यमन अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के नियंत्रण में है। हालांकि, वह आर्थिक और सैन्य सहायता के लिए काफी हद तक सऊदी अरब पर निर्भर है। मोखा पर हूतियों का कब्जा इस शक्ति संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पश्चिमी तट पर उनकी स्थिति मजबूत होने से ताइज और होदेइदा के बीच का रणनीतिक क्षेत्र भी प्रभावित हो सकता है।

सबसे बड़ी चिंता बाब अल-मंदेब और लाल सागर में समुद्री यातायात को लेकर है। यह मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है और यहां किसी भी तरह की सैन्य अस्थिरता का असर क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुद्री आवाजाही पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल मोखा पर हूतियों के कब्जे के बाद क्षेत्रीय स्थिति पर नजर बनी हुई है। पाकिस्तान ने सैन्य कार्रवाई से फिलहाल इनकार किया है, जबकि यमन में संघर्ष को लेकर आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि हूती पश्चिमी तट पर अपनी बढ़त को कितना मजबूत कर पाते हैं और यमनी सरकार तथा उसके समर्थक इसका किस तरह जवाब देते हैं।

Leave a comment