झंडूआ' कहकर चिढ़ाने वाले आज सम्मान से 'झंडू जी' कहते हैं कॉमनवेल्थ में उतरेंगे नालंदा के खिलाड़ी, मां बोलीं अब कोई मुझे सब्जी वाली नहीं कहता

नालंदा के खिलाड़ी ने संघर्ष के दम पर कॉमनवेल्थ तक का सफर तय किया। कभी 'झंडूआ' कहकर चिढ़ाया जाता था, आज लोग सम्मान से 'झंडू जी' कहते हैं।
झंडूआ' कहकर चिढ़ाने वाले आज सम्मान से 'झंडू जी' कहते हैं कॉमनवेल्थ में उतरेंगे नालंदा के खिलाड़ी, मां बोलीं अब कोई मुझे सब्जी वाली नहीं कहता
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कभी गांव और आसपास के लोग उन्हें 'झंडूआ' कहकर चिढ़ाते थे। नाम को लेकर मजाक उड़ाया जाता था और उनके खेल के सपनों को भी गंभीरता से नहीं लिया जाता था। लेकिन आज वही खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करते हुए कॉमनवेल्थ प्रतियोगिता में उतरने जा रहे हैं। उनकी इस उपलब्धि ने न सिर्फ परिवार बल्कि पूरे नालंदा जिले का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।

इस खिलाड़ी की सफलता की कहानी संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की मिसाल है। सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया। अभ्यास के लिए कई बार लंबी दूरी तय करनी पड़ी, बेहतर सुविधाएं नहीं मिलीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वर्षों की मेहनत का ही नतीजा है कि आज वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

उनकी मां की आंखों में बेटे की सफलता की खुशी साफ दिखाई देती है। भावुक होकर उन्होंने कहा, "पहले लोग मुझे सब्जी वाली कहकर बुलाते थे। अब वही लोग सम्मान देते हैं। आज कोई मुझे उस नाम से नहीं बुलाता, बल्कि मेरे बेटे की उपलब्धि पर गर्व जताता है।" उन्होंने बताया कि परिवार ने कठिन परिस्थितियों में भी बेटे के सपनों को टूटने नहीं दिया और हर कदम पर उसका साथ दिया।

परिवार के अनुसार, आर्थिक तंगी के कारण कई बार खेल छोड़ने की नौबत भी आई। खेल का सामान जुटाना, प्रतियोगिताओं में भाग लेने का खर्च उठाना और नियमित प्रशिक्षण जारी रखना आसान नहीं था। इसके बावजूद परिवार ने अपनी जरूरतों में कटौती कर बेटे के सपनों को प्राथमिकता दी। मां ने सब्जी बेचकर घर चलाया, जबकि परिवार के अन्य सदस्यों ने भी हर संभव सहयोग किया।

आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। कभी जिन लोगों ने उनका मजाक उड़ाया था, वही अब सम्मान से "झंडू जी" कहकर संबोधित करते हैं। गांव के बच्चे उन्हें अपना आदर्श मानते हैं और उनसे प्रेरणा लेकर खेलों में आगे बढ़ने का सपना देख रहे हैं। परिवार का कहना है कि यह सम्मान वर्षों की मेहनत और संघर्ष का परिणाम है।

कॉमनवेल्थ प्रतियोगिता में उनका मुकाबला मजबूत अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से होगा। पूरे जिले और राज्य की निगाहें उनके प्रदर्शन पर टिकी हैं। स्थानीय लोगों ने उम्मीद जताई है कि वे शानदार प्रदर्शन कर देश के लिए पदक जीतेंगे और बिहार का नाम अंतरराष्ट्रीय मंच पर और ऊंचा करेंगे।

उनकी सफलता यह साबित करती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए तो मंजिल जरूर मिलती है। नालंदा के इस खिलाड़ी की कहानी आज हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस रखते हैं।

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