रामनगर की 200 साल पुरानी रामलीला में लौटी जनकपुर की बारात, चारों बहुओं का हुआ परछावन

वाराणसी के रामनगर में 200 साल पुरानी रामलीला में जनकपुर से अयोध्या लौटने की लीला हुई। कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा ने चारों बहुओं का परछावन किया।

वाराणसी के रामनगर में 200 साल पुरानी पारंपरिक रामलीला के तहत जनकपुर से बारात अयोध्या लौटी। कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा ने चारों पुत्रों और पुत्रवधुओं का परछावन किया। आयोजन खुले आसमान के नीचे हुआ।

वाराणसी: रामनगर की पारंपरिक रामलीला में जनकपुर से अयोध्या लौटने की लीला का मंचन हुआ। चारों भाई घोड़ों पर और पुत्रवधुएं पालकी में सवार होकर पहुंचीं। अयोध्या के द्वार पर माता कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा ने चारों पुत्रों और बहुओं का परछावन किया। हजारों महिलाएं इस दृश्य की साक्षी बनीं। रामनगर की यह रामलीला आधुनिक रोशनी और ध्वनि उपकरणों के बजाय आज भी पारंपरिक शैली में आयोजित होती है।

खुले आसमान के नीचे आज भी निभाई जाती है परंपरा

वाराणसी के रामनगर की प्रसिद्ध रामलीला में गुरुवार को जनकपुर से अयोध्या बारात लौटने का प्रसंग मंचित किया गया। रामनगर की इस रामलीला की खासियत यह है कि यहां आधुनिक मंच, तेज रोशनी, लाउडस्पीकर या अन्य ध्वनि उपकरणों की जगह पारंपरिक तरीके से खुले आसमान के नीचे लीला होती है। पात्रों के संवाद उनकी अपनी बुलंद आवाज में सुनाई देते हैं और रामचरितमानस के पाठ के साथ पूरा आयोजन आगे बढ़ता है।

रामनगर की रामलीला को करीब दो सौ साल पुरानी परंपरा से जोड़ा जाता है। इसका आयोजन काशी नरेश की परंपरा से जुड़ा है और समय के साथ इसके मंचन की अपनी विशिष्ट शैली विकसित हुई। यहां रामलीला किसी एक स्थायी मंच तक सीमित नहीं रहती, बल्कि रामनगर के अलग-अलग हिस्सों को प्रसंग के अनुसार अयोध्या, जनकपुर, लंका और दूसरे स्थानों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

घोड़ों पर चारों भाई, पालकी में आईं पुत्रवधुएं

जनकपुर में विवाह के बाद जब बारात अयोध्या लौटने का प्रसंग आया तो रामनगर का माहौल उत्सव में बदल गया। चारों भाई घोड़ों पर सवार होकर लौटे, जबकि चारों पुत्रवधुएं पालकी में थीं। बारात में साधु-संतों के साथ बड़ी संख्या में युवा और अन्य लोग भी शामिल हुए। रास्ते में जगह-जगह महिलाओं ने पुत्रवधुओं पर पुष्प वर्षा कर उनका स्वागत किया।

अयोध्या पहुंचने पर माता कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा द्वार पर पहुंचीं। तीनों माताओं ने चारों पुत्रों और पुत्रवधुओं का परछावन किया। इस पारंपरिक रस्म को देखने के लिए रामनगर और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में महिलाएं पहुंचीं। पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं में उत्साह और भक्ति का माहौल बना रहा।

रामनगर की रामलीला में प्रसंगों का मंचन रामचरितमानस के क्रम के अनुसार आगे बढ़ता है। इस वर्ष भी अनंत चतुर्दशी से रामलीला की शुरुआत हुई है और इसका आयोजन करीब एक महीने तक चलने वाला है। निर्धारित कार्यक्रम में रावण जन्म से लेकर आगे के विभिन्न प्रसंगों का मंचन किया जाना है।

परछावन की रस्म में संयुक्त परिवार की झलक

चारों पुत्रों और पुत्रवधुओं के एक साथ अयोध्या पहुंचने के प्रसंग को देखने के लिए महिलाओं में विशेष उत्साह रहा। स्थानीय मान्यता के अनुसार चारों भाइयों और उनकी पत्नियों को एक साथ देखना संयुक्त परिवार की परिकल्पना से जुड़ा है। लोगों का मानना है कि इससे परिवार में सुख-समृद्धि और आपसी मेल-जोल की भावना मजबूत होती है।

रामनगर की रामलीला में धार्मिक प्रसंगों के साथ सामाजिक परंपराओं की झलक भी दिखाई देती है। यही वजह है कि अलग-अलग मोहल्लों और आसपास के गांवों से लोग इन प्रसंगों को देखने पहुंचते हैं। आयोजन में धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय सामाजिक सहभागिता भी नजर आती है।

इस रामलीला की एक खास विशेषता इसका पारंपरिक स्वरूप है। सदियां बदलने और आधुनिक मनोरंजन तकनीकों के विस्तार के बावजूद यहां मंचन की मूल शैली को बनाए रखा गया है। रामलीला के अलग-अलग प्रसंगों के लिए रामनगर के विभिन्न स्थानों का इस्तेमाल किया जाता है और पात्रों के संवाद सीधे दर्शकों तक पहुंचते हैं।

इस तरह जनकपुर से अयोध्या लौटने का प्रसंग केवल धार्मिक कथा का मंचन नहीं रहा, बल्कि रामनगर की पुरानी सांस्कृतिक परंपरा और सामुदायिक सहभागिता का भी हिस्सा बना। चारों पुत्रवधुओं के परछावन का दृश्य देखने पहुंचे लोगों के बीच उत्सव और भक्ति का माहौल बना रहा।

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