मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ बयान पर चिदंबरम का पलटवार, बोले- मुझे दिमागी नक्सली होने पर गर्व

पी. चिदंबरम ने मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें इस नाम से पुकारे जाने पर गर्व है। कांग्रेस ने मोदी के बयान को राजनीतिक हमले बताया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में ‘दिमागी नक्सलियों’ से देश को सतर्क रहने की अपील पर कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सली’ होने पर गर्व है। कांग्रेस ने भी पीएम के बयान की आलोचना की।

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिए गए ‘दिमागी नक्सली’ बयान को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने पीएम मोदी की टिप्पणी पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सली’ कहे जाने पर गर्व है। चिदंबरम की यह प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री के 15 अगस्त को लाल किले से दिए गए संबोधन के एक दिन बाद सामने आई। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में देश को ऐसी मानसिकता रखने वाले लोगों से सतर्क रहने की अपील की थी, जिन्हें उन्होंने ‘दिमागी नक्सली’ कहा। उन्होंने कहा था कि नक्सलवाद का सशस्त्र रूप कमजोर हुआ है, लेकिन ऐसी विचारधारा अब भी अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूद हो सकती है। मोदी ने नागरिकों से ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने की अपील भी की थी।

चिदंबरम ने पीएम के बयान पर साधा निशाना

पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी को राजनीतिक रूप से तीखा हमला माना और उसी अंदाज में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि यदि सत्ता के खिलाफ सवाल उठाना, असहमति व्यक्त करना या सरकार की नीतियों की आलोचना करना ‘दिमागी नक्सली’ कहलाने का आधार है, तो उन्हें इस पहचान पर गर्व है।

चिदंबरम की टिप्पणी को विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री के भाषण पर सबसे स्पष्ट प्रतिक्रियाओं में से एक माना जा रहा है। उनके बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर बहस और तेज हो गई है।

प्रधानमंत्री के बयान और चिदंबरम के जवाब के बीच मूल विवाद यही है कि सरकार जिस ‘नक्सली मानसिकता’ की बात कर रही है, विपक्ष उसे राजनीतिक असहमति को निशाना बनाने वाली भाषा के तौर पर देख रहा है।

लाल किले से पीएम मोदी ने क्या कहा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में नक्सलवाद और माओवादी हिंसा को देश के सामने लंबे समय से मौजूद चुनौती के रूप में पेश किया। उन्होंने कहा कि सशस्त्र नक्सलवाद ने देश के कई हिस्सों और बड़ी आबादी को हिंसा और भय के वातावरण में रखा।

प्रधानमंत्री ने दावा किया कि माओवादी सोच रखने वाले कुछ लोग लंबे समय तक सत्ता और सरकारी संस्थानों के आसपास प्रभावशाली भूमिका में रहे। उनके मुताबिक ऐसे लोगों ने समितियों और नीतिगत प्रक्रियाओं के जरिए व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश की।

मोदी ने देशवासियों से इस चुनौती को कम करके नहीं आंकने और सतर्क रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद और माओवादी हिंसा के चलते बड़ी संख्या में युवाओं के सपने प्रभावित हुए और सुरक्षा बलों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी।

सुरक्षा बलों की कुर्बानी का किया उल्लेख

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद के खिलाफ संघर्ष में जान गंवाने वाले पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों के जवानों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस लंबे संघर्ष में 3,500 से अधिक सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं।

प्रधानमंत्री के मुताबिक नक्सली हिंसा का प्रभाव केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के विकास और सामान्य नागरिकों के जीवन पर भी पड़ा। उन्होंने नक्सलवाद को ऐसी चुनौती बताया जिससे निपटने के लिए सुरक्षा कार्रवाई के साथ वैचारिक स्तर पर भी सतर्कता जरूरी है।

यही वह संदर्भ था जिसमें उन्होंने ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया। उनके भाषण का यह हिस्सा राजनीतिक बहस का प्रमुख केंद्र बन गया है।

कांग्रेस ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को बताया खोखला

कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि सरकार कई बार असहमति जताने वाले लोगों या विपक्ष की मांगों को अलग-अलग राजनीतिक लेबल देती रही है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि ‘दिमागी नक्सल’ जैसा शब्द एक खोखला राजनीतिक आरोप है।

उन्होंने प्रधानमंत्री के भाषण को पुराने राजनीतिक तर्कों का विस्तार बताते हुए कहा कि इसमें विपक्ष की वैध मांगों को पहले खारिज करने और बाद में उन्हें स्वीकार करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। उनका आरोप था कि सरकार पहले विरोधियों की मांगों को अपमानजनक नाम देती है और समय बीतने के बाद उन्हीं मुद्दों को अपनी नीति का हिस्सा बना लेती है।

जाति जनगणना का उदाहरण देकर कांग्रेस का हमला

जयराम रमेश ने अपने जवाब में जाति आधारित जनगणना का उदाहरण दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि जब कांग्रेस और विपक्ष की ओर से जाति जनगणना की मांग उठाई गई थी, तब उसे भी एक तरह की ‘अर्बन नक्सल’ मानसिकता से जोड़कर देखा गया था।

