महानदी बेसिन में ONGC की गैस खोज में IIT ISM धनबाद के 5 एलुमनाई: 1,441 मीटर गहराई पर मिली गैस

: महानदी ऑफशोर बेसिन में ONGC की गैस खोज में IIT ISM धनबाद के पांच पूर्व छात्रों ने योगदान दिया। 1,441 से 1,452 मीटर गहराई पर गैस मिली है।
महानदी बेसिन में ONGC की गैस खोज में IIT ISM धनबाद के 5 एलुमनाई: 1,441 मीटर गहराई पर मिली गैस
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ओडिशा तट के पास महानदी ऑफशोर बेसिन में ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन यानी ONGC की ओर से की गई प्राकृतिक गैस की खोज देश के ऑफशोर एक्सप्लोरेशन सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। खास बात यह है कि इस खोज से जुड़े मल्टीडिसिप्लिनरी ऑपरेशन में IIT (ISM) धनबाद के पांच पूर्व छात्रों ने भी अलग-अलग तकनीकी जिम्मेदारियां संभालीं। इन विशेषज्ञों ने ड्रिलिंग, जियोलॉजी और प्रोडक्शन से जुड़े काम में अपनी भूमिका निभाई। यह खोज भारत सरकार की ‘समुद्र मंथन’ पहल के तहत महानदी बेसिन में ONGC की ओर से ड्रिल किए गए पहले कुएं से जुड़ी है।

ONGC ने 18 सितंबर को महानदी बेसिन के MN-DW18-1-H-D वेल में गैस मिलने की जानकारी दी थी। इस कुएं को करीब 1,623 मीटर की टारगेट डेप्थ तक ड्रिल किया गया था। ड्रिलिंग के दौरान 1,441 से 1,452 मीटर के बीच गैस मिलने के संकेत मिले। यह ऑफशोर लोकेशन कोणार्क से करीब 43 किलोमीटर दूर बताई गई है। शुरुआती फ्लो टेस्ट में गैस फ्लो और रिजर्वायर प्रेशर को लेकर उत्साहजनक संकेत मिले हैं, लेकिन इस खोज की वास्तविक क्षमता और व्यावसायिक उपयोगिता का आकलन आगे होने वाली अप्रेजल गतिविधियों के बाद किया जाएगा।

इस पूरे ऑपरेशन में IIT (ISM) धनबाद के पांच एलुमनाई अलग-अलग प्रोफेशनल भूमिकाओं में ONGC की टीम का हिस्सा रहे। इनमें आसिफ एमवी, बीटेक पेट्रोलियम इंजीनियरिंग, सीनियर एग्जीक्यूटिव ड्रिलिंग; कुमार अंकित, बीटेक पेट्रोलियम इंजीनियरिंग, सीनियर एग्जीक्यूटिव ड्रिलिंग; अनिल कुमार बधाई, एमएससी टेक एप्लाइड जियोलॉजी, सीनियर जियोलॉजिस्ट; बिबेकानंद बारिक, एमएससी टेक एप्लाइड जियोलॉजी, सीनियर जियोलॉजिस्ट और अंकित चौधरी, बीटेक मैकेनिकल इंजीनियरिंग, असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव इंजीनियर प्रोडक्शन शामिल हैं। पांचों ने अपनी-अपनी विशेषज्ञता के अनुसार इस जटिल एक्सप्लोरेशन ऑपरेशन में योगदान दिया।

डीपवॉटर में प्राकृतिक गैस की खोज एक बहु-विषयक प्रक्रिया होती है। इसमें सिर्फ ड्रिलिंग करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि भूगर्भीय संरचना को समझना, संभावित हाइड्रोकार्बन क्षेत्र की पहचान करना, कुएं की डिजाइन और ड्रिलिंग प्रक्रिया को सुरक्षित तरीके से पूरा करना तथा गैस मिलने के बाद उत्पादन से जुड़ी तकनीकी व्यवस्था को समझना भी जरूरी होता है। महानदी बेसिन में हुए इस ऑपरेशन में पेट्रोलियम इंजीनियरिंग, एप्लाइड जियोलॉजी और मैकेनिकल इंजीनियरिंग से जुड़े विशेषज्ञों की भागीदारी इसी तकनीकी समन्वय को दर्शाती है।

