नोटबंदी से जुड़ा बड़ा फैसला: ₹3.2 करोड़ जमा न लेने पर बैंक को करना होगा ब्याज सहित भुगतान

नोटबंदी से जुड़े मामले में हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। यदि बैंक ₹3.2 करोड़ जमा नहीं लेता, तो उसे ब्याज सहित राशि का भुगतान करना होगा। जानिए पूरा केस और

भारत में 2016 की नोटबंदी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में उपभोक्ता आयोग ने बड़ा फैसला सुनाया है। National Consumer Disputes Redressal Commission ने निजी क्षेत्र के Axis Bank को आदेश दिया है कि वह एक कंपनी को लगभग 3.2 करोड़ रुपये की राशि 6 प्रतिशत ब्याज के साथ वापस करे।

बिजनेस न्यूज़: Axis Bank ने 2016 में नोटबंदी के दौरान दिल्ली की एक कंपनी की 3.2 करोड़ रुपये नकद जमा करने से मना कर दिया था। यह निर्णय बैंक के लिए महंगा साबित हुआ। National Consumer Disputes Redressal Commission ने बैंक को यह राशि 6 प्रतिशत ब्याज के साथ कंपनी को देने का आदेश दिया है। नोटबंदी की डेडलाइन खत्म होने के बाद यह पैसा बैंक में जमा नहीं होने के कारण अप्रचलित हो गया और कंपनी को इससे भारी नुकसान हुआ।

सरकार ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा करते हुए 500 और 1000 रुपये के नोट बंद कर दिए थे। इस फैसले के कारण कंपनियों और आम जनता को तत्काल नकदी संकट का सामना करना पड़ा था, और इस मामले में बैंक की लापरवाही पर कानूनी कार्रवाई की गई है।

नोटबंदी के दौरान जमा नहीं हुआ कैश

यह मामला दिल्ली स्थित कंपनी Procure Logistics Services Private Limited से जुड़ा है। कंपनी ने नोटबंदी के दौरान अपने बैंक खाते में बड़ी मात्रा में नकदी जमा करने की कोशिश की थी, लेकिन बैंक ने इसे स्वीकार नहीं किया। 8 नवंबर 2016 को भारत सरकार ने ₹500 और ₹1000 के पुराने नोट बंद करने की घोषणा की थी। इसके बाद लोगों को तय समय सीमा के भीतर पुराने नोट बैंक में जमा करने की अनुमति दी गई थी।

कंपनी का कहना था कि उसके पास वैध व्यवसाय से प्राप्त नकदी थी और वह उसे अपने ही बैंक खाते में जमा करना चाहती थी, लेकिन बैंक ने इसे “संदिग्ध” बताते हुए जमा लेने से मना कर दिया।

बैंक ने खाते को बताया हाई-रिस्क

नोटबंदी से जुड़ा बड़ा फैसला: ₹3.2 करोड़ जमा न लेने पर बैंक को करना होगा ब्याज सहित भुगतान

मामले की सुनवाई के दौरान बैंक ने आयोग के सामने दलील दी कि कंपनी का खाता जोखिमपूर्ण श्रेणी में था और बड़ी रकम जमा होने पर संदेह था। हालांकि आयोग ने कहा कि बैंक ने बिना किसी सक्षम प्राधिकारी के आदेश के एकतरफा फैसला लिया और ग्राहक को अपने ही खाते में पैसा जमा करने से रोक दिया।आयोग ने अपने आदेश में कहा कि यदि बैंक को नकदी पर शक था, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत रकम जमा करनी चाहिए थी और बाद में संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी देनी चाहिए थी।

आयोग ने स्पष्ट कहा कि बैंक ने सरकार की नीतियों और रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों का सही तरीके से पालन नहीं किया। आदेश में कहा गया कि:

  • कंपनी का केवाईसी पूरा था
  • खाता वैध था
  • जमा करने की अनुमति देने से पहले कोई वैधानिक रोक नहीं थी

इसके बावजूद बैंक ने जमा स्वीकार नहीं किया, जिससे कंपनी को भारी आर्थिक नुकसान हुआ।

3.2 करोड़ रुपये हुए बेकार

रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने नोटबंदी की समय सीमा के दौरान अलग-अलग तारीखों में करीब 1.3 करोड़ रुपये जमा कर दिए थे, लेकिन बाकी रकम जमा करने से रोक दिया गया। इसके कारण लगभग ₹3,19,58,500 की राशि समय सीमा खत्म होने के बाद चलन से बाहर हो गई और कंपनी के लिए बेकार हो गई।

आयोग ने इसे बैंक की लापरवाही मानते हुए आदेश दिया कि बैंक को पूरी राशि के साथ 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला नोटबंदी से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि बैंक ग्राहकों के अधिकारों की अनदेखी नहीं कर सकते, खासकर तब जब ग्राहक सरकारी नियमों का पालन कर रहा हो।

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