नैनीताल की 70% से ज्यादा पहाड़ियों में भूगर्भीय हलचल, सैटेलाइट डेटा से खुलासा; 24.9% इलाका हाई रिस्क

नैनीताल की पहाड़ियों पर 2017-2024 के सैटेलाइट डेटा से बड़े हिस्से में जमीन की हलचल मिली। 24.9% क्षेत्र हाई और 59.6% मध्यम भूस्खलन जोखिम में है।
नैनीताल की 70% से ज्यादा पहाड़ियों में भूगर्भीय हलचल, सैटेलाइट डेटा से खुलासा; 24.9% इलाका हाई रिस्क
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उत्तराखंड के प्रसिद्ध पर्यटन शहर नैनीताल को लेकर एक वैज्ञानिक अध्ययन ने चिंता बढ़ाने वाली तस्वीर सामने रखी है। सात वर्षों के सैटेलाइट रडार डेटा के विश्लेषण में नैनीताल की पहाड़ियों के बड़े हिस्से में लगातार जमीन की हलचल दर्ज की गई है। अध्ययन के मुताबिक 70 प्रतिशत से अधिक पहाड़ी क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक सतही विकृति यानी जमीन के स्तर पर बदलाव रिकॉर्ड हुआ है। वहीं विस्तृत भूस्खलन जोखिम आकलन में 24.9 प्रतिशत क्षेत्र को हाई-हैजार्ड यानी अत्यधिक भूस्खलन जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। यह क्षेत्र करीब 17.08 वर्ग किलोमीटर है। इसके अलावा 59.6 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम जोखिम वाली श्रेणी में पाया गया है।

यह अध्ययन सिर्फ बारिश के दौरान होने वाले अचानक भूस्खलन की घटनाओं पर आधारित नहीं है, बल्कि लंबे समय तक जमीन में होने वाले बेहद धीमे बदलावों को समझने की कोशिश करता है। शोधकर्ताओं ने वर्ष 2017 से 2024 के बीच यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के Sentinel-1A उपग्रह से मिले रडार डेटा का इस्तेमाल किया। इस दौरान लिए गए 155 सैटेलाइट रडार चित्रों का Persistent Scatterer Interferometry यानी PSI तकनीक से विश्लेषण किया गया। इस तकनीक की मदद से जमीन की सतह पर होने वाले बेहद छोटे और धीमे बदलावों को ट्रैक किया जा सकता है।

अध्ययन में नैनीताल की 68.62 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वाली स्टडी एरिया को अलग-अलग जोखिम श्रेणियों में बांटा गया। इसमें 17.08 वर्ग किलोमीटर यानी 24.9 प्रतिशत क्षेत्र हाई हैजार्ड जोन में आया। 40.87 वर्ग किलोमीटर यानी 59.6 प्रतिशत क्षेत्र को मध्यम जोखिम वाला पाया गया, जबकि 10.66 वर्ग किलोमीटर यानी 15.5 प्रतिशत क्षेत्र कम जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया। इसका अर्थ यह नहीं है कि नैनीताल की 70 प्रतिशत से अधिक पहाड़ियां तुरंत ढहने वाली हैं। वैज्ञानिकों ने जमीन की सतह में अपेक्षाकृत अधिक विकृति दर्ज की है, जबकि खतरे का अंतिम आकलन कई अलग-अलग कारकों को मिलाकर किया गया है।

शोधकर्ताओं के अनुसार नैनीताल के पहाड़ी क्षेत्र की भौगोलिक संरचना इसे स्वाभाविक रूप से संवेदनशील बनाती है। यहां की चट्टानों में दरारें, जोड़ और विभिन्न प्रकार की भूगर्भीय संरचनाएं मौजूद हैं। कई स्थानों पर चट्टानें कमजोर और खंडित हैं, जिससे बारिश का पानी भीतर तक पहुंच सकता है और ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही तेज ढलान, वर्षा, कटाव और जल संबंधी प्रक्रियाएं भी जमीन की स्थिरता पर असर डालती हैं।

अध्ययन में बलियानाला क्षेत्र को विशेष रूप से संवेदनशील बताया गया है। बलियानाला नैनीताल का ऐसा क्षेत्र है जहां लंबे समय से भू-स्खलन और जमीन के खिसकने की घटनाएं चिंता का कारण रही हैं। वैज्ञानिक अध्ययन में भी यह इलाका सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में सामने आया है। हाई-हैजार्ड क्षेत्र विशेष रूप से बलियानाला और नैनीताल झील फॉल्ट के दक्षिण-पूर्वी हिस्से के आसपास केंद्रित पाए गए।

बलियानाला की संवेदनशीलता को केवल एक कारण से नहीं जोड़ा जा सकता। यहां कई महत्वपूर्ण भूगर्भीय संरचनाएं एक-दूसरे के आसपास मौजूद हैं। ऐसी परिस्थितियों में कमजोर और खंडित चट्टानों के कारण ढलानों पर अस्थिरता का खतरा बढ़ सकता है। बारिश के दौरान पानी चट्टानों और मिट्टी के भीतर पहुंचता है तो पहले से कमजोर ढलानों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। यही कारण है कि बलियानाला जैसे क्षेत्रों की लगातार निगरानी को अध्ययन में महत्वपूर्ण बताया गया है।