IIT (ISM) धनबाद लंबे समय से पेट्रोलियम इंजीनियरिंग, जियोलॉजी, जियोफिजिक्स और खनिज एवं ऊर्जा क्षेत्र के लिए तकनीकी विशेषज्ञ तैयार करता रहा है। संस्थान की स्थापना 1926 में इंडियन स्कूल ऑफ माइंस के रूप में हुई थी और बाद में इसे IIT का दर्जा मिला। इसके अकादमिक कार्यक्रमों में पेट्रोलियम इंजीनियरिंग और एप्लाइड जियोलॉजी जैसे विषय लंबे समय से शामिल रहे हैं। ऐसे में ONGC के इस बड़े ऑफशोर एक्सप्लोरेशन ऑपरेशन में संस्थान के पूर्व छात्रों की भागीदारी उसके इंडस्ट्री कनेक्शन और तकनीकी प्रशिक्षण की झलक देती है।

महानदी बेसिन में हुई यह खोज भारत सरकार की ‘समुद्र मंथन’ पहल के व्यापक उद्देश्य से भी जुड़ी है। इस पहल के तहत देश के डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य ऑफशोर एक्सप्लोरेशन में आने वाले जोखिम और ड्रिलिंग लागत को कम करने के साथ घरेलू स्तर पर तेल और गैस संसाधनों की तलाश को गति देना है। रिपोर्ट के अनुसार इस पहल के तहत करीब 84,000 करोड़ रुपये का वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराया गया है।

ओडिशा तट के पास महानदी ऑफशोर बेसिन भौगोलिक और तकनीकी दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। समुद्र के भीतर गहरे पानी में ड्रिलिंग करने के लिए विशेष तकनीक, प्रशिक्षित इंजीनियरों और भूगर्भीय जानकारी की आवश्यकता होती है। किसी संभावित गैस रिजर्व तक पहुंचने के लिए पहले क्षेत्र की संरचना और उपलब्ध डेटा का अध्ययन किया जाता है। इसके बाद ड्रिलिंग लोकेशन तय होती है और फिर चरणबद्ध तरीके से कुएं की खुदाई की जाती है। इस प्रक्रिया में छोटी सी तकनीकी चूक भी ऑपरेशन को प्रभावित कर सकती है, इसलिए अलग-अलग विशेषज्ञों की टीम मिलकर काम करती है।

महानदी बेसिन के इस कुएं में 1,441 से 1,452 मीटर के बीच गैस मिलने के बाद अब आगे की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। शुरुआती फ्लो टेस्ट में सकारात्मक संकेत मिले हैं, लेकिन किसी गैस खोज को व्यावसायिक उत्पादन में बदलने से पहले कई तकनीकी और आर्थिक पहलुओं की जांच करनी होती है। रिजर्वायर में गैस की मात्रा, दबाव, उत्पादन क्षमता, क्षेत्र का विस्तार और भविष्य में कितने कुएं विकसित किए जा सकते हैं, जैसे पहलुओं का अध्ययन अप्रेजल गतिविधियों के दौरान किया जाएगा। इसलिए अभी इसे अंतिम व्यावसायिक उत्पादन क्षमता के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।

ONGC के लिए भी यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कंपनी लगातार देश के समुद्री क्षेत्रों में नए हाइड्रोकार्बन संसाधनों की तलाश कर रही है। गहरे समुद्र में एक्सप्लोरेशन सामान्य जमीन आधारित ड्रिलिंग की तुलना में अधिक तकनीकी और पूंजीगत चुनौती वाला काम होता है। ऐसे क्षेत्रों में आधुनिक ड्रिलिंग उपकरणों के साथ भूगर्भीय विश्लेषण और रिजर्वायर मूल्यांकन की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। महानदी बेसिन में मिली गैस के बाद आगे होने वाली अप्रेजल गतिविधियों से इस खोज की वास्तविक क्षमता को समझने में मदद मिलेगी।

