Nitin Gadkari से फोन पर 100 करोड़ रुपये की फिरौती मांगने के मामले में दोषी पाए गए जयेश पुजारी को अदालत ने 5 साल की सजा सुनाई है। नागपुर
जिला एवं सत्र न्यायालय ने मामले की सुनवाई के बाद आरोपी को दोषी करार देते हुए यह फैसला सुनाया। ज
नई दिल्ली: केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री Nitin Gadkari को जान से मारने की धमकी देने और 100 करोड़ रुपये की फिरौती मांगने के मामले में नागपुर जिला एवं सत्र न्यायालय ने दोषी जयेश पुजारी को पांच साल की सजा सुनाई है। अदालत के इस फैसले को राजनीतिक हस्तियों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
जयेश पुजारी ने कथित तौर पर केंद्रीय मंत्री के कार्यालय में फोन कर भारी रकम की मांग की थी और फिरौती नहीं मिलने पर बम विस्फोट के जरिए हत्या की धमकी दी थी। अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद विभिन्न आपराधिक धाराओं के तहत उसे दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला उस समय सामने आया था जब केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के नागपुर स्थित कार्यालय में कई धमकी भरे फोन कॉल आए थे। जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपी जयेश पुजारी ने मंत्री के कार्यालय में फोन कर पहले 100 करोड़ रुपये और बाद में 10 करोड़ रुपये की फिरौती मांगी थी। आरोपी ने कथित तौर पर धमकी दी थी कि यदि उसकी मांग पूरी नहीं की गई तो वह मंत्री को बम विस्फोट के जरिए नुकसान पहुंचाएगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस प्रशासन ने तत्काल जांच शुरू की थी।
जांच में सामने आया कि जयेश पुजारी उस समय कर्नाटक की एक जेल में बंद था और हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा था। आरोप है कि उसने जेल के भीतर से मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर यह धमकी दी थी।

जेल से चलाया गया धमकी का नेटवर्क
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी ने जेल प्रशासन की निगरानी को दरकिनार करते हुए मोबाइल फोन तक पहुंच बनाई और उसी के जरिए मंत्री कार्यालय से संपर्क किया। इस घटना ने जेल सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए थे। मामले की जांच के दौरान कॉल रिकॉर्ड, तकनीकी साक्ष्य और अन्य डिजिटल प्रमाण अदालत में पेश किए गए। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपी ने सुनियोजित तरीके से फिरौती और धमकी की साजिश रची थी।
नागपुर जिला सत्र न्यायालय ने सभी सबूतों और गवाहों के आधार पर जयेश पुजारी को दोषी करार दिया और पांच साल की सजा सुनाई। इस मामले ने एक बार फिर देश में वीआईपी सुरक्षा और जेलों के भीतर से अपराध संचालन के मुद्दे को चर्चा में ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जेलों में मोबाइल फोन की उपलब्धता और संगठित अपराध से जुड़े नेटवर्क सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।