कांग्रेस नेता के मुताबिक बाद में केंद्र सरकार ने जाति आधारित जनगणना कराने की दिशा में कदम उठाया। उन्होंने इसे सरकार की विरोधियों की मांगों को पहले राजनीतिक रूप से खारिज करने और बाद में उन्हें स्वीकार करने की नीति का उदाहरण बताया।

रमेश ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री के भाषण में 12 साल बाद भी कोई विशेष नई राजनीतिक दिशा दिखाई नहीं दी। उन्होंने सरकार पर पुराने मुद्दों और राजनीतिक शब्दावली को दोहराने का आरोप लगाया।

‘दिमागी नक्सली’ शब्द बना नया राजनीतिक मुद्दा

प्रधानमंत्री के भाषण में इस्तेमाल किया गया ‘दिमागी नक्सली’ शब्द अब भारतीय राजनीति में नई बहस का विषय बन गया है। सत्तारूढ़ पक्ष इसे उन लोगों के लिए इस्तेमाल कर रहा है जो माओवादी विचारधारा या नक्सली मानसिकता को वैचारिक स्तर पर समर्थन देते हैं।

विपक्ष दूसरी ओर इसे व्यापक और अस्पष्ट राजनीतिक लेबल मान रहा है। कांग्रेस का तर्क है कि लोकतंत्र में सरकार के खिलाफ सवाल उठाना, नीतियों की आलोचना करना और वैकल्पिक विचार रखना राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

यही मतभेद इस पूरे विवाद को सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं रहने दे रहा है। यह बहस अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक असहमति और राष्ट्र की सुरक्षा जैसे व्यापक मुद्दों तक पहुंच गई है।

कांग्रेस और बीजेपी के बीच पुराना ‘अर्बन नक्सल’ विवाद

भारत की राजनीति में ‘अर्बन नक्सल’ शब्द पिछले कुछ वर्षों में कई बार राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है। आम तौर पर इसका इस्तेमाल ऐसे शहरी बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं या विचारधारा समर्थकों के लिए किया जाता रहा है जिन पर माओवादी आंदोलन के वैचारिक समर्थन या उससे जुड़े होने के आरोप लगाए गए।

हालांकि, इस शब्द की सटीक कानूनी या संवैधानिक परिभाषा नहीं है। इसी वजह से इसके इस्तेमाल को लेकर भी विवाद होता रहा है। सरकार समर्थक पक्ष इसे माओवादी विचारधारा के प्रभाव के रूप में देखता है, जबकि आलोचक मानते हैं कि इसका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने के लिए किया जाता है।

अब प्रधानमंत्री द्वारा ‘दिमागी नक्सली’ शब्द के इस्तेमाल ने इसी पुराने विवाद को एक नए राजनीतिक संदर्भ में सामने ला दिया है।

चिदंबरम की टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है?

पी. चिदंबरम लंबे समय तक केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं और कांग्रेस के प्रमुख नीति-निर्माताओं में गिने जाते हैं। वह गृह मंत्री और वित्त मंत्री समेत कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का नेतृत्व कर चुके हैं। इसलिए प्रधानमंत्री के बयान पर उनकी तीखी प्रतिक्रिया को कांग्रेस की व्यापक राजनीतिक रणनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

चिदंबरम का जवाब यह संकेत देता है कि कांग्रेस इस मुद्दे को केवल व्यक्तिगत राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रखना चाहती। पार्टी इसे लोकतांत्रिक असहमति और सरकार की आलोचना के अधिकार से जोड़कर पेश कर रही है।

दूसरी ओर, बीजेपी का तर्क यह है कि प्रधानमंत्री का बयान माओवादी हिंसा और उसकी विचारधारा के खिलाफ था, न कि सामान्य राजनीतिक आलोचना करने वाले नागरिकों के खिलाफ।

नक्सलवाद पर सरकार की नीति

केंद्र सरकार पिछले वर्षों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा अभियान और विकास योजनाओं के जरिए माओवादी हिंसा को कम करने पर जोर देती रही है। सरकार का कहना है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई से नक्सली हिंसा में कमी आई है और प्रभावित क्षेत्रों में विकास का विस्तार हुआ है।

प्रधानमंत्री ने अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में भी नक्सलवाद के सशस्त्र स्वरूप को देश की एक गंभीर समस्या के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने सुरक्षा बलों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि देश को वैचारिक स्तर पर भी उन ताकतों के प्रति सचेत रहना होगा जो हिंसक माओवादी सोच को बढ़ावा देती हैं।

हालांकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस दृष्टिकोण पर सवाल उठाते रहे हैं और उनका कहना है कि सरकार को राजनीतिक असहमति तथा माओवादी हिंसा के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना चाहिए।

आगे और बढ़ सकती है राजनीतिक बहस

‘दिमागी नक्सली’ बयान पर चिदंबरम और जयराम रमेश की प्रतिक्रियाओं ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण को लेकर राजनीतिक बहस को और तीखा कर दिया है। संसद और सार्वजनिक मंचों पर आने वाले दिनों में यह मुद्दा फिर उठ सकता है।

कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक अधिकारों और असहमति की आवाज से जोड़ सकती है, जबकि बीजेपी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और माओवादी विचारधारा के खिलाफ चेतावनी के रूप में पेश कर सकती है। ऐसे में यह विवाद राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर विचारधारा और लोकतांत्रिक विमर्श की बहस का रूप ले सकता है।

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