नैनीताल में साइबर ठगों का बड़ा जाल, 2,388 शिकायतों में 10.55 करोड़ की चपत; UPI से जुड़े 1,898 मामले

नैनीताल में 16 सितंबर तक साइबर ठगी की 2,388 शिकायतें दर्ज हुईं। पीड़ितों से 10.55 करोड़ रुपये ठगे गए, जिनमें UPI से जुड़े 1,898 मामले सामने आए।
नैनीताल में साइबर ठगों का बड़ा जाल, 2,388 शिकायतों में 10.55 करोड़ की चपत; UPI से जुड़े 1,898 मामले
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उत्तराखंड के नैनीताल जिले में साइबर ठगी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इस साल 16 सितंबर तक नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल यानी NCRP पर साइबर धोखाधड़ी से जुड़ी कुल 2,388 शिकायतें दर्ज की गई हैं। इन शिकायतों में पीड़ितों ने कुल 10 करोड़ 55 लाख 90 हजार 814 रुपये की ठगी की जानकारी दी है। आंकड़ों के मुताबिक सबसे ज्यादा मामले UPI से जुड़े हैं। अकेले UPI के माध्यम से ठगी की 1,898 शिकायतें दर्ज हुई हैं। इसके बाद डेबिट-क्रेडिट कार्ड, फ्रॉड कॉल और इंटरनेट बैंकिंग से जुड़े मामले सामने आए हैं।

नैनीताल जिले में सामने आए ये आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल लेनदेन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर ठगी के तरीके भी लगातार बदल रहे हैं। लोग रोजमर्रा के भुगतान, खरीदारी, बिल जमा करने और पैसे ट्रांसफर करने के लिए UPI का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी बीच साइबर अपराधी डिजिटल भुगतान से जुड़े अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल कर लोगों को निशाना बना रहे हैं। 16 सितंबर तक दर्ज 2,388 शिकायतों में UPI से जुड़े मामलों की संख्या 1,898 है, जो कुल शिकायतों का बड़ा हिस्सा है।

शिकायतों में दर्ज रकम 10 करोड़ 55 लाख 90 हजार 814 रुपये है। पुलिस और साइबर सेल की कार्रवाई के बाद 2 करोड़ 29 लाख 31 हजार 147 रुपये की रकम होल्ड कराई जा चुकी है। इसके अलावा 11 लाख 23 हजार 179 रुपये पीड़ितों को वापस कराए जाने की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 2.18 करोड़ रुपये की रकम रिफंड प्रक्रिया में है। इसका मतलब यह है कि ठगी के बाद कुछ मामलों में समय रहते रकम को बैंकिंग सिस्टम में रोकने की कार्रवाई की गई, जिसके बाद उसे पीड़ितों तक वापस पहुंचाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।

आंकड़ों में UPI से जुड़े 1,898 मामले सबसे अधिक हैं। इसके बाद डेबिट और क्रेडिट कार्ड से ठगी के 167 मामले दर्ज हुए हैं। फ्रॉड कॉल से जुड़े 146 मामले सामने आए हैं, जबकि इंटरनेट बैंकिंग से संबंधित 105 शिकायतें दर्ज की गई हैं। इसके अलावा ई-वॉलेट के 34, डिमैट-डिपॉजिटरी के 26 और AEPS यानी आधार आधारित भुगतान प्रणाली से जुड़े 12 मामले भी सामने आए हैं।

इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि साइबर ठगी सिर्फ एक माध्यम तक सीमित नहीं है। UPI सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला डिजिटल भुगतान माध्यम होने के कारण शिकायतों में इसका हिस्सा भी बड़ा है, लेकिन कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग, फोन कॉल, ई-वॉलेट और AEPS के जरिए भी लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे में डिजिटल भुगतान करने वाले लोगों के लिए अलग-अलग तरह की ऑनलाइन धोखाधड़ी को पहचानना जरूरी हो गया है।

UPI से जुड़ी ठगी में अपराधी कई तरह के बहाने इस्तेमाल कर सकते हैं। किसी को पैसे भेजने के नाम पर लिंक भेजना, रिफंड दिलाने का झांसा देना, किसी सेवा को बंद होने से बचाने के नाम पर भुगतान करवाना या किसी परिचित के नाम से संपर्क करना जैसे तरीके इस्तेमाल किए जा सकते हैं। ऐसे मामलों में किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर भुगतान करने से पहले उसकी पहचान और उद्देश्य की पुष्टि करना जरूरी है।

कई बार साइबर ठग फोन पर खुद को बैंक कर्मचारी, सरकारी अधिकारी, कंपनी प्रतिनिधि या किसी सेवा प्रदाता का कर्मचारी बताकर लोगों से संपर्क करते हैं। इसके बाद खाते से जुड़ी जानकारी मांगने या किसी लिंक पर क्लिक करने के लिए कहा जा सकता है। फ्रॉड कॉल से जुड़े 146 मामले नैनीताल जिले में दर्ज हुए हैं। हालांकि हर शिकायत का तरीका अलग हो सकता है और वास्तविक घटना की पुष्टि जांच के बाद ही होती है।

