कभी गांव और आसपास के लोग उन्हें 'झंडूआ' कहकर चिढ़ाते थे। नाम को लेकर मजाक उड़ाया जाता था और उनके खेल के सपनों को भी गंभीरता से नहीं लिया जाता था। लेकिन आज वही खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करते हुए कॉमनवेल्थ प्रतियोगिता में उतरने जा रहे हैं। उनकी इस उपलब्धि ने न सिर्फ परिवार बल्कि पूरे नालंदा जिले का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।
इस खिलाड़ी की सफलता की कहानी संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की मिसाल है। सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया। अभ्यास के लिए कई बार लंबी दूरी तय करनी पड़ी, बेहतर सुविधाएं नहीं मिलीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वर्षों की मेहनत का ही नतीजा है कि आज वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
उनकी मां की आंखों में बेटे की सफलता की खुशी साफ दिखाई देती है। भावुक होकर उन्होंने कहा, "पहले लोग मुझे सब्जी वाली कहकर बुलाते थे। अब वही लोग सम्मान देते हैं। आज कोई मुझे उस नाम से नहीं बुलाता, बल्कि मेरे बेटे की उपलब्धि पर गर्व जताता है।" उन्होंने बताया कि परिवार ने कठिन परिस्थितियों में भी बेटे के सपनों को टूटने नहीं दिया और हर कदम पर उसका साथ दिया।