IIT ISM के पांच एलुमनाई ने भी इस उपलब्धि को किसी एक व्यक्ति की सफलता के बजाय पूरी ONGC की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम का सामूहिक प्रयास बताया है। ड्रिलिंग से जुड़े अधिकारियों, जियोलॉजिस्ट और प्रोडक्शन इंजीनियरों ने अपनी-अपनी जिम्मेदारियों के तहत काम किया। इस तरह की परियोजनाओं में अलग-अलग तकनीकी क्षेत्रों के विशेषज्ञों का एक साथ काम करना जरूरी होता है, क्योंकि कुएं की योजना से लेकर ड्रिलिंग और गैस मिलने के बाद उसके मूल्यांकन तक हर चरण एक-दूसरे से जुड़ा होता है।

IIT ISM धनबाद के लिए भी यह उपलब्धि इसलिए खास है क्योंकि संस्थान के पूर्व छात्रों ने देश की एक महत्वपूर्ण ऊर्जा खोज से जुड़े वास्तविक फील्ड ऑपरेशन में योगदान दिया है। पेट्रोलियम इंजीनियरिंग से जुड़े दो एलुमनाई ड्रिलिंग टीम में रहे, जबकि एप्लाइड जियोलॉजी के दो विशेषज्ञ जियोलॉजिस्ट के रूप में जुड़े रहे। वहीं मैकेनिकल इंजीनियरिंग से पढ़े अंकित चौधरी ने प्रोडक्शन से जुड़े काम में जिम्मेदारी संभाली। पांचों की अलग-अलग विशेषज्ञता ने इस पूरे ऑपरेशन में तकनीकी टीमवर्क को मजबूत किया।

भारत की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए घरेलू स्तर पर तेल और प्राकृतिक गैस के नए स्रोतों की तलाश लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में मदद मिल सकती है, हालांकि किसी एक गैस खोज का व्यापक ऊर्जा बाजार पर असर उसकी उत्पादन क्षमता और व्यावसायिक विकास के बाद ही आंका जा सकता है। महानदी बेसिन की इस खोज से फिलहाल एक नए संभावित गैस संसाधन की पहचान हुई है और आगे की जांच इस संसाधन की वास्तविक क्षमता बताएगी।

इस खोज के पीछे जिस तकनीकी टीम ने काम किया, उसमें IIT ISM धनबाद के पूर्व छात्रों की भागीदारी संस्थान के लिए भी उपलब्धि का विषय बनी है। संस्थान ने अपने एलुमनाई और पूरी ONGC टीम को इस काम के लिए बधाई दी है। यह ऑपरेशन यह भी दिखाता है कि पेट्रोलियम इंजीनियरिंग, जियोलॉजी और मैकेनिकल इंजीनियरिंग जैसे अलग-अलग तकनीकी विषय किस तरह एक ही ऊर्जा परियोजना में एक साथ काम करते हैं।

अब महानदी ऑफशोर बेसिन में आगे की अप्रेजल गतिविधियां इस खोज की तस्वीर और स्पष्ट करेंगी। फिलहाल शुरुआती फ्लो टेस्ट में गैस प्रवाह और रिजर्वायर प्रेशर के संकेत उत्साहजनक बताए गए हैं, लेकिन गैस की व्यावसायिक क्षमता का अंतिम आकलन अभी बाकी है। 1,623 मीटर की टारगेट डेप्थ तक ड्रिल किए गए इस कुएं में 1,441 से 1,452 मीटर के बीच गैस मिलने के बाद ONGC और संबंधित तकनीकी टीम आगे के मूल्यांकन पर काम करेगी। इस पूरी प्रक्रिया में IIT ISM धनबाद के पांच पूर्व छात्रों का योगदान संस्थान और झारखंड के लिए भी एक उल्लेखनीय उपलब्धि के रूप में सामने आया है।

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