डेबिट और क्रेडिट कार्ड से जुड़े 167 मामले भी सामने आए हैं। कार्ड से संबंधित जानकारी हासिल करने के लिए साइबर अपराधी अलग-अलग तरीके अपना सकते हैं। किसी बैंक या वित्तीय संस्था के नाम से आने वाले संदिग्ध फोन, मैसेज या लिंक पर भरोसा करने से पहले संबंधित बैंक के आधिकारिक माध्यम से जानकारी की पुष्टि करना जरूरी है। OTP, PIN, CVV जैसी संवेदनशील जानकारी किसी अनजान व्यक्ति के साथ साझा नहीं करनी चाहिए।

इंटरनेट बैंकिंग से जुड़े 105 मामलों में भी ऑनलाइन माध्यम का इस्तेमाल कर ठगी की शिकायत सामने आई है। आज के समय में बैंकिंग सेवाएं मोबाइल और इंटरनेट के जरिए आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन इसी सुविधा के साथ फर्जी वेबसाइट, लिंक और डिजिटल माध्यमों से होने वाली धोखाधड़ी का जोखिम भी रहता है। बैंकिंग से जुड़े किसी भी काम के लिए आधिकारिक ऐप या वेबसाइट का इस्तेमाल करना सुरक्षित माना जाता है।

ई-वॉलेट से जुड़े 34 मामलों और डिमैट-डिपॉजिटरी से जुड़े 26 मामलों से यह भी पता चलता है कि साइबर ठग डिजिटल वित्तीय सेवाओं के अलग-अलग हिस्सों को निशाना बना रहे हैं। AEPS से जुड़े 12 मामले भी दर्ज हुए हैं। यानी केवल UPI ही नहीं, बल्कि डिजिटल वित्तीय व्यवस्था के अन्य माध्यमों से भी धोखाधड़ी की शिकायतें सामने आ रही हैं।

साइबर ठगी होने के बाद शिकायत करने में देरी नहीं करना बेहद महत्वपूर्ण है। भारत सरकार के अनुसार वित्तीय साइबर फ्रॉड की तत्काल रिपोर्टिंग के लिए 1930 हेल्पलाइन और नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल की व्यवस्था है। I4C के तहत संचालित सिस्टम का उद्देश्य वित्तीय धोखाधड़ी की जानकारी मिलने पर रकम को आगे जाने से रोकने के लिए संबंधित एजेंसियों के बीच कार्रवाई में मदद करना है।

नैनीताल के मामले में भी ठगी की रकम को होल्ड कराने की कार्रवाई की गई है। कुल शिकायतों में बताई गई 10.55 करोड़ रुपये से अधिक की राशि में से 2.29 करोड़ रुपये से ज्यादा होल्ड कराए गए हैं। हालांकि किसी रकम के होल्ड होने का मतलब यह नहीं है कि वह तुरंत पीड़ित के खाते में वापस आ जाती है। बैंकिंग और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही रकम की वापसी की कार्रवाई होती है।

अब तक 11 लाख 23 हजार 179 रुपये पीड़ितों को वापस कराए जा चुके हैं। करीब 2.18 करोड़ रुपये रिफंड की प्रक्रिया में बताए गए हैं। एसपी सिटी एवं साइबर सेल मनोज कुमार कत्याल के अनुसार बैंक में होल्ड कराई गई रकम को पीड़ितों के खातों में वापस कराने की प्रक्रिया के लिए संस्तुति की गई है।

साइबर ठगी के मामलों में शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस और संबंधित बैंकिंग संस्थाएं लेनदेन की कड़ियों को ट्रैक करने का प्रयास करती हैं। किस खाते में रकम गई, किस माध्यम से ट्रांसफर हुई और रकम आगे कहां भेजी गई, इन सभी पहलुओं की जांच की जा सकती है। समय पर शिकायत मिलने से लेनदेन को रोकने या रकम को होल्ड कराने की संभावना बढ़ सकती है।

नैनीताल जिले में दर्ज 2,388 शिकायतों को केवल संख्या के रूप में देखने के बजाय यह समझना भी जरूरी है कि ये NCRP पर दर्ज शिकायतें हैं। हर शिकायत में बताए गए नुकसान और घटना की परिस्थितियों की अलग-अलग जांच होती है। इसलिए 10.55 करोड़ रुपये की राशि शिकायतों में रिपोर्ट की गई कुल रकम है, जिसे प्रत्येक मामले में अंतिम रूप से प्रमाणित नुकसान की राशि नहीं माना जाना चाहिए।

UPI से जुड़े मामलों की संख्या 1,898 होने के कारण डिजिटल भुगतान के दौरान सावधानी खास तौर पर जरूरी है। किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर UPI PIN डालना, स्क्रीन शेयर करना, संदिग्ध ऐप डाउनलोड करना या अनजान लिंक खोलना जोखिम पैदा कर सकता है। भुगतान करने से पहले स्क्रीन पर दिखाई दे रहे नाम और रकम की जांच करना भी जरूरी है।