नैनीताल की भौगोलिक स्थिति भी इस मामले को महत्वपूर्ण बनाती है। शहर का बड़ा हिस्सा पुराने भूस्खलन से जमा हुए मलबे और अपेक्षाकृत कमजोर भूभाग पर बसा हुआ है। ऐसे क्षेत्रों में जमीन की स्थिरता को लेकर नियमित वैज्ञानिक निगरानी जरूरी हो जाती है। शहर में लगातार बढ़ता निर्माण, सड़कों का विस्तार और ढलानों पर मानवीय गतिविधियां प्राकृतिक दबाव के साथ मिलकर संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकती हैं। अध्ययन में तेजी से हो रहे शहरीकरण, वनों में बदलाव, सड़क निर्माण और अस्थिर ढलानों पर विकास को भी चिंता के कारकों में शामिल किया गया है।

सैटेलाइट अध्ययन में जमीन की औसत संचयी विस्थापन मात्रा करीब 20 मिलीमीटर आंकी गई। यह बदलाव कई वर्षों में धीरे-धीरे दर्ज किया गया है। इसलिए इसे किसी एक दिन या एक बारिश के बाद जमीन खिसकने की घटना के तौर पर नहीं समझना चाहिए। वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि सैटेलाइट से दर्ज आंकड़े जमीन की गति को उपग्रह की दृष्टि-रेखा यानी Line of Sight के संदर्भ में मापते हैं। केवल एक दिशा के सैटेलाइट डेटा के आधार पर जमीन की गति के ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज हिस्से को अलग-अलग निर्धारित नहीं किया जा सकता।

यही वजह है कि अध्ययन के निष्कर्ष को नैनीताल में तत्काल बड़े भूस्खलन की भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। शोधकर्ताओं ने खुद कहा है कि केवल जमीन में दर्ज विकृति से यह निश्चित रूप से नहीं बताया जा सकता कि अस्थिरता का कारण क्या है या किसी स्थान पर भूस्खलन कब होगा। इसके लिए अलग-अलग दिशाओं से सैटेलाइट डेटा, GPS माप, भूगर्भीय जांच, बारिश के आंकड़े और जमीन पर किए जाने वाले अन्य मापों की जरूरत होती है।

अध्ययन में इस्तेमाल किए गए आंकड़े नैनीताल की पहाड़ियों में लंबे समय से चल रही प्रक्रिया को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। सामान्य तौर पर पहाड़ों में जमीन का बेहद धीमा खिसकना आंखों से दिखाई नहीं देता। सड़क, मकान या ढलान ऊपर से सामान्य दिखाई दे सकते हैं, लेकिन सैटेलाइट रडार तकनीक बेहद छोटे बदलावों को भी रिकॉर्ड कर सकती है। इस तरह की निगरानी से उन इलाकों की पहचान करने में मदद मिलती है जहां भविष्य में विस्तृत भूगर्भीय जांच की आवश्यकता हो सकती है।

नैनीताल की पहाड़ियों पर मानवीय दबाव भी लगातार बढ़ा है। पर्यटन के कारण शहर और आसपास के इलाकों में निर्माण गतिविधियां महत्वपूर्ण हैं। सड़कें, भवन और अन्य बुनियादी ढांचे पहाड़ी ढलानों पर अतिरिक्त भार डाल सकते हैं। वहीं पेड़ों और प्राकृतिक वनस्पति में बदलाव से मिट्टी की पकड़ तथा पानी के बहाव का स्वरूप प्रभावित हो सकता है। अध्ययन में मानव गतिविधियों को भूगर्भीय और पर्यावरणीय कारकों के साथ जोड़कर नैनीताल की संवेदनशीलता को समझने की जरूरत बताई गई है।

बारिश इस पूरे समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पहाड़ों में भारी बारिश होने पर पानी ढलानों में प्रवेश करता है और मिट्टी तथा चट्टानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। लगातार बारिश के दौरान कमजोर हिस्सों में दबाव बढ़ने पर मलबा खिसकने की घटनाएं हो सकती हैं। हालांकि किसी विशेष भूस्खलन को केवल बारिश या केवल निर्माण गतिविधि से जोड़ने के लिए अलग-अलग वैज्ञानिक जांच की जरूरत होती है। अध्ययन भी नैनीताल की भूगर्भीय अस्थिरता को कई प्राकृतिक और मानवीय कारकों के संयुक्त प्रभाव के रूप में देखता है।

