इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि उनका देश अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के इशारों पर काम नहीं करता। उन्होंने लेबनान से सेना हटाने से इनकार किया, जबकि स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का नया दौर शुरू हुआ।
यरूशलम/वॉशिंगटन: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कहा है कि उनकी सरकार किसी भी बाहरी दबाव में फैसले नहीं लेती और इजराइल अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर काम करता है। उन्होंने उन धारणाओं को खारिज किया कि इजराइल की नीतियां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के निर्देशों पर तय होती हैं। वहीं दूसरी ओर स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का दूसरा दौर शुरू हो गया है, जिससे क्षेत्र में कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।
यरुशलम में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए नेतन्याहू ने कहा कि अमेरिका और इजराइल के संबंध बेहद मजबूत हैं, लेकिन दोनों देशों के अपने-अपने रणनीतिक हित हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग अमेरिका में मानते हैं कि ट्रम्प इजराइल की सलाह पर फैसले लेते हैं, जबकि इजराइल में कुछ लोग सोचते हैं कि वह ट्रम्प के निर्देशों का पालन करते हैं। उनके अनुसार दोनों ही धारणाएं वास्तविकता से दूर हैं।
प्रधानमंत्री ने दोहराया कि इजराइल किसी भी स्थिति में ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। उन्होंने कहा कि यह इजराइल की सुरक्षा नीति का मूल हिस्सा है और इस विषय पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। नेतन्याहू का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम तथा क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई वार्ताएं चल रही हैं।
दक्षिणी लेबनान से सेना हटाने के संकेत नहीं
नेतन्याहू ने दक्षिणी लेबनान में इजराइली सैन्य उपस्थिति को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि जब तक सुरक्षा एजेंसियां इसे आवश्यक समझेंगी, तब तक इजराइली सेना वहां तैनात रहेगी। यह बयान ऐसे समय आया है जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय लेबनान में स्थायी युद्धविराम और तनाव कम करने की कोशिशों में जुटा हुआ है।
इजराइल का मानना है कि हिजबुल्लाह अब भी उसकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है। दूसरी ओर लेबनान और ईरान लगातार इजराइल पर सैन्य कार्रवाई रोकने का दबाव बना रहे हैं। हाल के महीनों में सीमा क्षेत्रों में कई बार संघर्ष और रॉकेट हमलों की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बनी हुई है।
अमेरिका-ईरान वार्ता में आगे बढ़ने की कोशिश
स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत का दूसरा दिन शुरू हो चुका है। पहले दिन करीब 80 मिनट तक चली वार्ता को दोनों पक्षों ने सावधानीपूर्वक सकारात्मक बताया था, हालांकि कई अहम मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं।
मध्यस्थ देशों पाकिस्तान और कतर की मौजूदगी में हुई बैठक का मुख्य उद्देश्य 60 दिन के अस्थायी युद्धविराम को दीर्घकालिक शांति समझौते में बदलना है। सूत्रों के अनुसार दोनों पक्षों ने एक रोडमैप तैयार करने पर सहमति जताई है, जिसके तहत अगले दो महीनों में व्यापक समझौते तक पहुंचने का प्रयास किया जाएगा।
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वार्ता के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि बातचीत में प्रगति हुई है और दोनों देश यदि सकारात्मक रवैया बनाए रखें तो क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया की राजनीतिक तस्वीर बदल सकती है।
ट्रम्प की चेतावनी से बढ़ा तनाव
बातचीत शुरू होने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा था कि वह लेबनान में अपने सहयोगी संगठन हिजबुल्लाह की गतिविधियों को नियंत्रित करे। ट्रम्प ने संकेत दिया कि यदि क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ी तो अमेरिका पहले से अधिक सख्त कदम उठा सकता है।
इस बयान के बाद ईरानी प्रतिनिधिमंडल की नाराजगी की खबरें भी सामने आईं। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने इन रिपोर्टों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया और कहा कि वार्ता प्रक्रिया जारी है। कूटनीतिक सूत्रों का मानना है कि दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से कड़े बयान दे रहे हैं, लेकिन बातचीत को पूरी तरह विफल नहीं होने देना चाहते।
परमाणु कार्यक्रम सबसे बड़ा मुद्दा
अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ी चुनौती परमाणु कार्यक्रम को लेकर बनी हुई है। 2015 के परमाणु समझौते के तहत ईरान ने यूरेनियम संवर्धन पर कई सीमाएं स्वीकार की थीं, लेकिन 2018 में अमेरिका के समझौते से बाहर निकलने के बाद हालात बदल गए।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्टों के अनुसार ईरान ने हाल के वर्षों में यूरेनियम संवर्धन का स्तर काफी बढ़ाया है। अमेरिका और उसके सहयोगियों को आशंका है कि इससे परमाणु हथियार निर्माण की क्षमता विकसित हो सकती है। वहीं ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण और ऊर्जा जरूरतों के लिए है।
तेल, प्रतिबंध और क्षेत्रीय सुरक्षा भी एजेंडे में
वार्ता केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित नहीं है। ईरान लंबे समय से अपने तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में राहत चाहता है। साथ ही विदेशों में जमी उसकी अरबों डॉलर की संपत्तियों को मुक्त कराने का मुद्दा भी बातचीत का हिस्सा बना हुआ है।
इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा, लेबनान में संघर्ष को नियंत्रित करना और क्षेत्रीय स्थिरता कायम रखना भी एजेंडे में शामिल है। दोनों देशों ने विशेषज्ञ स्तर की अलग-अलग टीमों के गठन पर भी सहमति जताई है, जो तकनीकी और आर्थिक मुद्दों पर विस्तृत चर्चा करेंगी।
पश्चिम एशिया की राजनीति पर नजर
नेतन्याहू के बयान और अमेरिका-ईरान वार्ता का नया दौर ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम एशिया कई मोर्चों पर तनाव झेल रहा है। लेबनान, गाजा, होर्मुज जलडमरूमध्य और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे वैश्विक सुरक्षा और ऊर्जा बाजारों को प्रभावित कर रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच किसी प्रारंभिक समझौते की दिशा में प्रगति होती है तो क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है। हालांकि इजराइल की सुरक्षा चिंताएं और हिजबुल्लाह से जुड़ा विवाद अब भी बड़ी बाधा बने हुए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों की वार्ताएं यह तय करेंगी कि पश्चिम एशिया संघर्ष की ओर बढ़ता है या कूटनीति के जरिए स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ता है।