इसी तरह यदि कोई व्यक्ति पैसे प्राप्त करने के नाम पर UPI PIN डालने के लिए कहता है तो सावधान रहने की जरूरत है। UPI PIN आम तौर पर भुगतान को अधिकृत करने के लिए इस्तेमाल होता है। इसलिए किसी व्यक्ति के कहने पर बिना समझे PIN डालने से बचना चाहिए।

साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले तरीकों में समय के साथ बदलाव भी देखा जाता है। कभी बैंक खाते या कार्ड को बंद करने की धमकी दी जाती है, कभी KYC अपडेट के नाम पर संपर्क किया जाता है और कभी किसी सेवा या रिफंड का झांसा दिया जाता है। ऐसे किसी भी संदेश या कॉल पर तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय आधिकारिक माध्यम से जानकारी की पुष्टि करना जरूरी है।

नैनीताल जिले के आंकड़ों में फ्रॉड कॉल के 146 मामले दर्ज होना यह दिखाता है कि फोन के जरिए भी लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। यदि कोई व्यक्ति फोन पर खुद को पुलिस, बैंक या किसी सरकारी विभाग का अधिकारी बताकर पैसे मांगता है तो उसकी पहचान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करनी चाहिए। केवल फोन पर बताए गए नाम या पद के आधार पर पैसे ट्रांसफर करना सुरक्षित नहीं है।

डिजिटल लेनदेन में सावधानी के साथ मोबाइल फोन और बैंकिंग ऐप की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है। फोन में संदिग्ध ऐप डाउनलोड नहीं करने चाहिए और किसी अनजान व्यक्ति को स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस की अनुमति नहीं देनी चाहिए। बैंकिंग से संबंधित पासवर्ड और PIN को भी सुरक्षित रखना चाहिए।

साइबर ठगी का शिकार होने वाले व्यक्ति को घटना से जुड़े सबूत भी सुरक्षित रखने चाहिए। बैंक ट्रांजैक्शन का विवरण, UPI आईडी, फोन नंबर, मैसेज, ईमेल, स्क्रीनशॉट और संदिग्ध लिंक जैसी जानकारी जांच में उपयोगी हो सकती है। शिकायत करते समय इन विवरणों को उपलब्ध कराने से जांच एजेंसियों को लेनदेन की कड़ी समझने में मदद मिल सकती है।

नैनीताल में साइबर ठगी के आंकड़ों के बीच रिफंड का आंकड़ा भी चर्चा में है। रिपोर्ट की गई कुल रकम 10.55 करोड़ रुपये से अधिक है, जबकि अभी तक 11.23 लाख रुपये वापस कराए गए हैं और 2.18 करोड़ रुपये रिफंड की प्रक्रिया में हैं। यह अंतर बताता है कि साइबर ठगी में पैसा वापस कराना कई मामलों में लंबी बैंकिंग और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा होता है।

केंद्र सरकार के स्तर पर भी वित्तीय साइबर फ्रॉड की तत्काल रिपोर्टिंग और रकम को रोकने के लिए तंत्र संचालित है। गृह मंत्रालय के अनुसार I4C के तहत संचालित CFCFRMS का उद्देश्य वित्तीय धोखाधड़ी की तुरंत रिपोर्टिंग और धोखाधड़ी करने वालों को रकम निकालने से रोकने में मदद करना है। 30 जून 2026 तक इस प्रणाली के जरिए 32.80 लाख से अधिक शिकायतों में 11,158 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम बचाने की जानकारी सरकार ने दी थी।

नैनीताल जिले में भी साइबर सेल और पुलिस के सामने आने वाले मामलों की जांच जारी है। शिकायतों की संख्या को देखते हुए डिजिटल भुगतान से जुड़े अपराधों पर निगरानी और लोगों को जागरूक करना महत्वपूर्ण है। UPI के साथ कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग, फोन कॉल और अन्य डिजिटल माध्यमों से जुड़े मामलों को भी जांच के दायरे में लिया जा रहा है।

फिलहाल 16 सितंबर 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार नैनीताल जिले में NCRP पर 2,388 साइबर धोखाधड़ी की शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं। शिकायतों में 10 करोड़ 55 लाख 90 हजार 814 रुपये की ठगी की जानकारी दी गई है। इनमें 1,898 मामले UPI से जुड़े हैं। 2 करोड़ 29 लाख 31 हजार 147 रुपये होल्ड कराए गए हैं और 11 लाख 23 हजार 179 रुपये वापस कराए जा चुके हैं। करीब 2.18 करोड़ रुपये की रकम रिफंड प्रक्रिया में है।

साइबर ठगी से बचने के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि किसी अनजान कॉल, मैसेज या लिंक पर भरोसा करने से पहले उसकी पुष्टि की जाए। यदि पैसे की ठगी हो जाती है तो तुरंत 1930 पर शिकायत करने और NCRP पर रिपोर्ट दर्ज कराने से कार्रवाई जल्दी शुरू कराने में मदद मिल सकती है। नैनीताल के ये आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल भुगतान की सुविधा के साथ उसकी सुरक्षा को लेकर सतर्क रहना भी उतना ही जरूरी है।

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