शोध में नैनीताल क्षेत्र की कई भूगर्भीय संरचनाओं का उल्लेख किया गया है। इनमें Main Boundary Thrust, Jeol Thrust, Manora structures और Ramgarh Thrust जैसी संरचनाएं शामिल हैं। नैनीताल झील फॉल्ट ने भी क्षेत्र की भू-आकृति को प्रभावित किया है। इन संरचनाओं के कारण इलाके की चट्टानों में मौजूद कमजोरी और दरारों को समझना जरूरी हो जाता है। जहां कई भूगर्भीय संरचनाएं मिलती हैं, वहां ढलानों की स्थिरता का अध्ययन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से बलियानाला, शेर का डांडा और अन्य प्रमुख भूगर्भीय क्षेत्रों में लंबे समय तक निगरानी की जरूरत बताई है। इसके लिए केवल सैटेलाइट इमेजरी पर निर्भर रहने के बजाय GPS, भूगर्भीय सर्वेक्षण, वर्षा निगरानी और जमीन पर किए जाने वाले दूसरे वैज्ञानिक परीक्षणों को साथ इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। इससे जमीन की वास्तविक गति और उसके संभावित कारणों को अधिक सटीक तरीके से समझा जा सकेगा।

नैनीताल की पहाड़ियों को लेकर सामने आए इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह खतरे को केवल अचानक होने वाली घटनाओं के संदर्भ में नहीं देखता। पहाड़ों में बड़े भूस्खलन से पहले कई बार जमीन में लंबे समय तक छोटे बदलाव हो सकते हैं। यदि इन बदलावों की नियमित निगरानी की जाए तो संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और वहां निर्माण तथा आपदा प्रबंधन की योजनाओं को बेहतर तरीके से तैयार करने में मदद मिल सकती है। हालांकि किसी भी क्षेत्र को केवल सैटेलाइट डेटा के आधार पर तुरंत असुरक्षित घोषित करने के बजाय जमीन पर विस्तृत जांच जरूरी होगी।

नैनीताल के लिए यह अध्ययन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शहर पर्यटन, आवास और परिवहन की दृष्टि से उत्तराखंड के प्रमुख केंद्रों में शामिल है। पहाड़ी ढलानों की स्थिरता का सीधा संबंध सड़क, भवन, जलापूर्ति और अन्य बुनियादी ढांचे की सुरक्षा से जुड़ता है। यदि किसी क्षेत्र में लगातार जमीन की हलचल दर्ज होती है तो वहां निर्माण की योजना बनाते समय भूगर्भीय स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी हो जाता है।

वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आए 24.9 प्रतिशत हाई-हैजार्ड आंकड़े का मतलब यह है कि अध्ययन क्षेत्र के करीब एक चौथाई हिस्से को संयुक्त जोखिम आकलन में अत्यधिक भूस्खलन जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। वहीं लगभग 60 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम जोखिम श्रेणी में है। यानी नैनीताल के अधिकांश अध्ययन क्षेत्र को किसी न किसी स्तर की भू-संवेदनशीलता के दायरे में रखा गया है। लेकिन यह आंकड़ा किसी निश्चित समय पर भूस्खलन होने की संभावना नहीं बताता, बल्कि विभिन्न वैज्ञानिक और भूगर्भीय कारकों के आधार पर तैयार जोखिम वर्गीकरण है।

अध्ययन को UPES देहरादून की रिसर्च स्कॉलर अचला जोशी, भूविज्ञानी प्रोफेसर गिरीश चंद्र कोठियारी और अन्य शोधकर्ताओं ने तैयार किया है। शोध सितंबर 2026 में Springer Nature के Bulletin of Engineering Geology and the Environment में प्रकाशित हुआ। इसमें सात साल के Sentinel-1A डेटा के साथ पुराने भूस्खलन रिकॉर्ड, GPS आधारित क्रस्टल स्ट्रेन, जमीन के हिलने की तीव्रता, भूगर्भीय जानकारी और बारिश से जुड़े आंकड़ों को भी जोखिम आकलन में शामिल किया गया।

इस अध्ययन के सामने आने के बाद नैनीताल की पहाड़ियों की निगरानी को और व्यवस्थित करने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। खास तौर पर बलियानाला जैसे संवेदनशील इलाकों में नियमित सर्वेक्षण, ढलानों की निगरानी और बारिश के दौरान अतिरिक्त सतर्कता महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि किसी इलाके में जमीन की गति बढ़ती है तो समय रहते वैज्ञानिक जांच और स्थानीय स्तर पर सुरक्षा उपायों की योजना बनाई जा सकती है।

कुल मिलाकर नैनीताल की पहाड़ियों को लेकर सामने आया सैटेलाइट अध्ययन एक चेतावनी संकेत के तौर पर महत्वपूर्ण है। इसमें सात साल के डेटा से बड़े हिस्से में जमीन की सतही हलचल दर्ज हुई है और जोखिम आकलन में 24.9 प्रतिशत क्षेत्र हाई-हैजार्ड तथा 59.6 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम जोखिम वाला पाया गया है। साथ ही वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट किया है कि जमीन की हलचल अपने आप में यह साबित नहीं करती कि किसी स्थान पर भूस्खलन कब होगा। इसके लिए लगातार निगरानी और जमीन पर वैज्ञानिक जांच जरूरी है। नैनीताल जैसे घनी आबादी और पर्यटन वाले पहाड़ी शहर में सैटेलाइट निगरानी, भूगर्भीय सर्वेक्षण, बारिश की मॉनिटरिंग और सुरक्षित निर्माण योजना को साथ लेकर चलना भविष्य के जोखिमों को समझने और कम करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।

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