ओंकारेश्वर में अंतरराष्ट्रीय सिकल सेल दिवस कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन की उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने कहा कि 7 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग लक्ष्य से पहले पूरी होना भारत की बड़ी स्वास्थ्य उपलब्धि है।
ओंकारेश्वर: भारत की राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने अंतरराष्ट्रीय सिकल सेल दिवस के अवसर पर मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में आयोजित विशेष कार्यक्रम में राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन की उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत की सबसे महत्वपूर्ण पहलों में से एक बताते हुए कहा कि यह अभियान लाखों लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि सिकल सेल रोग जैसी गंभीर आनुवंशिक बीमारी से लड़ने के लिए व्यापक स्तर पर जागरूकता, समय पर पहचान और निरंतर उपचार की आवश्यकता होती है। उन्होंने इस दिशा में केंद्र और राज्य सरकारों, स्वास्थ्य कर्मियों तथा समुदायों के संयुक्त प्रयासों को महत्वपूर्ण बताया।
सिकल सेल रोग क्या है और क्यों है यह गंभीर चुनौती?
सिकल सेल रोग एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जो मुख्य रूप से लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है। इस बीमारी में सामान्य गोलाकार रक्त कोशिकाएं विकृत होकर दरांती या हंसिया जैसी आकृति धारण कर लेती हैं, जिससे शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने में कठिनाई होती है।
इस बीमारी से पीड़ित लोगों को बार-बार दर्द, संक्रमण, एनीमिया, अंगों की क्षति और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। विश्व के कई देशों में यह एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां आनुवंशिक रूप से यह बीमारी अधिक पाई जाती है।
भारत में भी विशेषकर आदिवासी और कुछ ग्रामीण समुदायों में सिकल सेल रोग के मामले बड़ी संख्या में दर्ज किए जाते रहे हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक अभियान शुरू किया गया।
राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन की बड़ी उपलब्धि
राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में बताया कि राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन ने निर्धारित समय से पहले ही अपने प्रमुख लक्ष्य को हासिल कर लिया है। मिशन के तहत नवजात शिशुओं से लेकर 40 वर्ष तक की आयु के लोगों की बड़े पैमाने पर जांच की गई।
उन्होंने कहा कि लगभग 7 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग पूरी करना एक असाधारण उपलब्धि है। यह न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी आनुवंशिक बीमारी के खिलाफ प्रभावी रणनीति बनाने के लिए शुरुआती पहचान बेहद जरूरी होती है। बड़े पैमाने पर की गई यह स्क्रीनिंग भविष्य में रोग नियंत्रण और उपचार रणनीतियों को अधिक प्रभावी बनाने में मदद करेगी।
दुनिया के सबसे बड़े आनुवंशिक रोग स्क्रीनिंग अभियानों में शामिल
राष्ट्रपति ने इस मिशन को दुनिया के सबसे बड़े आनुवंशिक रोग स्क्रीनिंग कार्यक्रमों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि इतने बड़े स्तर पर स्वास्थ्य जांच अभियान चलाना भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग से सरकारों को बीमारी के वास्तविक प्रसार, प्रभावित क्षेत्रों और जोखिम वाले समुदायों के बारे में अधिक सटीक जानकारी मिलती है। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग और लक्षित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना संभव हो पाता है।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में करोड़ों लोगों तक पहुंच बनाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
लाखों मरीजों और वाहकों की पहचान
कार्यक्रम के दौरान साझा की गई जानकारी के अनुसार, इस राष्ट्रीय अभियान के माध्यम से लगभग 2.5 लाख सिकल सेल रोगियों की पहचान की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त 20 लाख से अधिक ऐसे लोगों का पता चला है जो इस बीमारी के वाहक हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि रोगी और वाहक के बीच अंतर समझना बेहद महत्वपूर्ण है। वाहक व्यक्ति स्वयं गंभीर रूप से बीमार नहीं हो सकता, लेकिन वह आनुवंशिक रूप से इस रोग को अगली पीढ़ी तक पहुंचा सकता है।
इसी कारण स्क्रीनिंग और परामर्श सेवाओं को बीमारी की रोकथाम में महत्वपूर्ण माना जाता है। वाहकों की पहचान से परिवारों को भविष्य के स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है।
जागरूकता और उपचार दोनों पर जोर
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि केवल रोग की पहचान कर लेना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ जागरूकता बढ़ाना, उचित चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना और मरीजों को दीर्घकालिक स्वास्थ्य सहायता देना भी उतना ही आवश्यक है।
उन्होंने स्वास्थ्य कर्मियों, डॉक्टरों और सामुदायिक कार्यकर्ताओं की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि उनकी मेहनत ने इस अभियान को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सिकल सेल रोग के प्रभावी प्रबंधन के लिए नियमित चिकित्सा जांच, उचित दवाएं, पोषण और स्वास्थ्य शिक्षा आवश्यक हैं। इससे रोगियों के जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है।
आदिवासी समुदायों के लिए विशेष महत्व
भारत में सिकल सेल रोग का प्रभाव कई आदिवासी समुदायों में अपेक्षाकृत अधिक देखा जाता है। यही कारण है कि राष्ट्रीय मिशन ने विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जहां बीमारी का जोखिम अधिक है।
स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाना इस मिशन का एक प्रमुख उद्देश्य रहा है। मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयों, जागरूकता अभियानों और स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों की मदद से लाखों लोगों तक पहुंच बनाई गई।
यह प्रयास न केवल बीमारी की पहचान में मदद कर रहा है बल्कि स्वास्थ्य असमानताओं को कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय के लिए उदाहरण
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह अभियान अन्य देशों के लिए भी एक मॉडल बन सकता है। बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग, सामुदायिक भागीदारी और सरकारी सहयोग का यह संयोजन कई अन्य आनुवंशिक और गैर-संचारी रोगों के खिलाफ भी प्रभावी रणनीति साबित हो सकता है।
विश्व स्तर पर आनुवंशिक रोगों के बढ़ते बोझ को देखते हुए ऐसे कार्यक्रमों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकार इसे भारत की स्वास्थ्य कूटनीति और नवाचार क्षमता का भी उदाहरण मानते हैं।











