बिहार में बाढ़ से निपटने के लिए तैरते घरों से Floating Village बनाने की योजना है। इंजीनियर प्रशांत कुमार के मॉडल में 3 कमरों का घर पानी बढ़ने पर तैर सकता है और इसे रेस्क्यू सेंटर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा।
पटना: बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ से निपटने के लिए पानी पर तैरने वाले घरों का गांव तैयार करने की योजना पर काम चल रहा है। इंजीनियर प्रशांत कुमार ने तीन कमरों वाला फ्लोटिंग हाउस तैयार किया है, जो पानी बढ़ने के साथ ऊपर उठकर तैर सकता है। भविष्य में ऐसे कई घरों को जोड़कर राहत और बचाव के लिए Floating Village बनाया जाएगा।
बाढ़ के समय तैरने लगेगा पूरा घर
बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ के कारण बड़ी आबादी को परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई इलाकों में पानी बढ़ने के बाद सड़क संपर्क टूट जाता है और राहत सामग्री पहुंचाना चुनौती बन जाता है। इसी समस्या को देखते हुए पानी पर तैरने वाले घरों का मॉडल तैयार किया गया है।
इंजीनियर प्रशांत कुमार ने तीन कमरों वाला एक ऐसा घर तैयार किया है, जो सामान्य परिस्थितियों में एक सामान्य आवास की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, बाढ़ का पानी बढ़ने पर यह घर पानी के साथ ऊपर उठकर तैर सकता है।
इस मॉडल को आगे बढ़ाते हुए छह से सात और फ्लोटिंग हाउस तैयार करने की योजना है। इन सभी घरों को एक-दूसरे से जोड़कर एक Floating Village तैयार किया जाएगा। इसका उद्देश्य केवल रहने की सुविधा देना नहीं, बल्कि बाढ़ के दौरान इसे राहत और बचाव के लिए उपयोगी बनाना भी है।
Rescue Center से Health Center तक होगा इस्तेमाल
प्रस्तावित फ्लोटिंग विलेज को बाढ़ के दौरान बहुउद्देश्यीय राहत केंद्र के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां रेस्क्यू सेंटर, हेल्थ सेंटर और भोजन वितरण केंद्र जैसी सुविधाएं विकसित करने की योजना है। इसके अलावा जरूरी सामान को सुरक्षित रखने के लिए स्टोरेज की सुविधा भी बनाई जा सकती है।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में जब जमीन पर बने रास्ते और इमारतें पानी में घिर जाती हैं, तब ऐसे तैरते ढांचे राहत कार्यों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। जरूरत पड़ने पर इन घरों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भी ले जाया जा सकेगा।
इससे राहत और बचाव एजेंसियों को उन इलाकों में अस्थायी केंद्र स्थापित करने में मदद मिल सकती है, जहां बाढ़ के कारण सड़क या अन्य सामान्य संपर्क माध्यम उपलब्ध नहीं रहते। भविष्य में एनडीआरएफ और दूसरी एजेंसियों के लिए भी इस तरह के ढांचे उपयोगी बनाए जा सकते हैं।
आरा से पटना तक पहुंचा फ्लोटिंग हाउस
प्रशांत कुमार ने अपना पहला प्रोटोटाइप 'मातृ धाम' नाम से आरा में तैयार किया था। इसके बाद इस फ्लोटिंग हाउस को नदी के रास्ते बक्सर होते हुए पटना लाया गया। फिलहाल पटना में ऐसे तीन घर मौजूद हैं।
इन घरों की खासियत सिर्फ पानी पर तैरना नहीं है। इनके निर्माण में स्थानीय और पर्यावरण के अनुकूल सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। इससे निर्माण लागत को नियंत्रित रखने के साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को भी कम करने की कोशिश की गई है।
₹6 लाख में तैयार हुआ तीन कमरों का घर
तीन कमरों वाले एक फ्लोटिंग हाउस को तैयार करने में करीब ₹6 लाख की लागत आई है। निर्माण में इस्तेमाल होने वाली अधिकांश सामग्री आसपास के करीब 10 किलोमीटर के क्षेत्र से जुटाई गई है।
घर बनाने में रिसाइकल पाइप के साथ गाय के गोबर, चूना, गुड़ और चावल से तैयार पर्यावरण अनुकूल ईंटों का इस्तेमाल किया गया है। बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए सोलर पैनल लगाए गए हैं। वहीं, ड्राई टॉयलेट सिस्टम मानव अपशिष्ट को कंपोस्ट में बदलने में मदद करता है।
घर के डिजाइन में वेंटिलेशन का भी ध्यान रखा गया है। इसके चलते गर्मियों में अंदर हवा का बेहतर प्रवाह बना रहता है, जबकि सर्दियों में तापमान को अपेक्षाकृत अनुकूल रखने में मदद मिलती है।
अगर इस मॉडल के आधार पर कई घरों को सफलतापूर्वक एक साथ जोड़ा जाता है, तो बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों में यह एक वैकल्पिक राहत व्यवस्था बन सकती है। खास तौर पर उन क्षेत्रों में जहां हर साल बाढ़ के कारण सामान्य जीवन और संपर्क व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होती है।











