SIR को लेकर चुनाव आयोग पर विपक्ष का हमला तेज हो गया है। राहुल गांधी ने आयोग पर गंभीर आरोप लगाए, केजरीवाल ने दिल्ली-हरियाणा चुनाव रद्द करने की मांग की और अखिलेश यादव ने निष्पक्षता पर सवाल उठाए। आयोग ने सभी फैसले सर्वसम्मत बताए।
नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चुनाव आयोग पर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों के कई नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, चुनाव आयोग के सूत्रों ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों सदस्यों की सहमति से सर्वसम्मति में लिए गए हैं।
राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर लगाया गंभीर आरोप
कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर तीखा सवाल उठाया। उन्होंने मतदाता सूची से जुड़े विवाद को ‘वोट की चोरी’ बताते हुए कहा कि यह भारत के लोगों और संविधान के खिलाफ अपराध है।
राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि वे जो कर रहे हैं, वह गलत है और देश के खिलाफ है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि समय आने पर उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा। अपने बयान में उन्होंने इसे ‘राजद्रोह’ तक बताया। राहुल गांधी की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब SIR को लेकर आयोग के भीतर कथित असहमति से जुड़ी रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है।
केजरीवाल ने दिल्ली और हरियाणा के चुनाव रद्द करने की मांग की
आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी SIR से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को किसी एक व्यक्ति द्वारा संचालित नहीं किया जा सकता।
केजरीवाल ने दिल्ली और हरियाणा के चुनाव रद्द करने की मांग की। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किए जाने की मांग भी की।
यह बयान विपक्षी दलों की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच आया है। विपक्ष के कई नेताओं ने रिपोर्ट में सामने आए कथित मतभेदों की जांच की मांग की है।
अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठाए सवाल
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यदि आयोग के अधिकारी 10 महीनों के दौरान 14 बार आधिकारिक तौर पर किसी मुद्दे को लेकर आपत्ति दर्ज करते हैं, तो इससे आयोग के कामकाज को लेकर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग को एक ऐसी संवैधानिक संस्था बताया, जिसका निष्पक्ष रहना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि संस्था की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आई जानकारी लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से भी संज्ञान लेने की मांग की।
अभिषेक मनु सिंघवी ने भी साधा निशाना
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने न केवल देश को बल्कि अपने सहयोगियों को भी भ्रमित किया और कहा कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाएं उस रिपोर्ट के बाद सामने आई हैं जिसमें आयोग के दो अन्य सदस्यों की ओर से दर्ज की गई कथित लिखित आपत्तियों का विवरण दिया गया है।
रिपोर्ट में 14 बार आपत्ति का दावा
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गई थीं।
रिपोर्ट में जिन मुद्दों का उल्लेख किया गया है, उनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने, Form-6 में बदलाव, पश्चिम बंगाल में मतदाता संबंधी फैसलों के खिलाफ अपील और चुनावी डेटा तक पहुंच जैसे विषय शामिल हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में यह सवाल भी उठाया कि आयोग के नाम पर जारी किए गए कुछ फैसले और आदेश उनकी जानकारी के बिना कैसे जारी हुए।
एक अन्य मुद्दा चुनावी डेटा तक पहुंच और उसके प्रबंधन से जुड़ा बताया गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने चुनावी रोल के डिजिटल डेटाबेस के नियंत्रण के केंद्रीकरण को लेकर भी चिंता जताई थी।
Form-6 और मतदाता सूची को लेकर भी सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, Form-6 में SIR से संबंधित एक बदलाव को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई थी। Form-6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने पहले इस बदलाव को लेकर कानूनी प्रक्रिया का सवाल उठाया था, जबकि बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी इसे लेकर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, संधू ने इसे हटाने की बात कही थी।
रिपोर्ट में चुनावी डेटाबेस और Electoral Registration Officers यानी EROs की भूमिका से जुड़े सवालों का भी उल्लेख है। EROs मतदाता सूची से संबंधित वैधानिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चुनाव आयोग ने रिपोर्ट को किया खारिज
विवाद बढ़ने के बाद चुनाव आयोग के सूत्रों ने कथित आंतरिक मतभेदों की खबरों को खारिज कर दिया। आयोग के अनुसार, SIR सहित उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी इन फैसलों में शामिल रही है।
आयोग के सूत्रों ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मुद्दे पर व्यक्तिगत राय अलग-अलग होना संभव है। हालांकि, आयोग के अनुसार अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। यदि किसी मुद्दे पर सदस्यों के बीच मतभेद हो, तो कानून के तहत बहुमत के आधार पर फैसला किया जा सकता है।
SIR को लेकर विवाद क्यों महत्वपूर्ण है?
SIR का संबंध मतदाता सूचियों की समीक्षा और अद्यतन प्रक्रिया से है। ऐसे में मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और सुधार से जुड़े किसी भी विवाद का सीधा संबंध चुनावी प्रक्रिया से जुड़ता है।
यही वजह है कि आयोग के भीतर कथित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक दलों ने इसे व्यापक मुद्दा बना दिया है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि उसके निर्णय संस्थागत प्रक्रिया के तहत और सभी सदस्यों की मंजूरी से लिए गए हैं।
इस पूरे विवाद में फिलहाल दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं—एक ओर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट है, जिसमें दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज कथित आपत्तियों का विवरण दिया गया है; दूसरी ओर चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष है, जिसमें SIR समेत सभी फैसलों को सर्वसम्मत बताया गया है।











